...क्या आप शुद्ध शाकाहारी हैं?

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ब्‍लॉग जगत में आजकल कुर्बानी के बहाने जीव हत्‍या पर लम्‍बी-लम्‍बी बहसें चल रही हैं, जिसमें एक से बढ़कर एक तर्क प्रस्‍तुत किये जा रहे हैं। ...

ब्‍लॉग जगत में आजकल कुर्बानी के बहाने जीव हत्‍या पर लम्‍बी-लम्‍बी बहसें चल रही हैं, जिसमें एक से बढ़कर एक तर्क प्रस्‍तुत किये जा रहे हैं। इन्‍हीं तमाम पोस्‍टों को खंगालते हुए सर्च के दौरान मुझे एक शानदार पोस्‍ट मिली है, जिसे मैं साभार यहॉं पर प्रस्‍तुत कर रहा हूँ। कृपया इसे पढ़ें और अपना आकलन करें कि आप कितने पानी में हैं।

 क्या आप शुद्ध शाकाहारी हैं?
 श्रीमती सुशीला पाटनी
आर. के. हाऊस, मदनगंज- किशनगढ़ 

अब यदि आपने मांसाहार के त्याग का संकल्प कर लिया है तो अपने को टटोलिये और देखिये आप क्या क्या चीज खाते हैं जो एक शाकाहारी को नहीं खानी चाहिये।

क्या आप कभी शराब पीते हैं?
महुआ, दाख आदि अनेक पदार्थों को बहुत दिनों तक सडाकर मद्य बनायी जाती है, इसके बनने में असंख्य स्थावर जीवों की हिंसा होती है। बने हुए तैयार मद्य में भी प्रतिपल अनेक स्थावर जीव उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते रहते हैं। ऐसे मद्य को पीने से हिंसा और मांस भक्षण का दोष लगेगा। शराबी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, उसे हिताहित का कुछ भी विवेक नहीं रहता। अतः वह संसार-परिभ्रमण के कारण अनेक पापकर्मों में संलग्न हो जाता है। मद्य की एक बूँद में भी असंख्य जीव होते हैं, मद्य को छूने वाले से भी हिंसा हो जाती है। अतः जो मद्यपान करते हैं, वे अपने इस लोक तथा परलोक को बिगाड लेते हैं।
यदि आपका विवेक जागृत हो गया है और आपने शाकाहार का नियम ले लिया है तो आपको मद्य का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिये। मनुस्मृति में कहा भी गया है के जो ब्राह्मण एक बार भी मद्य पी लेता है इसका ब्राह्मणत्व नष्ट हो जाता है और वह शूद्रत्व को प्राप्त हो जाता है।

क्या आप मधुशहद खाते है?
मधुशहद मधुमक्खियों का उगाल होता है, जिसे मधुमक्खियाँ पुष्पों से चूस-चूस कर लाती हैं और फिर इसे वमन कर अपने छो में एकत्र कर लेती है तथा स्वयं भी इसी छो में रहती है, उसमें प्रतिपल सम्मूर्छन जारि के छोटे-छोटे अण्डे उत्पन्न होते रहते हैं। भील आदि क्रूर परिणामी जीव धूँआ करके मधुमक्खियों को उडाकर उनके छो को तोडकर शेष बची हुई मधुमक्खियों को अण्डे सहित दाब निचोड कर मधु निकालते हैं, जिसमें असंख्य मरे हुए जीवों का कलेवर होने से मधु का सेवन करने वाला मांस सेवन के भक्षण के दोष से बच नहीं सकता।

जिस भोजन में मक्खी पडी हुई हो, उस भोजन को भी सज्जन व्यक्ति छोड देते हैं फिर लाखों मक्खियों और अण्डों को निचोडकर निकाले हुए मधु को ना मालूम घृणा के बिना कैसे पीते हैं? मधु की एक बून्द भी मधुमक्खियों कि मारे बिना नहीं बनती। अतः जो मूर्ख मधु का सेवन करता है वह अवश्य हिंसा करता है। क्या आप गाँधी जी के आश्रमके मधु का सेवन करते हैं और अपने को शाकाहारी समझते हैं? नहीं यह आपका भ्रम है। छो में से टपके हुए मधु में भी तदाश्रित जीवों का घात होने से उसको पीने वाला हिंसा और मांसभक्षण के दोष से बच नहीं सकता।

नागपटल में कहा है-सात ग्रामों के जलाने से जितना पाप लगता है, उतना मधु के एक बूँद खाने से लगता है। महाभारत में भी कहा गया है-“जो अज्ञानी व्यक्ति पुण्य कमाने की इच्छा से ब्राह्मणो को मधु देता है, वह खाने वाले के साथ स्वयं भी नरक में जाता है।

