यादराम रसेन्द्र: प्रेमचंद की परम्परा के बाल कहानीकार।

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हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार यादराम रसेंद्र की चर्चित कहानियों के संग्रह (संपादक- जाकिर अली रजनीश) के बहाने उनकी कहानी कला का समीक्षात्मक अवलोकन।

बाल साहित्य में ज़मीन से जुड़े पात्रों और विशेषकर अति दुर्बल वर्ग के बच्चों को आधार बनाकर शानदार कहानियां रचने वाले कथाकार श्री यादराम रसेन्द्र का लम्बी बीमारी के बाद 68 वर्ष की अवस्था में रविवार 24 अगस्त को निधन हो गया। 

श्री रसेन्द्र का जन्म 14 जुलाई, 1946 को अलवर, राजस्थान के भुनगड़ा अहीर नामक स्थान पर हुआ था। उन्होंने वर्ष 1965 में लेखन कार्य प्रारम्भ किया और उनकी 300 से अधिक रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। सत्य का बल(बाल उपन्यास), बोली का घाव, टेसू के रंग एवं यादराम रसेन्द्र की श्रेष्ठ बाल कथाएं(सभी बाल कहानी संग्रह) उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी, जयपुर से सिद्धावत बाल साहित्य पुरस्कार सहित अनेक संस्थाओं से महत्वपूर्ण पुरस्कार एवं सम्मान भी प्राप्त हुए।

उनके निधन से बाल साहित्य जगत की अपूर्णीय क्षति हुई है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

यादराम रसेन्द्र: ज़मीन से जुड़े बालसाहित्यकार

जब कहीं हिन्दी कहानियों की बात चलती है, तो सबसे पहले हमारे ज़ेहन में प्रेमचंद का नाम गूंजता है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रेमचन्द ने जो काम किया, वह अदभुत है। उन्होंने कहानियों को आम जन से जोड़कर वास्तव में उसकी परिभाषा को सार्थकता प्रदान की है। ऐसा नहीं है कि प्रेमचन्द युग से पहले अच्छी रचनाएँ नहीं लिखी गयीं। लिखी गयीं और बहुतायात में लिखी गयीं। पर उन कहानियों में या तो इतिहास का स्वर्णकाल जगमगाता था या फिर उच्च वर्गीय समाज ही दृष्टिगोचर होता था। अगर कुछ नहीं था, तो वह था समकालीन जनमानस की व्याप्ति। प्रेमचन्द ने न सिर्फ अपने आस-पास की दुनिया का दर्द समझा, बल्कि उसे अपने शब्दों में ढ़ालकर अमर बना दिया। प्रेमचन्द की इसी अद्भुत पकड़ के कारण ही उनकी गिनती हिन्दी के श्रेष्ठ कथाकार के रूप में की जाती है।

हिन्दी बाल कहानियों की बात की जाए, तो उसका फ़लक बहुत व्यापक है, किन्तु जब हम सामाजिक चेतना के सूत्र यहाँ खोजने का प्रयत्न करते हैं, तो आमतौर से निराशा ही हमारे हाथ लगती है। किन्तु इस धुंधलके के बीच एक नाम ऐसा नज़र आता है, जिसकी चमक बराबर अपनी उपस्थिति का एहसास कराती रहती है। हिन्दी बालसाहित्य का वह सम्मानित नाम है- यादराम रसेन्द्र।

14 जुलाई, 1946 को अलवर, राजस्थान में जन्में यादराम रसेन्द्र ने स्पष्ट श्रवण शक्ति न होने के बावजूद अपनी कहानियों के द्वारा जो छाप छोड़ी है, वह अद्भुत है। वे सिर्फ अपनी कलात्मक प्रतिभा के द्वारा उच्च साहित्यिक मानदण्ड स्थापित ही नहीं करते, अपितु पग-पग पर पाठकों को चमत्क़ृत भी करते चलते हैं।

