धर्म की असली व्‍याख्‍या।

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('जनसंदेश टाइम्स', 23 मार्च, 2011 में  'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्ल...

('जनसंदेश टाइम्स', 23 मार्च, 2011 में 
'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग समीक्षा)

यह हमारा सौभाग्‍य ही रहा है कि आदिकाल से ही हमारे देश में एक से बढ़कर एक ज्ञानीजन पैदा होते रहे हैं, जिन्‍होंने अपने विचारों से समाज को एक सार्थक दिशा देने का काम किया। लेकिन इसी के साथ ही हमारे दुर्भाग्‍य के रूप में प्रारम्‍भ से ही यहां ऐसे निकृष्‍ट सोच के लोग भी पाए जाते रहे, जिन्‍होंने दीमक का काम किया और अपने कुप्रयासों से अच्‍छी से अच्‍छी विचारधारा और पद्धति को भी रसातल में पहुंचा दिया। आर्य समाज इसका ज्‍वलंत उदाहरण है।

1857 की क्रान्ति के विफलता के बाद स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती द्वारा स्‍थापित आर्य समाज के बारे में ज्‍यादातर लोगों का यही मानना है कि यह एक प्रकार का धर्म है, जबकि सत्‍य यह है कि यह एक जीवन पद्धति थी, जिसका उद्देश्‍य था समाज में व्‍याप्‍त ढ़ोंग और पाखण्‍ड का नाश करना तथा सामाजिक चेतना जगा कर अंग्रेजों से हिन्‍दुस्‍तान को आजाद करना। अपनी इस क्रान्तिकारी सोच के कारणही दयानंद सरस्‍वती अंग्रेजों के बीच बाग़ी फ़कीर के रूप में जाने गये और अंग्रेज सरकार द्वारा न सिर्फ उन्‍हें गिरफ्तार किया गया वरन उनके ऊपर इलाहाबाद हाईकोर्ट में राष्‍ट्रद्रोह का मुकदमा भी चलाया गया।

दयानंद सरस्‍वती के इन्‍हीं क्रान्तिकारी विचारों को अगर आप पढ़ना चाहते हैं और पाखंड तथा ढ़ोंग से रहित हिन्‍दू धर्म की व्‍याख्‍या जानना चाहते हैं, तो विजय माथुर का ब्‍लॉग क्रान्ति स्‍वर (http://krantiswar.blogspot.com/) आपके लिए ही बना है।

विजय माथुर उन लोगों में से नहीं हैं, जो किसी विचारधारा के गुलाम होते हैं। जहां एक ओर वे गर्व के साथ पाठकों को बताते हैं कि स्‍वराज्‍य शब्‍द के आविष्‍कारक स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्‍थापना की, वे छावनियों वाले शहर थे और स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय जेल जाने वालों में 85 प्रतिशत व्‍यक्ति आर्य समाजी होते थे, वहीं वे अपनी पोस्‍ट ॐ नमः शिवाय च में साहसपूर्वक यह भी स्‍वीकार करते हैं कि आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी को दण्ड देने में लगे हुए हैं।

विजय माथुर स्‍वयं को ढ़ोंग और पाखण्‍ड के विरोधी के रूप में प्रस्‍तुत करते हैं और आमजन को सच्‍चाई से अवगत करने की अभिलाषा रखते हैं। उन्‍होंने सत्‍यार्थ प्रकाश की रौशनी में अपनी सोच विकसित की है और अपनी इसी दृढ़ इच्‍छाशक्ति के कारण सच को सच कहने की हिम्‍मत जुटाई है। वे अपनी एक पोस्‍ट कुल क्रूर कुरीति तोड़ेंगे, सब दुष्कर्मों को छोड़ेंगे में समाज में व्‍याप्‍त ढ़ोंग और आडम्‍बरों का चित्रण करते हुए लिखते हैं: जियत पिता से दंगम दंगा/मरे पिता पहुँचायें गंगा/जियत पिता को  पूँछी बात/ मरे पिता को खीर और भात/जियत पिता को घूंसे लात/मरे पिता को श्राद्ध करात/जियत पिता को डंडा, लठिया/मरे पिता को तोसक तकिया/जियत पिता को कछू न मान/मरत पिता को पिंडा दान। 