मधु में मधु के, शराब के तथा मांस में मांस के ही रंग के सम्मूर्छन जीव उत्पन्न होते रहते हैं, जो दिखाई नहीं देते। अतः यदि आपने शाकाहार का नियम लिया है तो आपको मद्य मांस मधु का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये।

क्या आप बड, पीपल आदि फलों को खाते हैं?
बड,पीपल, ऊमर, कठूमर तथा पाकर इन पाँचों पलों को उदम्बर फल कहते है, इसमें अनेक स्थूल तथा सूक्ष्म जीव रहते हैं जो दिखाई नहीं देते। अतः आप यदि इन फलों को खाते हैं तो आप शाकाहारी नहीं हैं। अन्य बहुत से फल तो सूख कर प्रासुक हो जाते हैं किंतु उक्त पाँच उदम्बर फल के सूखने पर उनमें अनेक मरे हुए जीवों का माँस रहता ही है। अतः इन फलों को खाने वाले शाकाहारी कैसे हो सकता है?

क्या आप दो मुहूर्त के बाद निकला हुआ मक्खन खाते हैं?
दो मुहूर्त के बाद निकला हुआ मक्खन शाकाहारी व्यक्ति को कभी नहीं खाना चाहिये दो मुहूर्त बाद मक्खन में अनेक सम्मूर्छन जीव उत्पन्न हो जाते हैं, जिनके खाने से मांस भक्षण तथा हिंसा का दोष लगता है।

क्या आप रात में भोजन करते हैं?
रात्रि में अच्छी तरह दिखाई न देने के कारण भोजन में पडे हुए कीडे मकोडे पतंगे आदि भोजन के साथ खाए जाते हैं, जिससे मांस का दोष तो लगता ही है, कभी-कभी भोजन में छिपकली आदि विषैले जीवों के गिर कर मर जाने और दिखाई नहीं देने के कारण रात्री में भोजन करने वालों की मृत्यु तक हो जाते है।
आप कह सकते हैं कि आज के वैज्ञानिक युग में बिजली की रोशनी में सब कुछ दिखाई देता है। किंतु जरा सोंचिये क्या बिजली की रोशनी सूर्य की रोशनी की बराबरी कर सकती है? फिर वर्षा आदि के समय बिजली की रोशनी में अनेक मच्छर, पतंगे आदि हमारे भोजन में गिर जाते हैं। बिजली अचानक चली जाती है, ऐसे में यदि आप रात्रि में भोजन करते हैं तो अनेक जीवों की हिंसा और मांस भक्षण के दोष से कैसे बच सकते हैं?

क्या आप अन्न को भली भांति शोधाकर खाते हैं?
बिना साफ किये अनाज में बहुत सारे जीव रहते हैं। इसके अतिरिक्त यदि अन्न घुना हुआ है तो निश्चित रूप से अनेक जीव रहते हैं। अतः ऐसे अन्न को खाना मांस खाने से समान ही है।

इसके अतिरिक्त यदि चमडे के पात्र में रखा घी, तेल. जल. हींग आदि खाते हैं तो भी आप शाकाहारी नहीं है। स्थूल रूप से शाकाहारी व्यक्तियों के लिये 22 अभक्ष्य बताये गये है जिनका सेवन करने से मांसाहार का दोष लगता है-
अनजान फल, बहुत छोटा फल, जिस फल का स्वाद बदल गया हो, खट्टापन आ जाये, बासी दही, मट्ठा, वर्षा के साथ गिरने वाले ओले, द्विदल आदि शाकाहारी व्यक्ति को नहीं खाना चाहिये, इनके खाने से मांसाहार का दोष तो लगता ही है, उदर में पहुँच कर ये अनेक प्रकार के रोग पैदा कर देते हैं।

वर्क- वर्क लगी मिठाई, फ़ल या पान, सुपारी आदि भी शाकाहारी व्यक्ति को नहीं खाना चाहिये। वर्क बनाने के लिये बैल की मांस की तहों की किताब सी बना कर उसमें चांदी की पतली पतली परत रख कर वर्क बनाया जाता है। बैलों को बूचडखाने में मारने के बाद उसकी आंते निकाल कर वर्क बनाने वालों को बेच दी जाती हैं। वर्क बनाने वाला आंतों से खून साफ कर उसके टुकडे कर डालता है और एक के ऊपर एक टोकरों को रख कर तहों की किताब औजार बना लेता है। इसके प्रत्येक तह में चांदी के टुकडों को रख कर हथौडे से कूटता है, जिससे चाँदी की परत पतली हो कर वर्क का रूप धारण कर देती है। हथौडे मारने से आंतों का कुछ अंश वर्क में मिल जाता है। अतः वर्क अपवित्र और मांसाहार है। धार्मिक क्रियाओं में भी इसका प्रयोग नहीं करना चाहिये। मन्दिरों के शिखरों पर वर्क चढाना भी क्रूरता और हिंसा का परिचायक है।