हिन्दी बाल कहानियों से सामान्य रूप से बहिष्कृत निम्न वर्ग उनकी रचनाओं में प्रमुखता से छाया हुआ है। वे उसकी विशेषताओं को रेखांकित करते हैं, उसकी बेबसी का पड़ताल करते हैं और उसकी दशा पर टिप्पणी करते हुए उससे सम्बद्ध सत्य को जस का तब सामने रख देता हैं। यह सत्य हमें चीरता ही नहीं, झकझोरता भी है। साथ ही साथ यह कथा का एक ऐसा उच्च मानदण्ड भी स्थापित करता चलता है, जो हर लिहाज़ से अतुलनीय है। ‘अगली बार’, ‘भूख’ एवं ‘जेब कतरने से पहले’ इसके साक्षात प्रमाण हैं।
 
बाल कहानियाँ बचपन की अनमोल धरोहर होती हैं। वहाँ बपचन अपने हर रूप में देखा जा सकता है। बचपन की बात चले और खिलौनों का जिक्र न आए, तो बात कैसे पूरी हो। खिलौने बच्चों के दोस्त की तरह होते हैं। मूक, लेकिन सुख दख के साथी। हर बच्चे की चाह होती है कि वह अच्छे-अच्छे खिलौनों के साथ खेले, फिर चाहे वह किसी सेठ का लाल हो या फिर किसी मजदूर का बेटा। खिलौनों से खेलने की हसरत बचपन की निशानी है। वह गरीबी और अमीरी नहीं देखती, सिर्फ अवस्था देखती है। इसी हसरत को जीवंत तरीके से बयाँ करती है ‘अगली बार’।

रामू एक छोटा सा बच्चा है, मासूम और गरीब। वह एक सेठ के घर में काम करता है। लेकिन उसकी एक कमजोरी है- खिलौने। जब कभी वह सेठ की लड़की को अच्छे-अच्छे खिलौनों के साथ खेलता देखता है, तो वह सब कुछ भूल कर उसमें खो जाता है। ऐसे में उसके मन में सबसे पहला विचार यही आता है- इस बार तनख्वाह मिलने पर वह अपने लिए एक खिलौना ज़रूर खरीदेगा। रामू जब अपनी माँ के सामने अपनी यह छोटी सी हसरत बयान करता है, तो वह अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करने से रोक नहीं पाती। उसकी माँ अपने बीते दिनों को याद करते हुए कहती है- “बचपन में खिलौनों से खेलने की मेरी बड़ी साध थी। नसीब नहीं थे। साध ही रह गयी। तेरा बाप भी कभी नहीं खेला खिलौनों से। जब तू पैदा हुआ, तो आस रही कि तू खिलौनों से खेलेगा और हमारी बचपन की साधें फल जाएंगी। तुझे भी नसीब नहीं हुए। पैसा तो तू लाता है और सब फुंक जाता है- पेट की आग में....”

यह कहानी सिर्फ खिलौनों और बच्चे की इच्छा की बात नहीं करती, यह आम जन के सपनों की कहानी है। लेखक ने यहाँ पर प्रतीकात्मक रूप से दिखाया है कि किस प्रकार आम आदमी अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखता है। वह उन्हें पूरा करने के लिए भरसक प्रयत्न भी करता है, पर हालात की मार इतनी तगड़ी होती है कि वे सपने कब बिखर कर मिट्टी में मिल जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता।

अपने विस्तृत फलक और गहरे निहितार्थों के कारण ‘अगली बार’ एक बड़ी कहानी के दर्जे की हकदार बनती है। ऐसी जानदार कहानियाँ बाल साहित्य में कम ही देखने को मिलती हैं। यादराम रसेन्द्र किस तरह से भारतीय आमजन से जुड़े हुए हैं, यह उनकी तमाम रचनाओं में देखा जा सकता है। उनके पास आमजन से जुड़े सामाजिक अनुभवों की एक विस्तृत श्रृंखला है। शायद यही कारण है कि ‘अगली बार’ की जिजीविषा जहाँ समाप्त होती है, ठीक वहीं से शुरू होती है ‘भूख’ से लड़ने की जंग।