विजय माथुर का यह दृढ़ मत है कि जो सोच, जो विचारधारा हमारे वर्तमान का विरोध करती है, उसे बदल देने की आवश्‍यकता है। वे अपनी इसी सोच के विस्‍तार देते हुए कहते हैं कि आज जनसंख्‍या विस्‍फोट और वनों के क्षरण के कारण पृथ्‍वी का अस्तित्‍व संकट में पड़ता नजर आ रहा है। ऐसे में हमें दाह संस्‍कार हेतु विद्युत शव-दाह ग्रहों का प्रयोग करना चाहिए। इससे एक तो प्रदूषण नहीं होगा और साथ ही वृक्षों का जीवन भी बचेगा। लेकिन अपनी इस सोच को व्‍यक्‍त करते हुए वे करोड़ों लोगों के दिलों में रची-बसी धार्मिक मान्‍यताओं को भी पूरी तरह नहीं बिसराते। इसीलिए वे साथ ही यह सुझाव भी देते हैं कि इसके बाद मृतक की आत्‍मा की शान्ति के लिए छोटा सा हवन किया जा सकता है।

विजय अपने जीवन में व्‍यवहारिक एवं सामाजिक पक्षों को वरीयदता देते हैं। यही कारण है कि वे मेडिकल साइंस की जरूरतों को समझते हुए मृत्‍यु के उपरांत देहदान की वकालत करते हुए भी नजर आते हैं। वे अपने लेख में सुझाव देते हुए कहते हैं कि यदि हम इस व्यवस्था को अपना लें तो मानव अंगों की तस्करी रोकी जा सकती है तथा गरीब लोगों का शोषण भी समाप्त किया जा सकता है। साथ ही वे धार्मिक मान्‍यताओं के मद्देनजर यह भी बताना नहीं भूलते कि इस व्यवस्था में भी बाद में घर पर मृतक की आत्मा की शांति हेतु हवन वैदिक पद्धति से किया जा सकता है।

ऐसा नहीं है कि विजय कोई नास्तिक व्‍यक्ति हैं। वे ईश्‍वर में पूरी आस्‍था रखते हैं और परमात्‍वा को प्राप्‍त करने के लिए भक्ति को साधन मानते हैं। लेकिन उनकी भक्ति दिखावा नहीं है। वे अपनी भक्ति को स्‍पष्‍ट करते हुए कहते हैं: भक्ति का अक्षर भजन हेतु है, अक्षर कर्म (निष्‍काम कर्म) का प्रतीक है और ति में त्‍याग की भावना निहित है। इसीलिए निष्काम कर्म करते हुए त्याग की भावना से जो भजन किया जाता है उसे ही भक्ति कहते हैं।

विजय का मानना है कि भारतीय समाज में जो पर्व प्रचलित हैं, उनके पीछे शुद्ध वैज्ञानिक कारण रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे समाज में ढ़ोंगियों का बोलबाला होता गया और वे पर्वों के मूल में स्‍थापित वैज्ञानिक कारणों को भूलकर लकीर के फकीर बनते गये। वे अपनी पोस्‍ट मकर-संक्रांति का महत्त्व में इस अवसर पर छिलकों वाली उर्द की डाल तथा चावल की खिचडी पका कर खाने के कारणों को उद्घाटित करते हुए कहते हैं मकर संक्रान्ति के बाद सूर्य की रश्मियाँ तीव्र होने लगतीं हैं; अतः शरीर में पाचक अग्नि उदीप्त करती है तथा उर्द की डाल क़े रूप में प्रोटीन व चावल क़े रूप में कार्बोहाईड्रेट जैसे पोषक तत्वों को शीघ्र घुलनशील कर देती है। इसीलिये इस पर्व पर खिचडी खाने व दान करने का महत्त्व निर्धारित किया गया है। ..गुड़ रक्तशोधन का कार्य करता है तथा तिल शरीर में वसा की आपूर्ति करता है, इस कारण गुड़ व तिल क़े बने पदार्थों को भी खाने तथा दान (जिससे गरीबों तक भी स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ पहुंच सकें) देने का महत्त्व रखा गया है।