केक- आजकल बच्चों के जन्मदिन पर केक काटने और खिलाने की प्रथा चल पडी है। क्या आपने कभी विचार किया कि केक प्रायः अण्डों से बनता है बाजार में प्रायः सडे हुए अण्डे का केक बनाकर दिया जाता है। यदि आप शाकाहारी हैं, तो मिल्क केक बनवाकर उसपर पिस्ता, बादाम, किशमिश आदि सजाकर उपयोग कर सकते हैं।

पेस्ट्री- आजकल पेस्ट्री का बहुत फैशन हो गया है किंतु पेस्ट्री अण्डों से तैयार किया जाता है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।

सलाद- फलों के ऊपर पीले व क्रीम की तरह सुन्दर दिखाई देने के लिये एक तह लगाई जाती है, इसमें अण्डों का प्रयोग होता है। आजकल होटलों में दावतों में इसका प्रयोग होने लगा है।

हमें अपने शरीर, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिये ऐसे अभक्ष्य पदार्थों से बचना चाहिये तभी हम शुद्ध शाकाहारी रह सकते हैं। (साभार: विद्यासागर डॉट नेट)

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COMMENTS

BLOGGER: 47
  1. एक स्‍पष्‍टीकरण: मैं पिछले 20 सालों से (जबसे लेखन से जुड़ा) मांस नहीं खाता हूँ, अण्‍डा आदि से काम चलाता हूँ। इसलिए अपने को शाकाहारी समझता रहा हूँ। लेकिन इस लेख को पढ़ कर मेरी सोच की चूलें हिल गयी हैं।

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  3. हमें अपने चारो ओर दृष्टि डालना चाहिए और अपने फ़ूड चेन को समझना चाहिए ,
    जब विश्व में इतनी भूखमरी है , और विश्व में कितने ऐसे स्थान है जहाँ पर्याप्त मात्रा में अनाज नहीं होता अगर होता है तो अधिक मंहगा मिलता है,
    आज फल सब्जियां भी सुरक्षित नहीं रही इंजेक्शन लगे हुए फल सब्जी मार्केट में मिल रहे हैं ,
    अल्लाह ने भिन्न भिन्न प्रकार की प्राणी बनाये है , किसी को मांसाहार किसी को शाकाहार , किसी को दोनों , ये उसका नियम है ,
    हम कौन होते है उसके नियम में दखलअंदाजी करने वाले

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  4. jiv to ghans funs men bhi hota he isse pet bhrne ke liyen sbziyon ko todkr hm is jiv ki htya hi krte hen bat kuch bhi ho shaakahaari ho chahe masaahari ho sbhi htyare hen bs smjh smjh ka fer he . akhtar khan akela kota rajsthan

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  5. बेनामी11/20/2010 5:02 pm

    jakir bhai aapne maans khana kyon chhod diya? kya uska swad pasand nahee aaya?

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  6. बहुत ही सही ....सुन्‍दर लेखन के लिये आभार ।

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  7. बहुत ही सही ....सुन्‍दर लेखन के लिये आभार ।

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  8. बेनामी भाई, मैं मांस सिर्फ इसलिए नहीं खाता, क्‍योंकि मुझे लगता है कि उसके लिए किसी को मरना पड़ता है, अपनी जान देनी पड़ती है। और मेरी वजह से जितने कम से कम लोगों को कष्‍ट हो, मेरा यही प्रयास रहता है।