वास्तव में ‘भूख’ ‘अगली बार’ से भी आगे की चीज है। ‘अगली बार’ जहाँ एक बच्चे की मानसिक ज़रूरत को रेखांकित करती है, वहीं ‘भूख’ दो जून की रोटी के संघर्ष की जीवंत दास्तान है। यह संघर्ष एक गरीब परिवार में पले-बढ़े लड़के की पेट की आग और उसके परिवार की ज़रूरतों के बीच की रस्सा-कसी को उद्घाटित करती है। एक छोटा सा लड़का किस प्रकार अपने जीभ के स्वाद और पेट की आग को अपने परिवार की ज़रूरतों के लिए दबाता है, इसी का जीवंत चित्रण है ‘भूख’। शब्दों का कुशल संयोजन, विषय का संतुलित निर्वहन और भाषा पर पकड़ कहानी के पाठकों की ‘भूख’ न सिर्फ अंत तक जगाए रखती है, बल्कि वह अप्रीतिकिर सच्चाई से संषर्ष करती हुई कब अदर्शोन्मुख यथार्थ तक का अपना सफर पूरा कर लेती है, पता ही नहीं चलता। एक रचनाकार के लिए यही सबसे बड़ा हासिल है।

यादराम रसेन्द्र उन रचनाकारों में से हैं, जिन्होंने आम जीवन की कठिनाइयों को गहराइयों से समझा ही नहीं उन्हें अपनी रचनाओं में ढ़ाला भी है। सामाजिक स्तर पर सबसे नीचे के पायदान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा को उन्होंने जिस शिद्दत से अपनी रचनाओं मे व्यक्त किया है, वह अद्भुत है। उनकी तमाम कहानियाँ यूं तो देखने में अलग-अलग रचनाएं लगती हैं, पर यदि सूक्ष्मता से उनका अध्ययन किया जाए, तो वे ‘सीक्वल’ सा प्रतीत होती हैं। गहरे अर्थों में ‘भूख’ में जिस पेट की आग को उठाया गया है, वह एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो अपने कर्तव्य पथ पर डटा हुआ है। सुबह अखबार बेचते समय जब वह हलवाई की दुकान के सामने से गुजरता है, तो उसकी भूख जाग उठती है और उसे झिंझोड़ने लगती है। पर वह लड़का हर बार की तरह अपनी भूख को अपने परिवार की भूख के आगे होम कर देता है। यह एक बड़ी बात है। इसलिए नहीं कि वह एक किशोर लड़का है, इसलिए भी नहीं कि वह अपने पैरों पर खड़ा है, बल्कि इसलिए कि उसके सामने उसका अपना पूरा परिवार है। यह एक व्यक्ति और समष्टि का संघर्ष है, जो बड़े ही रोचक अंदाज़ में यथार्थवादी आदर्श की श्रेणी में जा पहुंचता है।

यहाँ पर एक प्रश्न यह भी उठ सकता है कि ‘भूख’ का पात्र शायद इसलिए जलेबियों की महक को जीतने में समर्थ रहता है क्योंकि उसके पास एक विकल्प है। विकल्प यानी उसका घर। उसके मन में यह कहीं न कहीं बैठा हुआ है कि जब वह अखबार बेचकर अपने घर पहुंचेगा, तो उसे कुछन कुछ खाने को मिलेगा ही। लेकिन यदि उसके सामने कोई विकल्प न होता, तो? तब क्या होता? क्या तब भी वह बालक अपनी भूख को जीतने में समर्थ होता?

इसी तह की गहराई में जाने का प्रयत्न करती रचना है ‘जेब कतरने से पहले’। ‘भूख’ की कथा को नए अंदाज़ में आगे बढ़ाती यह कहानी एक ऐसे बच्चे की कहानी है, जो बूट-पॉलिश का काम करता है। लेकिन एक दिन उसका सामान चोरी हो जाता है। पर पेट की आग को इससे क्या मतलब? वह हमेशा की तरह जग जाती है और परेशान करने लगती है। अपनी भूख मिटाने के लिए वह लड़का लाख कोशिश करता है, पर उसे सफलता नहीं मिलती। धीरे-धीरे हालत यहाँ तक पहुंच जाती है कि उसके सामने चोरी के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता।