इसी प्रकार विजय ने अपनी पोस्‍ट श्रीमद देवी भागवत-वैज्ञानिक व्याख्या में नवरात्रि के पर्व को भी ऋतुओं पर आधारित शरीर को पुष्‍ट करने वाला अवसर बताया है, जिसमें विभिन्‍न आयुर्वेद महत्‍व के तत्‍वों को लेने का प्राविधान किया गया था। वे किशोर चन्द्र चौबे के हवाले से लिखते हैं कि मार्कंडेय चिकित्सा-पद्धति में नव-रात्र की नौ देवियों क़े औषधीय रूप (क्रमश: हरड़, ब्राह्मी, चंद्रसूर, पेठा, अलसी, मोइया, नागदौन, तुलसी एवं शतावरी) का विषद विवेचन किया गया है। उनका मानना है कि बदलते मौसम में इन औषधियों का सेवन करके और निराहार रह कर मानव स्‍वास्‍थ्‍य की रक्षा नवरात्रि का प्रमुख उद्देश्‍य था, लेकिन आज पौराणिक कर क्या रहें हैं- केवल ढोंग  पाखण्ड, जिससे ढोंगियों की रोजी तो चल जाती है लेकिन मानव-कल्याण कदापि सम्भव न होने क़े कारण जनता ठगी जाती है।

विजय अपने ब्‍लॉग में बार-बार धर्म, ईश्‍वर, भक्ति एवं पूजा पद्धतियों से जूझते हुए नजर आते हैं। इन मुठभेड़ों का कारण है सत्‍य को उद्घाटित करना, समाज में व्‍याप्‍त भ्रम के जाल को काटना। वे जहां एक ओर भक्ति की विवेचना करते मिलते हैं, दूसरी ओर (पोस्‍ट प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है-यह दुनिया अनूठी है में) भगवान को भी व्‍याख्‍यायित करने से नहीं चूकते- भगवान क्या है उसे समझना बहुत ही सरल है। भ-अर्थात भूमि,-अर्थात गगन, व्-अर्थात वायु, I-अर्थात अनल (अग्नि) और -अर्थात नीर यानि जल, प्रकृति के इन पांच तत्वों का समन्वय ही भगवान है, जो सर्वत्र पाए जाते हैं। इन्हीं के द्वारा जीवों की उत्पत्ति, पालन और संहार होता है तभी तो GOD अर्थात Generator,Operator ,Destroyer. इन प्राकृतिक तत्वों को किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसलिए ये खुदा हैं।

विजय अपने ब्‍लॉग में सिर्फ धार्मिक सिद्धांतों के व्‍याख्‍याकार के रूप में ही नहीं नजर आते हैं, उन्‍होंने कुछ ऐसे लेख भी लिखे हैं, जिनमें वे एक क्रान्तिकारी चिन्‍तक के रूप में सामने आए हैं। ऐसी ही दो पोस्‍टें हैं रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना तथा सीता का विद्रोह

रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना एक वृहद पोस्‍ट है,‍ जिसमें एक ओर धरती पर जीवन के विकास क्रम को विजय ने अपने अंदाज में समझाया है, दूसरी ओर उन्‍होंने आर्यों एवं अनार्यों के द्वन्‍द्व के बहाने रामायण की कथा को एक नया जामा पहनाया है। वे बताते हैं कि कुबेर के नाना भारद्वाज ऋषि ने आर्यावर्त के समस्‍त ऋषियों की एक सभा में सर्वसम्‍मति से यह पहले से ही तय कर दिया था कि दशरथ का जो प्रथम पुत्र उत्‍पन्‍न हो, उसका नामकरण राम हो तथा उसे राष्‍ट्र रक्षा के लिए 14 वर्ष का वनवास प्रदान करके रावण के साम्राज्‍यवादी इरादों को नेस्‍तानाबूद किया जाए। विजय इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए विभिन्‍न ऋषियों के आश्रमों को डिफेंस सेंटरों के रूप में परिभाषित करते हैं और राम रावण युद्ध से जुड़े विभिन्‍न प्रसंगों को आश्‍चर्यजनक रूप से अपने सिद्धांत में फिट कर देते हैं। पोस्‍ट के अंत में वे राम के अवतार रूप में प्रचलित छवि को व्‍यवहारिक रूप देते हुए कहते हैं: राम के असीम त्याग,राष्ट्र-भक्ति और उच्चादर्शों के कारण ही आज हम उनका गुण-गान करते हैं-मानो ईश्वर इस देश की रक्षा के लिए स्वयं ही अवतरित हुए थे।

