Gautam Buddha Story in Hindi: Hamen Dukh Kaun Deta Hai
बुद्ध की कहानियां Buddha Stories भले ही आज की न हों, पर उनके कथ्य मानवीय भावों से जुड़े हुए हैं। इसीलिए वे आज भी हमारा मार्गदर्शन करती हैं। यही कारण है कि हिंदी में बुद्ध की कहानियां Gautam Buddha Story in Hindi बेहद लोकप्रिय हैं। इसीलिए आज हम आपके लिए एक बुद्ध की एक लोकप्रिय कहानी Gautam Buddha Story लेकर आए हैं, जिसका शीर्षक है- हमें दुख कौन देता है? यह एक ऐसी कहानी है, जो हर किसी के कर्म को छू जाती है। हमें उम्मीद है कि गौतम बुद्ध की ये कहानी Buddha Story in Hindi आपको पसंद आएगी।
Gautam Buddha Story in Hindi: Hamen Dukh Kaun Deta Hai
एक बार महात्मा बुद्ध किसी गांव में प्रवचन दे रहे थे। वे अपनी बात को समाप्त करते हुए बोले, 'मानव के दुख का कारण है स्वयं को किसी से बांधना। जहां भी मोह होता है, बंधन होता है, वहां दुख स्वयं ही उत्पन्न हो जाता है। अत: अपने बंधनों को जानें और उनसे बाहर निकलने का प्रयास करें।'
इसके बाद उन्होंने सभी लोगों को आशीर्वाद दिया और फिर अपने आश्रम को लौट गये।
अगले दिन उनसे एक व्यक्ति मिलने आया। वह बुद्ध को दण्डवत करता हुआ बोला, 'महात्मन, मैंने कल आपका उपदेश सुना। आपकी बातें मेरे हृदय में उतर गयीं हैं। मैंने अपने बंधनों को तोड़ दिया है, सारी मोह माया का त्याग कर दिया है। अब मैं आपकी शरण में आना चाहता हूं।'
उस व्यक्ति की बातें सुनकर बुद्ध मुस्कराए और धीरे से बोले, 'मुझे विस्तार से बताओ वत्स, तुमने कौन-कौन से बंधन तोड़े और किसका मोह त्याग दिया है?'
वह व्यक्ति बोला, 'मेरे घर पर मेरे बूढ़े माता-पिता और पत्नी है। मेरा एक छोटा बच्चा भी है। मेरी पत्नी बहुत बीमार रहती है। उसके कष्ट देख कर मैं अक्सर सोचता रहता था कि वह मर जाए, तो उसके कष्ट दूर हो जाएं। उसकी वजह से मैं बहुत दुखी रहता हूं। लेकिन कल जब मैंने आपका उपदेश सुना, तो मेरी समझ में आ गया कि मेरे परिवार से मेरा बंधन ही मेरे दु:खों का कारण है। अगर मैं इसके चक्कर में पड़ा रहूंगा तो कभी सत्य को नहीं जान सकूंगा। इसलिए मैं अपने घर को त्याग कर आपके पास आया हूं।'
बुद्ध ने पूछा, 'क्या तुम सचमुच सभी बंधनों से मुक्त हो गये हो? देख लो, कहीं कोई बंधन तुम्हारे पीछे रह तो नहीं गया?'