ध्यान देने वाली बात यह है कि वह कोई पेशेवर चोर नहीं है। उसने हमेशा मेहनत करके अपना पेट पाला है। इसलिए चोरी का निर्णय ले लेने के बावजूद वह उसकी हिम्मत नहीं जुटा पाता है। उसकी अंतरआत्मा उसे बार-बार आगाह करती है, रोकती है। और अंत में हालात भी ऐसे हो जाते हैं कि वह उसे जीतने में सफल हो जाता है। प्रख्यात रचनाकार भगवती चरण वर्मा अपने उपन्यास ‘चित्रलेखा’ में स्थापित करते हैं कि “आदमी परिस्थितियों का दास है”। ‘जेब कतरने से पहले’ एक तरह से उस स्थापना को ही आगे बढ़ाने का काम करती है। बल्कि सूक्ष्म अर्थों में रसेन्द्र यह संदेश देने में भी सफल रहे हैं कि आदमी परिथितियों का दास तो है, लेकिन यदि वह संयम और समझ से काम ले, तो हर प्रकार की मुश्किल से उबरा भी जा सकता है। यही इस कहानी की स्थापना है, जिसे लेखक ने बड़ी आसानी से पाठकों तक पहुंचाया है।

यथार्थपरक कहानियों में रसेन्द्र को जो महारत हासिल है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। वे जिस कुशलता के साथ अपनी कहानियों का वातावरण सृजित करते हैं, वह अद्भुत है। ‘फंदे से बाहर’, ‘बयान’ और ‘दहकते शोले’ उनकी ऐसी ही कहानियाँ हैं। ‘फंदे से बाहर’ एक ऐसे लड़के की कहानी है, जो भीख मंगवाने वाले गिरोह के हत्थे चढ़ जाता है। इन अपराधियों का संजाल कितना बड़ा और कितना खतरनाक है इसे उक्त कहानी में बड़ी कुशलता से दर्शाया गया है। वहीं ‘बयान’ उस मानवता पर केन्द्रित है, जो हमारे समाज से लुपत प्राय होती जा रही है। अक्सर यह देखा जाता है कि व्यक्ति अपनी छोटी सी गल्ती को छिपाने के लिए अपना दोष दूसरे पर मढ़ देता है। ‘बयान’ ऐसी मानसिकता वाले लोगों के मुंह पर एक जोरदार तमाचे की तरह से है। यह कहानी हमें शाक्ड ही नहीं हमारे सामने सच को स्वीकारने की चुनौती भी पेश करती है।

जिस सत्य, जिस साहस के दर्शन हमें ‘बयान’ में होते हैं, रसेन्द्र उसका कटु रूप भी वे हमारे सामने रखने से नहीं हिचकते। ऐसे ही एक नग्न-सत्य के रूप में हमारे सामने आती है उनकी कहानी ‘दहकते शोले’। यह एक ऐसी कहानी है, जो हमारे अंतरमन को झकझोर के रख देती है। लेकिन कहानी का सफर यहाँ पर आकर ठहर नहीं जाता, वह इससे भी आगे जाती है और सत्य तथा असत्य के बीच को फर्क को स्पष्ट करने के लिए हमें ललकारती है, मानवीयता और अमानवीयता के बीच विभेद करने की चुनौती पेश करती है और मनुजता तथा पशुता के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचने की मांग करती है।

हमारा यह समय कितना कठिन और निर्मम हो चला है, हमारे चारों ओर कितना विषाक्त वातावरण पनप रहा है और किस तरह से धर्म के ठेकेदार उस आग को और ज़्यादा भड़काने में लगे हुए हैं इसका जीवंत बयान है ‘दहकते शोले’।