इसी प्रकार सीता का विद्रोह में विजय सीता-निष्‍काषन की घटना के लिए धोबी द्वारा लगाए गये लांछन को कारक नहीं मानते। वे उसकी विवेचना करते हुए कहते हैं कि साम्राज्यवादी रावण क़े अवसान क़े बाद राम अयोध्‍या क़े शासक क़े रूप में नहीं विश्वपति क़े रूप में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे। यही कारण है कि उन्‍होंने सत्ता सम्हालते ही उस समय प्रचलित वेदोक्त-परिपाटी का त्याग कर ऋषियों को मंत्री मण्डल से अपदस्थ कर दिया था। वे बताते हैं कि महारानी सीता जो ज्ञान-विज्ञान व पराक्रम तथा बुद्धि में किसी भी प्रकार राम से कम न थीं। वे उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकती थीं। जब उन्होंने देखा कि राम उनके विरोध की परवाह नहीं करते हैं तो उन्होंने ऋषीवृन्द की पूर्ण सहमति एवं सहयोग से राम-राज्य को ठुकराना ही उचित समझा। अपनी इस स्‍थापना के समर्थन में वे तर्क देते हुए कहते हैं कि यही कारण था कि जब लव-कुश द्वारा राम की सेना को परास्‍त करने के बाद राम ने उन्‍हें वापस बुलवाया, तो सीता ने महल में जाने से इनकार कर दिया और अपनी इहलीला समाप्‍त कर ली।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि क्रान्ति स्‍वर भारतीय संस्‍कृति को व्‍यवहारिक नजरिए से देखने का एक शानदार माध्‍यम है। भले ही विजय कहीं-कहीं सांस्‍कृतिक आयामों को व्‍यवहारिकता प्रदान करने के प्रयास में सरलीकरण के फेर में फंसते से नजर आते हैं, लेकिन कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि उनकी दृष्टि ज्‍यादा व्‍यवहारिक और विश्‍वसनीय प्रतीत होती है। उन्‍होंने समाज को पाखण्‍ड और ढ़ोंग से मुक्‍त कराने का जो बीड़ा उठाया है, क्रान्ति स्‍वर उसकी दिशा में एक सराहनीय प्रयास है।
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COMMENTS