वह व्यक्ति बोला, 'नहीं प्रभु, मैं अपने जीवन की सारी चीज़ों को पीछे छोड़ आया हूं और अब आगे बढ़ना चाहता हूं।'
बुद्ध ने कहा, 'अगर ऐसी बात है, तो फिर ठीक है। आज तुम यहीं आश्रम में रूको। कल मैं तुम्हें बताउंगा कि तुम्हें क्या करना है।'
बुद्ध ने अपने एक शिष्य की ओर इशारा किया। शिष्य ने उसे आश्रम के अतिथि कक्ष में पहुंचा दिया। वह व्यक्ति उत्सुकतापूर्वक आश्रम की गतिविधियां देखता रहा। उन्हें देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और अपने सौभाग्य पर इतराता रहा।
अगले दिन बुद्ध ने उस व्यक्ति को एक कार्य सौंपते हुए कहा, 'तुम्हें पूर्व की दिशा में जाना है। वहां पर तुम्हें एक गांव मिलेगा। गांव के बाहर ही एक साधिका का घर है। वह तुम्हें कोई वस्तु देगी। उसे लेकर तुम्हें वापस मेरे पास आना है।'
वह व्यक्ति पूर्व दिशा की ओर चल पड़ा। गर्मी का मौसम था। कुछ ही देर में वह पसीने से तर बतर हो गया। उसे प्यास भी सताने लगी। वह सोचने लगा कि अगर इस समय मैं अपने घर पर होता, तो इस तरह गर्मी में पसीना नहीं बहाना पड़ता।
कुछ दूर और चलने पर उसे भूख भी सताने लगी। पर वह एक सुनसान और बंजर रास्ता था। आसपास न तो कोई पेड़ था और न ही पोखर तालाब। वह पुन: सोचने लगा कि अगर मैं इस समय अपने घर पर होता, तो अपनी पत्नी के हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन कर रहा होता। पता नहीं क्यों बुद्ध ने मुझे गर्मी में इतनी दूर भेज दिया।
काफी देर तक चलने के बाद वह व्यक्ति गांव में जा पहुंचा। गांव के बाहर ही एक घर बना हुआ था। उसने दरवाजे के पास पहुंच कर उसे धीरे से खटखटाया।
दरवाज़े को एक साधिका ने खोला। उसके चेहरे पर एक अद्भुत तेज था। वह व्यक्ति उसे देख कर मंत्रमुग्ध हो गया। साधिका ने उसे अभिवादन करते हुए कहा, 'मैं जानती हूं कि आपको बुद्ध ने भेजा है। आप अंदर आ जाएं।'
वह व्यक्ति घर के अंदर चला गया। साधिका के कहने पर उसने पानी से हाथ मुंह धोया और एक चटाई पर बैठ गया। साधिका ने उसके सामने भोजन की थाली रख दी। वह जल्दी जल्दी भोजन करने लगा।
अचानक उस व्यक्ति की नजर साधिका के पैरों पर पड़ी। उसके पैर बहुत सुंदर थे। वह उन्हें देखता ही रह गया। तभी साधिका ने उसका ध्यान भंग किया। वह बोली, 'जिस व्यक्ति को बुद्ध के चरणों में स्थान मिल जाता है, फिर उसे किसी अन्य के चरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती।'
साधिका की बात सुनकर वह व्यक्ति लज्जित हो गया और नज़रें नीची करके चुपचाप भोजन करने लगा। भोजन करने के बाद साधिका ने कहा, 'आप बहुत दूर से आए हैं। थक गये होंगे। यहीं चटाई पर लेट जाएं, मैं पंखा कर दूंगी।
वह व्यक्ति बहुत थका हुआ था। वह चटाई पर लेट गया और अपनी आंखें बंद कर लीं। साधिका उसे पंखा करने लगी। पर लेटने के बाद भी उस व्यक्ति को चैन नहीं आया। उसने धीरे से अपनी पलकों को खोला और चोर नजरों से साधिका को देखने लगा।
वह सोचने लगा, यह स्त्री कितनी सुंदर है। इसकी वाणी कितनी मोहक है। अगर यह मेरी पत्नी होती, तो मेरा जीवन स्वर्ग बन जाता।
साधिका इसके मन की बात समझ गयी। वह बोली, 'शरीर में कुछ नहीं रखा है। यह केवल मांस, मज्जा और अस्थियों का जोड़ है। जो व्यक्ति इसके आकर्षण से मुक्त हो जाता है, वही सत्य को प्राप्त कर पाता है।'
यह सुनकर वह व्यक्ति घबरा गया। वह चटाई से उठ बैठा और बोला, 'अब मुझे बुद्ध के पास जाना चाहिए। कृपया आप मुझे वह सामान दे दें, जिसके लिए बुद्ध ने कहा था।'
साधिका ने मुस्कराकर जवाब दिया, 'बुद्ध ने आपको जिस कार्य के लिए भेजा था, वह पूर्ण हो चुका है।'
साधिका की यह बात उस व्यक्ति को समझ में नहीं आयी। वह दरवाजे की ओर बढ़ चला। दरवाजे के पास पहुंचकर वह एक क्षण के लिए रुका और पलट कर बोला, 'क्या आप अन्तर्यामी हैं? आपने मेरे मन की बातें कैसे समझ लीं?'