दहकते शोले’ का कथानक कोई कपोल-कल्पना नहीं, एक कटु सत्य है। यह कहानी आज के समाज का एक ऐसा चेहरा हमारे सामने पेश करती है, जो बहुत विकृत और घिनौना है। लेकिन अंधेरा जितना घना होता है, सवेरा होने की संभावना उतनी ही प्रबल होती जाती है। रसेन्द्र सिर्फ इस मायने में बड़े रचनाकार नहीं हैं कि वे सामाजिक विद्रूपताओं पर सटीक प्रहार करते हैं, वे इसलिए भी बड़े रचनाकार की पदवी के हकदार हैं कि वे उस घने अंधकार के बीच आशा की किरण भी छोड़ते चलते हैं। विध्वंस के साथ वे उस नवांकुर की भी झलक देते चलते हैं, जो आने वाले सुखद समय की एक दस्तक है। अपनी सामाजिक सजगता, मानवीय मूल्यों की चिन्ता और भविष्य के नव-निर्माण की बात करती यह कहानी अनजाने में ही विशिष्ट रचना का दर्जा हासिल कर लेती है। नि:संदेह यह एक उच्च कोटि की रचना है, जिसकी तुलना करने के लिए इतने बड़े कैनवास की दूसरी कहानी खोजना भी एक बड़ी चुनौती के समान है। हो सकता है कि कुछ लोग इस कहानी पर सामाजिक विद्वेष फैलाने का आरोप मढ़ कर बालसाहित्य में इसकी उपस्थिति पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े करें।

बात सिर्फ आदर्शोन्मुख यथार्थ की हो ऐसा नहीं, यादराम रसेन्द्र ने बाल मनोविज्ञान और बाल मनोभाव को भी नजदीक से समझा और अपनी रचनाओं में ढ़ाला है। ‘लाली’ इसका साक्षात उदाहरण है। यह एक उच्च वर्ग के लड़के और उसके नौकर के बीच के बाल सुलभ व्यवहारों का चित्रण करने वाली कहानी है। समकालीन यथार्थ में पगा हुआ रचनाकार बाल बाल सुलभ व्यवहार से अनजान नहीं, ‘लाली’ इसका साक्षात उदाहरण है।

जब बात बाल कहानियों की चल रही हो और बाल सुलभ शरारतों का जिक्र न हो, यह कैसे संभव है? इसके बिना न तो बच्चों की दुनिया सम्पूर्णता प्राप्त करती है और न ही उनकी कहानियाँ। फिर यादराम रसेन्द्र की कहानियाँ इसका अपवाद कैसे हो सकती हैं? आखिर वे एक कुशल बाल कहानीकार जो ठहरे।

अक्सर ये होता है कि जब बच्चे कुछ कर रहे होते हैं, तब उनसे कोई काम कहने पर वे दो मिनट कहकर बात टाल देते हैं। बच्चे ऐसा इसलिए नहीं करते क्योंकि वे उस काम काम को करना नहीं चाहते, दरअसल वे उस वक्त जिस काम को कर रहे होते हैं, या यूं कहें कि खोए होते हैं, उसे बीच में छोड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगता। इसलिए वे ‘दो मिनट’ कहकर पुन: उसी काम में खो जाते हैं। पर वे दो मिनट कब बीत जाते हैं पता नहीं चलता। ऐसे में कभी-कभी कोई बड़ा नुकसान भी हो जाता है। यह नुकसान कितना दिल दहला देने वाला हो सकता है, इसका साक्षात प्रमाण है ‘दो मिनट प्लीज़’। अपनी आत्मकथात्मक शैली और जबदरस्त प्रभावोत्वादकता के कारण यह एक अच्छी रचना बन पड़ी है। अपने स्वभाव के विपरीत रसेन्द्र इस कहानी के अन्त में एक सीख छोड़ते चलते हैं। पर वह सीख इस तरह से कहानी में पगी हुई है कि न तो वह थोपी हुई लगती है और न ही बोझिल करने वाली। यही इस कहानी का सबसे बड़ा हासिल है।