BLOGGER: 27
  1. विजय माथुर जी ने ‘क्रांति स्वर‘ के माध्यम से अपनी विचारधारा को पेश करने की एक अनाधिकार चेष्टर की है। वर्तमान काल में यह देखने में आ रहा है कि जो आदमी धर्म के बुनियादी सिद्धांतों तक से कोरा है और जिसके आचरण में धर्म कम और पश्चिमी कल्चर ज़्यादा है , वह भी नए नए मत खड़े करने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि विजय माथुर जी सत्य को न पा सके।
    दयानंद जी देवी भागवत पुराण सहित सभी पुराणों के विरूद्ध थे। इन्हें वे नदी में डुबोने की प्रेरणा देते थे और मानते थे कि इनमें ईश्वर और ऋषियों की निंदा भरी हुई है। एक ओर तो विजय माथुर दयानंद जी के सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं और दूसरी ओर वे पुराणों से प्रमाण देते हैं जिन्हें नदी में डुबाने के बाद ही दयानंद जी को उनके गुरू बिरजानंद जी ने अपने शिष्यत्व में स्वीकार किया था। यह एक खुला विरोधाभास है।
    विजय माथुर जी की कोशिश तो यह रही होगी कि रामायण के अनेक प्रसंगों पर उठने वाली आपत्तियों का निराकरण कर दिया जाए और यह प्रयास वाक़ई स्वागतयोग्य है । इसका तरीक़ा यह है कि जो भी प्रसंग श्रीरामचंद्र जी या सीता माता के प्रति लांछन लगाने वाला सिद्ध हो, उसे एक क्षेपक मानकर रामायण का अंश न माना जाए, बस। हरेक आपत्ति का निराकरण हो जाएगा। मैं ऐसे ही करता हूं और इसीलिए मुझे श्रीरामचंद्र जी, उनके पूर्वजों या उनके वंशजों के प्रति कोई भी अश्रृद्धा पैदा नहीं होती।
    जो व्यक्ति मेरे मार्ग से हटकर चलेगा, वह पुरानी चली आ रही आपत्तियों का निराकरण तो कर नहीं पाएगा बल्कि नई और खड़ी कर देगा, जैसे कि विजय माथुर जी ने कर डाली हैं और कह दिया है कि
    ‘साम्राज्यवादी रावण क़े अवसान क़े बाद राम अयोध्‍या क़े शासक क़े रूप में नहीं विश्वपति क़े रूप में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे। यही कारण है कि उन्‍होंने सत्ता सम्हालते ही उस समय प्रचलित वेदोक्त.परिपाटी का त्याग कर ऋषियों को मंत्री मण्डल से अपदस्थ कर दिया था। वे बताते हैं कि महारानी सीता जो ज्ञान.विज्ञान व पराक्रम तथा बुद्धि में किसी भी प्रकार राम से कम न थीं। वे उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकती थीं। जब उन्होंने देखा कि राम उनके विरोध की परवाह नहीं करते हैं तो उन्होंने ऋषीवृन्द की पूर्ण सहमति एवं सहयोग से राम.राज्य को ठुकराना ही उचित समझा। अपनी इस स्‍थापना के समर्थन में वे तर्क देते हुए कहते हैं कि यही कारण था कि जब लव.कुश द्वारा राम की सेना को परास्‍त करने के बाद राम ने उन्‍हें वापस बुलवायाए तो सीता ने महल में जाने से इनकार कर दिया और अपनी इहलीला समाप्‍त कर ली।‘
    इसमें उन्होंने श्रीरामचंद्र जी और सीता माता पर निम्न इल्ज़ाम लगाए हैं -
    1. श्रीरामचंद्र जी विश्वपति के रूप में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे।
    2. उन्होंने सत्ता सम्हालते ही वेदोक्त परिपाटी का त्याग दिया था।
    3. उन्होंने अपने मंत्री मंडल से ऋषियों को अपदस्थ कर दिया था।
    4. सीता जी का उनसे कोई मतभेद था और उन्होंने स्वयं श्रीरामचंद्र जी के साथ रहने के बजाय उन्हें त्याग देना उचित समझा।
    5. सीता माता ने श्रीरामचंद्र जी के साथ रहने की अपेक्षा आत्महत्या करना पसंद किया।

    आखि़र धर्म की इस सर्वथा नवीन व्याख्या को क्रांतिकारी कैसे कहा जा सकता है ?, जो कि सिरे से ही झूठ है।
    श्रीरामचंद्र जी ने कभी भी वेदोक्त रीति-नीति का त्याग नहीं किया और न ही अपने मंत्री मंडल से कभी ऋषियों को निकाला। उनके गुरू वसिष्ठ आदि सदैव उनके कुलगुरू रहे और वे उनसे सदैव परामर्श लेते रहे। सीता माता ने वन में लक्ष्मण जी से जो कुछ कहा, वह इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि वे आजीवन अपने पति के साथ ही रहना चाहती थीं।
    विजय माथुर जी के विचारों को जितना आपकी पोस्ट के द्वारा जाना, उन पर संक्षेप में मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि इसी तरह की कोशिशें पूर्व में तुलसी आदि भी कर चुके हैं लेकिन इस तरह की कोशिशों से आपत्तियों का निराकरण कभी नहीं हुआ बल्कि नई और खड़ी हो जाती हैं।
    मैं एक आर्य हूं और आर्य महापुरूषों में आस्था रखता हूं। इसी नाते मैं सादर विनती करता हूं कि राम-सीता के आदर्श चरित्र को और ज़्यादा कलंकित करने के प्रयास न किए जाएं।
    धन्यवाद !
    http://vedquran.blogspot.com/2010/08/i-like-ramchandra-ji-anwer-jamal.html

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  2. आदरणीय जमाल जी, हर कोई आपके चश्‍मे से देखे यह जरूरी नहीं है।