वह स्त्री मुस्कराते हुए बोली, 'बुद्ध की कृपा से मैं मोह, माया से उपर उठ चुकी हूं। इसलिए भावनाओं से निर्लिप्त हूं और किसी के चेहरे को देखकर उसके मन में उठने वाले विचारों को समझ लेती हूं।'
उसकी बातें सुनकर वह व्यक्ति एक बार पुन: लज्जित हुआ और सोचने लगा कि जिस स्त्री ने सच्चे मन से मेरा सत्कार किया, मैं उसके बादे में क्या क्या सोचता रहा।
उसके बाद वह बुद्ध के आश्रम की ओर लौट पड़ा।
आश्रम में पहुंचकर वह व्यक्ति बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा और बोला, 'महात्मन, मुझे क्षमा कर दें। मैं बड़ा पापी हूं।'
उसकी बात सुनकर बुद्ध मुस्कराए और बोले, 'मैंने तुम्हें साधिका के पास इसीलिए भेजा था, ताकि तुम अपने आप को देख सको। अब मुझे बताओ क्या तुम सचमुच मोह और बंधन को त्याग चुके हो?'
वह व्यक्ति कुछ नहीं बोला। वह नज़रें नीची किये चुपचाप खड़ा रहा।
बुद्ध ने कहा, 'बाहरी बंधन और मोह को त्याग्ने से हम बंधन मुक्त नहीं होते। दरअसल बंधन और मोह हमारे भीतर होता है। तुमने परिवार को छोड़ दिया और सोचा कि मैं बंधन मुक्त हो गया। लेकिन जैसे ही तुम्हें अवसर मिला, तुम्हारे भीतर का मोह जाग उठा। और इसी वजह से आज तुम अपने आप को पापी समझ रहे हो।'
'मुझे क्षमा कर दें प्रभु।' उस व्यक्ति ने अपने हाथ जोड़ दिये। फिर वह धीरे से बोला, आप सही कह रहे हैं। मैं केवल अपनी पत्नी से पीछा छुड़ाना चाहता था। वह बहुत बीमार रहती है। एक वर्ष से हमारे बीच सम्बंध भी नहीं बन पाए। मैं कुछ ज्यादा कमाता भी नहीं हूं। इसलिए मैं अपने परिवार के दायित्वों का निवर्हन भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा हूं। शायद इसीलिए मैं अपने परिवार से पीछा छुड़ाना चाहता था। ...पर अब मैं समझ गया हूं मेरा परिवार ही मेरा सत्य है और उसके दायित्वों का निवर्हन ही असली कर्म है।'
बुद्ध बोले, 'मैं जो कुछ भी कहता हूं वह अपने अनुभव के आधार पर कहता हूं। लोग मेरी बातों को सुनते तो हैं, पर वे अपने स्वार्थ के अनुसार ही उसका अर्थ ग्रहण करते हैं। इसीलिए मोह, माया, कामना, इच्छा, वासना, क्रोध को लोग बाहर की ओर खोजते हैं। जबकि यह हमारे भीतर ही हैं। ...हम दूसरों को देखकर तरह तरह की कामना करने लगते हैं। कामना से इच्छा जन्म लेती है, इच्छा से वासना पैदा होती है, और वासना की पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। क्रोध के लिए हम सदैव दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि क्रोध का श्रोत हमारे भीतर है। तुम चाहोगे, तो क्रोध आएगा, तुम चाहोगे, तो क्रोध नहीं आएगा। ...इसी तरह बंधन बाहर नहीं होते, हमारे मन में होते हैं। हम मन से ही किसी से बंध जाते हैं और मन के कारण ही हम दुख पाते हैं। ...लेकिन जो व्यक्ति इन बातों की गहराई तक पहुंच जाता है, वह दु:खों से हमेशा हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।'