इसी क्रम में यादराम रसेन्द्र की ‘पहचान’, ‘आखिरी गुनाह’, ‘बोझ’, 'पुराना टिकट’, ‘निर्णय’ 'बदलती निगाहें’, ‘एक लंगड़ा मन’ और ‘बहके क़दम’ भी आती हैं। ये कहानियाँ उस मध्य वर्ग की उपज हैं, जिसके बच्चे ठीक-ठाक घरों में रहते हैं और औसत स्कूलों में विद्या अध्ययन करते हैं। ऐसे बच्चों के माता-पिता की सीमित आमदनी होती है। यही कारण है कि उनके बच्चों को जेब-खर्च के लिए भी सीमित धनराशि ही मिल पाती है। लेकिन अपने साथ में पढ़ने वाले अमीर साथियों को देखकर उक्सर उन बच्चों के मन में लालच घर कर जाता है। ऐसे में वे घालमेल करके दो रूपयों में चार का मजा लेने की कोशिश करते हैं। इसी कोशिश को बयां करती हैं ‘बोझ’ और ‘पुराना टिकट’। शुरू-शुरू में तो ये ‘कलाकारी’ उन्हें एक ‘बोझ’ सी लगती है। जिन बच्चों की इच्छा शक्ति मजबूत होती है, वे उस बोझ से जल्दी ही पीछा छुड़ा लेते हैं और सामान्य जिन्दगी जीने लगते हैं। लेकिन जो बच्चे ज्यादा लालची किस्म के होते हैं, वे इस लालच में अंदर तक फंसते जाते हैं। उन्हें अपनी गल्ती का एहसास तभी होता है, जब वे पुराने टिकट को चलाने के चक्कर में रंगे हाथ पकड़े जाते हैं।

कुछ बच्चे स्वभाव से ही ढीठ होते हैं। अक्सर उन्हें स्वयं के बारे में यह गुमान हो जाता है कि वे बहुत समझदार हैं और वे जो भी काम कर रहे हैं वह बहुत अच्छा है। इसी गुमान में अक्सर वे गलत लोगों के चक्कर में पड़ जाते हैं। लेकिन इसका दुष्परिणाम कितना भयानक हो सकता है, यह ‘बहके क़दम’ और ‘आखिरी गुनाह’ में देखा जा सकता है।

समझदार व्यक्ति वही होता है, जो परिस्थितयों से सीखता है। ऐसे लोग दूसरों से सीख लेकर अपने बिगड़े काम बना लेते हैं। इसी कथ्य की बात करती है कहानी ‘निर्णय’। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनमें निर्णय लेने की क्षमता ही नहीं होती। ऐसे लोग दूसरों से उत्प्रेरित तो होते हैं, पर नकारात्मक रूप रूप में। यह नकारात्मकता सिर्फ दूसरों के बारे में बुरा सोचने पर ही विवश नहीं करती, अक्सर अपना नुकसान भी करा देती है। इसी बात को बहुत ही खूबसूरत तरीके से रेखांकित किया गया है।

एक अच्छा रचनाकार वह होता है, जो किसी खास तरह की रचनाओं में टाइप्ड नहीं होता। उसकी रचनाओं में जितनी विविधता होती है, वह उसे उतना ही श्रेष्ठ बनाती है। यादराम रसेन्द्र इसी श्रेणी के रचनाकार हैं। एक ओर वे यथार्थपरक कहानियों का सृजन करते हैं, दूसरी ओर आधुनिक युग-बोध को भी साथ लेते चलते हैं। तीसरी ओर मनोवैज्ञानिक कहानियाँ हैं, तो चौथी ओर लोक-कथात्मक शैली से निकली अदभुत रचनाएँ। ‘बीन और बंदूक’, ‘बोली का घाव’ और ‘लक्ष्मी का भंडार’ उनकी लोक-कथात्मक शैली से निकली वेकहानियाँ हैं, जिनमें लेखकीय प्रतिभा स्पष्ट रूप से झलकती है। ऊपरी तौर से देखने पर ये कहानियाँपंचतंत्र शैली का स्मरण करती हैं, पर जब इनके भीतर गहरे पैठते हैं तो चमत्कृत होते जाते हैं।

और अंत में रूठ-मनौवल की चर्चा। यह एक अद्भुत कहानी है। जिस प्रकार कोई वैज्ञानिक अपने वर्षों के श्रम के पश्चात किसी असम्भव से काम को सम्भव कर दिखाता है, ठीक वैसा ही कुछ एहसास दिलाती है ‘रूठ मनौवल’। किशोरावस्था के द्व-द्व को केन्द्र में रखकर यूं तो एक से बढ़कर एक कहानियाँ लिखी गयी हैं, पर ‘रूठ मनौवल’ उन सबमें लाजवाब है।