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  3. "जियत पिता से दंगम दंगा/मरे पिता पहुँचायें गंगा/...".आदि...-----जमाल जी ये बातें कोई विजय माथुर जी ने नहीं कही हैं, न नई बातें है,,, अपितु हिन्दू समाज में सदियों से ये कहवतें च्ली आरही हैं....क्योंकि हिन्दू समाज सहज़ व सबको साथ क\लेकर चलने वाला समाज है अतः अनाचरण वाले लोगों के लिये ये कहवतें सदा से मौज़ूद हैं...
    ---रावन का वध एक पूर्व निर्धारित योजना थी---सभी को पता है एवम विभिन्न राम कथाओं में इसे पहले ही वर्णन किया जा चुका है....
    ---मेरी स्वय्ं की रचना महकाव्य-शूर्पणखा में यह तथ्य वर्णित है( पढिये AIBS पर )...यहां तक कि यदि ध्यान से पढेंगे तो गूढ व सूत्र रूप में यह तथ्य वाल्मीकि व तुलसी की रामकथा में भी निहित है ।
    ---ईश्वर तो वेदान्त के अनुसार कण कण में, प्रत्येक तत्व है..चाहे जिसे ईश्वर मानिये...यह कौन सी नवीन बात है ...हां किसी एक वस्तु को ईश्वर मानने जैसी तथ्यात्मक त्रुटि करनी है तो विजय जी के बताये ईश्वर को मान लीजिये....
    ---हं चिन्तन करने को विजय जी स्वतन्त्र हैं और उन्हें बधाई...
    ---अनवर जमाल साहब ने बहुत ही सटीक तथ्य रखे हैं उन्हें भी साधुवाद ...

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  4. इस ब्लॉग की विषय-वस्तु संवेदनशील है जिस पर सम्यक् लेखन के कारण विवाद की संभावना न्यूनतम रही है। अच्छा परिचय कराया आपने।

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  5. विजय जी को बधाई
    बाकी कुछ लोग तो सदा प्रलाप करने में लगे रहते है

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  6. आपने तमाम प्रसंगों को एक नए दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया है....विचारणीय है।

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  7. Ye do-do pralapiyon ko ek sath dek kar shanka ho rahi hai, dono ne ek hi party join kar lee kya?

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  8. माथुर जी का प्रयास सराहनीय है। आज समाज को ऐसे ही लोगों की आवश्‍यकता है।

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  9. बहुत अच्छा लिखा है, विजय माथुर जी को बधाई,

    कमेन्ट देने वाले से तो कहूँ ही क्या? इनकी बीबी इनको कैसे झेलती होगी यह समझ में नही आता :D समझदार को इशारा काफी

    अब कोई ब्लोगर नहीं लगायेगा गलत टैग !!!

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  10. काफी अच्छी बात लिखी है आपने पाने इस पोस्ट में ! अच्छा लगा !हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर जरुर आना !
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    Lyrics Mantra
    Shayari Dil Se
    Latest News About Tech

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  11. ब्लागवाणी का काम ब्लागों और ब्लागरों के बारे में जानकारी देना और उन की चर्चा करना है और आप ये काम बहुत खूबसूरती से कर रहे हैं।

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  12. वाटिका में अनेक प्रकार के पुष्प खिलतें हैं सबका सौंदर्य अपना अपना.यदि भाव 'सत्यम शिवम सुन्दरम'की भावना से पोषित हो तो सभी अच्छे लगते हैं.बेवजह के खंडन मंडन को छोड़ जो अच्छा लगे अपना लिया जाये,बुरा लगे छोड़ दिया जाये.आर्य समाज,सनातन,इस्लाम या अन्य किसी भी सोच को इसी प्रकार से देखा जाना चाहिये.जरूरी नहीं सभी का हर बात पर मतैक्य हो.

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  13. विजय माथुर जी के विचारों से हम भी सहमत हैं । आज ढोंग और पाखंड ज्यादा चल रहा है समाज में । आर्य समाज में इसी का खंडन किया गया है , जो सर्वथा उचित है ।

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  14. जाकिर अली जी, मुझे अपने ब्लॉग पर आपका लिंक मिला अत: यहाँ उपस्तित हुआ हूँ. आपने विजय माथुर जी के ब्लॉग का महिमा वर्णन कर रखा है....पहली बात क्यों ? आप भी एक ब्लोगर हैं और वो भी .... अपने ब्लॉग की मार्केटिंग वो भी कर सकते थे या हैं ..... जरूरी है आपने ही करनी थी.

    पोस्ट तो आपने जो लिखी सो लिखी ...... आभार(?) देता हूँ की श्री विजय माथुर जी के ब्लॉग तक पहुचाया.... अभी उनका लेखन देखूँगा. ... उसके बाद ही आप आभार के हक़दार हैं.