इसके बाद उन्होंने सभी लोगों को आशीर्वाद दिया और फिर अपने आश्रम को लौट गये।
अगले दिन उनसे एक व्यक्ति मिलने आया। वह बुद्ध को दण्डवत करता हुआ बोला, 'महात्मन, मैंने कल आपका उपदेश सुना। आपकी बातें मेरे हृदय में उतर गयीं हैं। मैंने अपने बंधनों को तोड़ दिया है, सारी मोह माया का त्याग कर दिया है। अब मैं आपकी शरण में आना चाहता हूं।'
उस व्यक्ति की बातें सुनकर बुद्ध मुस्कराए और धीरे से बोले, 'मुझे विस्तार से बताओ वत्स, तुमने कौन-कौन से बंधन तोड़े और किसका मोह त्याग दिया है?'
वह व्यक्ति बोला, 'मेरे घर पर मेरे बूढ़े माता-पिता और पत्नी है। मेरा एक छोटा बच्चा भी है। मेरी पत्नी बहुत बीमार रहती है। उसके कष्ट देख कर मैं अक्सर सोचता रहता था कि वह मर जाए, तो उसके कष्ट दूर हो जाएं। उसकी वजह से मैं बहुत दुखी रहता हूं। लेकिन कल जब मैंने आपका उपदेश सुना, तो मेरी समझ में आ गया कि मेरे परिवार से मेरा बंधन ही मेरे दु:खों का कारण है। अगर मैं इसके चक्कर में पड़ा रहूंगा तो कभी सत्य को नहीं जान सकूंगा। इसलिए मैं अपने घर को त्याग कर आपके पास आया हूं।'
बुद्ध ने पूछा, 'क्या तुम सचमुच सभी बंधनों से मुक्त हो गये हो? देख लो, कहीं कोई बंधन तुम्हारे पीछे रह तो नहीं गया?'
वह व्यक्ति बोला, 'नहीं प्रभु, मैं अपने जीवन की सारी चीज़ों को पीछे छोड़ आया हूं और अब आगे बढ़ना चाहता हूं।'
बुद्ध ने कहा, 'अगर ऐसी बात है, तो फिर ठीक है। आज तुम यहीं आश्रम में रूको। कल मैं तुम्हें बताउंगा कि तुम्हें क्या करना है।'
बुद्ध ने अपने एक शिष्य की ओर इशारा किया। शिष्य ने उसे आश्रम के अतिथि कक्ष में पहुंचा दिया। वह व्यक्ति उत्सुकतापूर्वक आश्रम की गतिविधियां देखता रहा। उन्हें देखकर वह बहुत प्रसन्न हुआ और अपने सौभाग्य पर इतराता रहा।
अगले दिन बुद्ध ने उस व्यक्ति को एक कार्य सौंपते हुए कहा, 'तुम्हें पूर्व की दिशा में जाना है। वहां पर तुम्हें एक गांव मिलेगा। गांव के बाहर ही एक साधिका का घर है। वह तुम्हें कोई वस्तु देगी। उसे लेकर तुम्हें वापस मेरे पास आना है।'
वह व्यक्ति पूर्व दिशा की ओर चल पड़ा। गर्मी का मौसम था। कुछ ही देर में वह पसीने से तर बतर हो गया। उसे प्यास भी सताने लगी। वह सोचने लगा कि अगर इस समय मैं अपने घर पर होता, तो इस तरह गर्मी में पसीना नहीं बहाना पड़ता।