अक्सर कहानियाँ लिखते समय यह होता है कि लेखक के दिमाग में कोई घटना कौधती है। फिर उसमें पात्र वगैरह जुड़ते चले जाते हैं। उन पात्रों के आपसी द्वन्द्व के कारड़ खुद-ब-खुद आगे बढ़ती चलती है और एक निश्चित अंजाम तक पहुंचती जाती है। पर कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं, जो अपने आप दिल से निकलती चली जाती हैं। जैसे फूल से निकलती हुई खुश्बू। जैसे झरने से बहता हुआ पानी। ऐसी कहानियों को सिर्फ पिरोना होता है, शब्द रूपी मोती में, कागज रूपी धागे पर। ऐसी रचनाओं में कोई थोपा हुआ संदेश नहीं होता, दूर से झलकती कोई सीख भी नहीं होती इनमें, बावजूद इसक ये कहानियाँ सीधे दिल पर असर करती हैं। ऐसी ही कहानियाँ पाठकों को लम्बे समय तकयाद रह पाती हैं, ऐसी ही कहानियां साहित्य का मान बढ़ाती हैं और ऐसी ही कहानियाँ इतिहास में जगह बनाती हैं। ‘रूठ-मनौवल’ एक ऐसी ही कहानी है।

बाल कहानियों के विस्तृत फलक पर विहंगम दृष्टि डालने पर जो चीज़ मुख्य रूप से उभर कर आती है, वह यही कि यहां पर शैली जन्य विविधता का घोर अभाव है। ज्यादातर लेखकगण परम्परागत बंधी-बंधाई शैली में चलते चले जाते हैं। यादराम रसेन्द्र उनमें अपवाद हैं। विषय, कथ्य और शैली तीनों स्तरों पर वे परम्परागत खांचों को तोड़ते हैं और नए प्रतिमानों की स्थापना करते हैं। यह स्थापना मात्र मनोरंजन या आनन्द के लिए नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर और काफी हद तक सार्थक बनाने की जद्दोजहद है, जो उनकी रचनाओं में सर्वत्र विराजमान है:-

“चाहती हूं तू भले न खेले, तेरे बच्चे तो खिलौनों से खेलें। मैं उनके लिए एक खिलौना लाई हूँ’” कहकर मां उठी और ताक पर से एक नई सी किताब उठाकर लाई। बोली, “यह पहली पुस्तक है बेटा। तू सारे-दिन काम-धंधा कर –करके थक जाता है। पता नहीं इससे खेल पाएगा या नहीं। पर इतना जानती हूं बेटा, जो तू इसके साथ हिम्मत से खेल गया, तो तेरे बच्चे कभी खिलौनों को नहीं तरसेंगे। मैं यहाँ रहूं या ऊपर, मेरी आत्मा ठंडी होगी-कहीं कोई टीस नहीं रह जाएगी।“ (अगली बार)

“...अभी सिर्फ सत्रह-अट्ठारह दिन का वेतन मिलेगा। यानी बस कोई सत्रह-अट्ठारह रूपये। किताब कापियां खरीदना बहुत ज़रूरी है। हो सका, तो एक-दो कमीज या नेकर भी बनवा लूंगा। नहीं, अभी इनकी क्या जल्दी हैऊ इन्हीं कपड़ों को साफ रखा जाए, तो ये भी अभी काफी चलेंगें। एक सनलाइट की टिकिया जरूर खरीद लूंगा। पिताजी को बाकी पैसे से देना चाहिए। बाकी ही क्यो, उसने मन में सोया, सारी की सारी तनख्वाह हीदेनी चाहिए, फिर जैसा वह उचित समझेंगे...।“ (भूख)

भाषा-कौशल की बात करें, तो यादराम रसेन्द्र की कहानियाँ उसपर पूरी तरह से खरी उतरती हैं। वे भाषा के खिलंदड़पन में यकीन नहीं रखते, बल्कि पात्रों के अनुकूल भाषा का सृजन करते हैं। शब्दों पर उन्हें जबरदस्त अधिकार है। कहानी की गति के हिसाब से वे शब्दों का चयन करते हैं और अपने मन माफिक माहौल रचने में सफलरहते हैं। “चाट वाले को आठ आने देने हैं, दे दूंऊ देखूं जरा, उसको याद है या नहीं। उसके सामने से निकलता हूं। याद होंगे, तो मांग लेगा।“ यह सोचता हुआ विनोद चाटवाले की ओर बढ़ चला। वह बिलकुल पास पहुंच गया। उसके आगे सेभी निकल गया। एक-दो लड़के ही थे। वह चाटवाले को कनखियों से देखता रहा। कुछ दूर वह यूं ही चला गया, फिरवापस उसी तरह से गया। अब चाट वाले के पास काई लड़का नहीं था। विनोद का विचार था कि अब चाटवाला पैसे मांगेगा। वह कनखियों से देखता हुआ धीरे-धीरे चलता रहा। चाट वाला उसे अच्छी तरहसे देख्र रहा था। उसके कुछ नहीं कहा। विनोद उसके आगे से निकल गया था।“ (बोझ)