    दूसरी बात, हिंदू धर्म के पुराण और उपनिशेद में ऐसे शलोक हैं की कोई भी विद्वान (डॉ. जमाल जैसा) पढ़ कर अपने अनुसार व्याख्या कर सकता है...... न केवल व्याख्या कर सकता है, अपितु आप जैसों के ब्लॉग पर आकार उसकी मार्केटिंग भी कर सकता है, शुक्र है चिट्ठाजगत बंद हो गया.....

    हिंदू धर्म के पुराण और उपनिशेद की तो वही बात है, जो भी आवे राजी जावे, यानी जिसने जैसा समझा वैसे ही व्याख्या के लिए स्वतंत्र है.......ये पाकिस्तान या फिर कोई अन्य मुस्लिम राष्ट्र तो है नहीं, की कुरआन की एक आयत की गलत व्याख्या करने पर इश निंदा कानून लागू कर दिया जाए.

    जनाब जाकिर अली, कृपया अपने ब्लॉग पर टीप को मोडेरत करें ताकि कोई अनुचित टीप प्रकाशित न हो........ डॉ. जमाल साहिब की टीप तो ऐसे होती है की मेरे जैसा कोई भी स्वेदनशील ब्लोगर/पाठक धोखा खा जाए.

    मैं आपको कोई पुराना नहीं जानता - हो सकता है आप ठीक हो, जैसा की अपने प्रति टीप में कहा है : ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…
    आदरणीय जमाल जी, हर कोई आपके चश्‍मे से देखे यह जरूरी नहीं है।

    पर डॉ. जमाल की टीप जरूरी नहीं थी, फिर भी आपने छपी, - मैं आपके ब्लॉग पर आकार निराश ही हुआ हूँ.

    नमस्कार

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  15. वाह वाह के कहे आपके शब्दों के बारे में जीतन कहे उतन कम ही है | अति सुन्दर
    बहुत बहुत धन्यवाद् आपको असी पोस्ट करने के लिए
    कभी फुरसत मिले तो मेरे बलों पे आये
    दिनेश पारीक

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  16. Deepak ji, Mera apna maanna hai ki ashmatiyon athva virodh men aayi tippadiyon ko prakashit kiya jana chahiye, basharte unmen apshabdon ka ishtemal na kiya gaya ho.

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  17. ज़ाकिर जी ,
    धन्यवाद कि 'क्रांति स्वर 'को आपने 'जन सन्देश टाईम्स'
    में प्रस्तुत किया ;इससे पूर्व रवीश जी ने मेरे 'विद्रोही स्व-स्वर में'को हिंदुस्तान में स्थान दिया था.आपने अपने ब्लाग में भी स्थान दिया जिसका कुछ विद्वानों ने विरोध किया है.मैं स्पष्ट करना चाहूँगा -मेरा लेखन आज से ५० -६० वर्ष आगे आने वाली पीढ़ियों का हित ध्यान में रख कर है न कि वर्तमान हानि-लाभ को सोच कर.जो लोग दूरदर्शी दृष्टिकोण वाले हैं और भावी पीढ़ियों के हितचिन्तक हैं उन्हें तो मेरा लेखन पसंद आ जाता है परन्तु जो विद्वान 'मैं हूँ..मैं हूँ...मैं हूँ...'के अहंकार से ग्रस्त हैं तथा अपने सिवा किसी और को कुछ समझते ही नहीं उनके लिए मेरा लेखन सिर्फ कूड़ा-कचरा ही है.'सत्य'स्वीकार करना ऊंचे लोगों के बूते का नहीं है.लेखन तो मैं १९७३ से २१ वर्ष की उम्र से कर रहा हूँ विभिन्न अखबारों ,मैगजीन्स में विचार छप चुके हैं.आगरा के 'सप्तदिवा साप्ताहिक ' और 'अग्रमन्त्र'त्रैमासिक में सहायक संपादक भी रहा हूँ ,परन्तु ब्लाग जगत के फासिस्ट विद्वानों जैसे कहीं नहीं मिले.इन फासिस्टों का बस चले तो ये विरोध की बजाये 'क़त्ल'ही कर डालेंगे.