कुछ दूर और चलने पर उसे भूख भी सताने लगी। पर वह एक सुनसान और बंजर रास्ता था। आसपास न तो कोई पेड़ था और न ही पोखर तालाब। वह पुन: सोचने लगा कि अगर मैं इस समय अपने घर पर होता, तो अपनी पत्नी के हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन कर रहा होता। पता नहीं क्यों बुद्ध ने मुझे गर्मी में इतनी दूर भेज दिया।
काफी देर तक चलने के बाद वह व्यक्ति गांव में जा पहुंचा। गांव के बाहर ही एक घर बना हुआ था। उसने दरवाजे के पास पहुंच कर उसे धीरे से खटखटाया।
दरवाज़े को एक साधिका ने खोला। उसके चेहरे पर एक अद्भुत तेज था। वह व्यक्ति उसे देख कर मंत्रमुग्ध हो गया। साधिका ने उसे अभिवादन करते हुए कहा, 'मैं जानती हूं कि आपको बुद्ध ने भेजा है। आप अंदर आ जाएं।'
वह व्यक्ति घर के अंदर चला गया। साधिका के कहने पर उसने पानी से हाथ मुंह धोया और एक चटाई पर बैठ गया। साधिका ने उसके सामने भोजन की थाली रख दी। वह जल्दी जल्दी भोजन करने लगा।
अचानक उस व्यक्ति की नजर साधिका के पैरों पर पड़ी। उसके पैर बहुत सुंदर थे। वह उन्हें देखता ही रह गया। तभी साधिका ने उसका ध्यान भंग किया। वह बोली, 'जिस व्यक्ति को बुद्ध के चरणों में स्थान मिल जाता है, फिर उसे किसी अन्य के चरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती।'
साधिका की बात सुनकर वह व्यक्ति लज्जित हो गया और नज़रें नीची करके चुपचाप भोजन करने लगा। भोजन करने के बाद साधिका ने कहा, 'आप बहुत दूर से आए हैं। थक गये होंगे। यहीं चटाई पर लेट जाएं, मैं पंखा कर दूंगी।
वह व्यक्ति बहुत थका हुआ था। वह चटाई पर लेट गया और अपनी आंखें बंद कर लीं। साधिका उसे पंखा करने लगी। पर लेटने के बाद भी उस व्यक्ति को चैन नहीं आया। उसने धीरे से अपनी पलकों को खोला और चोर नजरों से साधिका को देखने लगा।
वह सोचने लगा, यह स्त्री कितनी सुंदर है। इसकी वाणी कितनी मोहक है। अगर यह मेरी पत्नी होती, तो मेरा जीवन स्वर्ग बन जाता।
साधिका इसके मन की बात समझ गयी। वह बोली, 'शरीर में कुछ नहीं रखा है। यह केवल मांस, मज्जा और अस्थियों का जोड़ है। जो व्यक्ति इसके आकर्षण से मुक्त हो जाता है, वही सत्य को प्राप्त कर पाता है।'
यह सुनकर वह व्यक्ति घबरा गया। वह चटाई से उठ बैठा और बोला, 'अब मुझे बुद्ध के पास जाना चाहिए। कृपया आप मुझे वह सामान दे दें, जिसके लिए बुद्ध ने कहा था।'
साधिका ने मुस्कराकर जवाब दिया, 'बुद्ध ने आपको जिस कार्य के लिए भेजा था, वह पूर्ण हो चुका है।'
साधिका की यह बात उस व्यक्ति को समझ में नहीं आयी। वह दरवाजे की ओर बढ़ चला। दरवाजे के पास पहुंचकर वह एक क्षण के लिए रुका और पलट कर बोला, 'क्या आप अन्तर्यामी हैं? आपने मेरे मन की बातें कैसे समझ लीं?'