“इन दो वाक्यों पर मैं सोचता रहा। सुधा बड़ी हो गयी है, तो इसका मतलब यह कि अब मैं भी बड़ा हो गया हूं। उम्र में तो सुधा से एक-दो वर्ष बड़ा ही हूं। पर मैं अपने आपको बड़ा नहीं सम पाता। मेरा मन तो बच्चों जैसा ही है। मैं तो हूं ही बच्चा। चौदह'-पन्द्रह साल की उम्र में कोई बूढा थोडे ही कहलाएगा। फिर सुधा कैसे बड़ी हो गयी? अभी चार दिन पहले तो वह मेरे मुंह से टाफियाँ छीन कर खा जाती थी, चिकोटियाँ काटकर अंगूठा दिखाती थी और रूठ-मनौवल किया करती थी। फिर इतनी जल्दी वह बड़ी कैसे हो गयी?” (रूठ-मनौवल

यादराम रसेन्द्र पुरानी पीढी के रचनाकार हैं। वे नए युग की जटिलताओं से उपजी गुत्थियों की बात तो नहीं करते, परते मानव जीवन की सर्वकालिक समस्याओं को नहीं भूलते। कल्पना के पंख लगाकर बे-सिर-पैर की उड़ान भरना उनका शगल नहीं, वे ज़मीन से जुडेरचनाकार हैं। सामाजिक विसंगतियों, मानवीय कमज़ोरियों और विद्रूपताओं को वे सिर्फ दृष्ठा की तरह देखते ही नहीं, सृष्ठा की तरह उसमें से भी राह निकालते चलते हैं। वे उन विषम परिस्थितयों को सिर्फ नकारात्मगक पक्ष का ख्त्रिण नहीं करते, बल्कि उस आग में तप कर कुंदर बनते आदमी की जिजीविषा का अंकन करते हैं उनकी रचनाएं मानवीयता की पोषक और सामाजिकता की संरक्षक हैं और ये ऐसी विशेषताएं है, जो किसी समर्थ रचनाकार में ही पाई जाती है। एक वाक्य में यदि कहा जाए तो यादराम रसेन्द्र एक बड़े कहानीकार हैं हिन्दी बाल साहित्य में उनके कद का दूसरा रचनाकार खोजना एक श्रमसध्य कार्य है।(यादराम रसेन्द्र की श्रेष्ठ बाल कथाएं की भूमिका)

पुस्तक: यादराम रसेन्द्र की श्रेष्ठ बाल कथाएं
सम्पादक: डॉ. जाकिर अली रजनीश
संग्रहीत कहानियां: अगली बार, भूख, जेब कतरने से पहले, फंदे से बाहर, बयान, दहकते शोले, लाली, दो मिनट प्लीज, पहचा, आखिरी गुनाह, बोझ, पुराना टिकट, निर्णय, बदलती निगाहें, एक लंगड़ा मन, बहके कदम, बीन और बंदूक, बोली का घाव, लक्ष्मी का भंडार, रूठ मनौवल
प्रकाशक: लहर प्रकाशन, 778, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद
मूल्य: 150.00
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यादराम रसेन्द्र: प्रेमचंद की परम्परा के बाल कहानीकार।
हिन्दी के महत्वपूर्ण कहानीकार यादराम रसेंद्र की चर्चित कहानियों के संग्रह (संपादक- जाकिर अली रजनीश) के बहाने उनकी कहानी कला का समीक्षात्मक अवलोकन।
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