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  18. ---दीपक बाबा, डा जमाल की टिप्पणी क्यों नहीं छापने योग्य है ,एक तरफ़ आप अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के कारण ही विजय जी की बातों का समर्थन और दूसरी ओर टिप्पणी न छापने का जोर...भ्रमात्मक स्थिति है...
    ---डा दराल जी..स्वामी दयानन्द जी ने सिर्फ़ सामाजिक व धार्मिक बुराइयों का( हर धर्म की) खन्डन किया था,धर्म व धार्मिक देवताओं--राम-सीता आदि की न कभी बुराई की न खन्डन न आलोचना न चरित्र हनन... बात महापुरुषॊं के चरित्र हनन की है जो अनाडी, अग्यानी, धर्म की गहनता से अनजान लोग अक्सर करते पाये जाते हैं यह कोई नयी बात नहीं उन्हीं में से एक ये विजय व उनके समर्थक जाकिर भी है तो क्या हुआ....
    --- विजय जी, क्रान्तियां गुणात्मक व रचनात्मक कार्य करने से आती हैं --चरित्र हनन व भ्रान्ति पूर्ण, मन घढंत बातें फ़ैलाने से नहीं ..न अखवारों मगज़ीनों में छपने से आती, उनमें तो जाने क्या क्या कूडा-कचरा भी छपता रहता है,
    --कन्नू जी-- समर्थन व्यक्तियों का नहीं हुआ करता,उचित तथ्यों का होता है वह चाहे कोई भी हो-
    ---राकेश कुमार जी भी कुछ समन्वयवादी बात कह रहे है ध्यान दीजिये...
    ---योगेन्द्र जी --आप क्या ब्लोग पर या किसी का समर्थन/खंड्न अपनी बीबी से पूछ कर या उसके ओके कहने पर करते हो....

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  19. acchee post.vijayjee ke lekhan se ru-baru karane ka shukriya...

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  20. IS blog ki niymit pathak hun..... achcha laga ek saarthak blog ki charcha dekhakar...abhar

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  21. dayanand sarswati ji ke baare me padhkar bahut khushi ,unke karya sarahniye hai .badhiya .

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  22. बहुत बढ़िया लगा! विजय जी से परिचय करवाने के लिए और उनका लेख पढवाने के लिए धन्यवाद!

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  23. बहुत अच्छा लिखा है, विजय माथुर जी को बधाई|

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  24. सबसे पहले तो कुशल और सराहनीय ब्लॉग परिचय के लिए आभार. ऊपर से नीचे तक सारी टिप्पणियों को बारी-बारी से पढ़ा और उनके बीच समन्वय बिठाने का प्रयास किया. पहली बात जरुरी नहीं की सब लोग हमारे विचारों से सहमत हों और फिर मेरे विचार में ऐसा होना भी नहीं चाहिए नहीं तो फिर खुद की क्या पहचान रह जायगी. रही बात पोस्ट में वर्णित बातों की तो फिर यहाँ कुछ ऐसा दिखा नहीं जिसपर की अपने कमेन्ट के माध्यम से लोग हो हल्ला मचा रहे. उन्हें यदि कुछ अच्छा न लगा तो वो अपने विचार रखे न की उल्टे सीधे तर्क देकर दुसरों को गलत साबित करने की कोसिस करें. क्रांति स्वर पर अभी विजीट नहीं किया है परन्तु आपके इस सराहनीय प्रयास के लिए एक बार फिर से आभार...

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  25. ज्ञान देता है गुरु .
    ‘गुरू‘ शब्द का अर्थ है ‘गृणति धर्ममुपदिशतीति गुरू‘ (गृ ग कु, धे) अर्थात जो धर्म का उपदेश देता है वह गुरू है।
    बृहस्पति इन्द्र आदि देवताओं का गुरू माना जाता है। इन्हीं की रची हुई एक स्मृति भी है जो बृहस्पति स्मृति के नाम से प्रसिद्ध है।
    इन्होने आदर कैसे किया और कैसे पाया ?
    देखिये मेरे ब्लॉग पर -

    http://hindugranth.blogspot.com/2010/10/blog-post_26.html

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  26. विजय जी के ब्लॉग में काफी कुछ नै बातें जानने को मिलती रहती है ...

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आपके अल्‍फ़ाज़ देंगे हर क़दम पर हौसला।
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया! जी शुक्रिया।।

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हिंदी वर्ल्ड - Hindi World: धर्म की असली व्‍याख्‍या।
धर्म की असली व्‍याख्‍या।
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