वह स्त्री मुस्कराते हुए बोली, 'बुद्ध की कृपा से मैं मोह, माया से उपर उठ चुकी हूं। इसलिए भावनाओं से निर्लिप्त हूं और किसी के चेहरे को देखकर उसके मन में उठने वाले विचारों को समझ लेती हूं।'
उसकी बातें सुनकर वह व्यक्ति एक बार पुन: लज्जित हुआ और सोचने लगा कि जिस स्त्री ने सच्चे मन से मेरा सत्कार किया, मैं उसके बादे में क्या क्या सोचता रहा।
उसके बाद वह बुद्ध के आश्रम की ओर लौट पड़ा।
आश्रम में पहुंचकर वह व्यक्ति बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा और बोला, 'महात्मन, मुझे क्षमा कर दें। मैं बड़ा पापी हूं।'
उसकी बात सुनकर बुद्ध मुस्कराए और बोले, 'मैंने तुम्हें साधिका के पास इसीलिए भेजा था, ताकि तुम अपने आप को देख सको। अब मुझे बताओ क्या तुम सचमुच मोह और बंधन को त्याग चुके हो?'
वह व्यक्ति कुछ नहीं बोला। वह नज़रें नीची किये चुपचाप खड़ा रहा।
बुद्ध ने कहा, 'बाहरी बंधन और मोह को त्याग्ने से हम बंधन मुक्त नहीं होते। दरअसल बंधन और मोह हमारे भीतर होता है। तुमने परिवार को छोड़ दिया और सोचा कि मैं बंधन मुक्त हो गया। लेकिन जैसे ही तुम्हें अवसर मिला, तुम्हारे भीतर का मोह जाग उठा। और इसी वजह से आज तुम अपने आप को पापी समझ रहे हो।'
'मुझे क्षमा कर दें प्रभु।' उस व्यक्ति ने अपने हाथ जोड़ दिये। फिर वह धीरे से बोला, आप सही कह रहे हैं। मैं केवल अपनी पत्नी से पीछा छुड़ाना चाहता था। वह बहुत बीमार रहती है। एक वर्ष से हमारे बीच सम्बंध भी नहीं बन पाए। मैं कुछ ज्यादा कमाता भी नहीं हूं। इसलिए मैं अपने परिवार के दायित्वों का निवर्हन भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा हूं। शायद इसीलिए मैं अपने परिवार से पीछा छुड़ाना चाहता था। ...पर अब मैं समझ गया हूं मेरा परिवार ही मेरा सत्य है और उसके दायित्वों का निवर्हन ही असली कर्म है।'
बुद्ध बोले, 'मैं जो कुछ भी कहता हूं वह अपने अनुभव के आधार पर कहता हूं। लोग मेरी बातों को सुनते तो हैं, पर वे अपने स्वार्थ के अनुसार ही उसका अर्थ ग्रहण करते हैं। इसीलिए मोह, माया, कामना, इच्छा, वासना, क्रोध को लोग बाहर की ओर खोजते हैं। जबकि यह हमारे भीतर ही हैं। ...हम दूसरों को देखकर तरह तरह की कामना करने लगते हैं। कामना से इच्छा जन्म लेती है, इच्छा से वासना पैदा होती है, और वासना की पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। यह सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। क्रोध के लिए हम सदैव दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं। जबकि क्रोध का श्रोत हमारे भीतर है। तुम चाहोगे, तो क्रोध आएगा, तुम चाहोगे, तो क्रोध नहीं आएगा। ...इसी तरह बंधन बाहर नहीं होते, हमारे मन में होते हैं। हम मन से ही किसी से बंध जाते हैं और मन के कारण ही हम दुख पाते हैं। ...लेकिन जो व्यक्ति इन बातों की गहराई तक पहुंच जाता है, वह दु:खों से हमेशा हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।'
दोस्तो, हमें उम्मीद है कि आपको बुद्ध की ये कहानी Gautam Buddha Story 'हमें दुख कौन देता है' पसंद आई होगी। आप चाहें, तो गौतम बुद्ध की यह कहानी Gautam Buddha Story in hindi यूट्यूब पर भी सुन सकते हैं। यदि आपको बुद्ध की कहानियों Buddha Stories में रूचि है, तो आप यहां पर क्लिक करके बुद्ध की प्रेरक कहानियों Buddha Stories in Hindi का आनंद ले सकते हैं।
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