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  9. दुनिया में ऐसा कोई खाद्य पदार्थ नहीं है जिसमें जीवाणु न हों...दूध से दही जीवाणु ही बनाते हैं...पानी को अगर माइक्रोस्कोप के नीचे रक् के देखने तो उसमें कुलबुलाते जीवाणुओं को देखने के बाद शायद ही आप उसे पी पायें...जीव हत्या है क्या...हम सांस लेते और छोड़ते हैं उसमें भी हजारों जीवाणु जो हमारी सांस के साथ अन्दर चले जाते हैं और मर जाते हैं...आप जीवाणु खाने से बच ही नहीं सकते...असंभव है...अगर जीव हत्या बंद कर दी जाए और जल-थल-नभ- में उपस्तिथ जीवों को मारना निषेध कर दिया जाए तो शायद दुनिया की अस्सी प्रतिशत आबादी भूखों मर जायेगी...मोटे तौर पर देखिये तो चीन, जापान, सारे दक्षिण -पश्चिम देश, सारे मुस्लिम देश. यूरोपियन देश, अमेरिका. दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, ठन्डे मुल्क जैसे रशिया, स्वीडन, नार्वे , डेनमार्क , समुद्र तट पर बसे देश सभी मांसाहार करते हैं और मांस उनके भोजन का अहम् हिस्सा होता है...कैसे आप सबको शत प्रतिशत शाकाहारी होने पर मजबूर कर सकते हैं...ये आप व्यक्ति पर छोड़ दें के वो क्या होना चाहता है शाकाहारी या मांसाहारी...दरअसल मनुष्य की भोजन शैली जहाँ वो रहता है वहां आसानी से उपलब्ध वस्तुओं पर निर्भर करती है...अगर कोई नदी या समुद्र किनारे रहता है तो जल में रहने वाले जीव खायेगा ही...ये सदियों से होता आ रहा है और इसमें कुछ गलत नहीं है क्यूँ की इंसान भी एक प्रकार का जानवर ही है और प्रकृति जानवरों को एक दूसरे को मार कर खाना ही सिखाती है...

    नीरज

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  10. बेनामी11/20/2010 5:13 pm

    नीरज जी, आपने सही कहा पर ये मूर्खों का देश है। एक कुछ कहता है और बाकी सब हुंआ-हुंआ करने लगते है।

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  11. ये बस अपना अपना दृष्टिकोण है ... जो जैसा चाहता है उसके लिए कारण खोज ही लेता है .... इसलिए मस्त रहें .. जो खाना है खाएं ... मन को नहीं भाता तो न खाएं ... .

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  12. शाकाहारी होना भी मुश्किल हो गया है :(

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  13. शहद और मांस आदि का भरपूर सेवन करते थे और वे धर्म का पालन करने वाले आदर्श माने जाते हैं . दशरथ जी और राम जी का शिकार खेलना जग प्रसिद्ध है । ऐसे में उनके भोजन को घृणित क्यों मान लिया गया ?
    2- आज भी देश की नीतियाँ बनाने वाले और सीमाओं की रक्षा करने वाले अधिसंख्य हिंदू मांसाहारी हैं । मांसाहारियों को अधम पापी और राक्षस प्राचीन हिंदू आदर्शों के साथ साथ आपने वर्तमान हिंदू सैनिकों का अपमान करना भी है जिनकी वजह से आज हम अपने घरों में महफ़ूज़ हैं ।
    यह घोर कृतघ्नता है ।

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  14. ज़ाकिर जी अन्यथा न लें पर मुझे थोड़ा आश्चर्य हो रहा है कि आप जैसा वैज्ञानिक सोच वाला व्यक्ति इस लेख से इतना प्रभावित कैसे हो गया। आप ही सोचें यदि कोई इतना ज्यादा ध्यान रखेगा तो जीवित कैसे रहेगा? जीवन तो हर जगह है यहाँ तक कि हवा में भी जीवाणु होते हैं तो क्या हम साँस लेना छोड़ दें? फिर पेड़ पौधे भी तो सजीव ही होते हैं न? नीरज जी ने बहुत अच्छी टिप्पणी की है उनसे पूर्णतः सहमत हूँ।

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  16. बेवकूफी भरा आलेख ...कोढ़ मगज महिला ने लिखा मगर ताज्जुब है आपने इसे उद्धृत किया ...
    क्या जीवाणुओं को बड़े जानवरों के समतुल्य रखा जा सकता है ? जीवाणु तो हवा में भी होते हैं और हर साँस के साथ शरीर में जाते हैं ...
    यहाँ बात पशुओं की निर्ममता से वध की हो रही है ,हिंसा के महिमामंडन की हो रही है ....हिंसा के उत्सवीकरण की हो रही है चाहे धर्म के नाम पर या आखेट के नाम पर ..इसे बंद होना चाहिए !

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  17. मानव मन की प्रकृति ही ऎसी है कि वो खुद को सही साबित करने के लिए कोई न कोई (कु)तर्क गढ ही लेता है...

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  18. मित्र मुझे मौका-ए-वारदात पे मेरी रूचि के अनुकूल जो भी चीज़ मिल पायेगी उसे ज़रूर खाऊँगा !

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  19. दही में जीवाणु की तुलना को रक्त बहाने के लिये बहाना बनाया जा रहा है। यदि बुद्धि का यही स्तर है तो दोनों हाथ में तलवार ले मानवहन्ता बन निकल जायें सब।

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  20. .
    .
    .
    @ आदरणीय नीरज गोस्वामी जी,

    आभार आपका सर, सच का बयान करने के लिये... अब यही बात मैं कहता हूँ तो कहने वाले संवेदना शून्य होने, पशुप्रवृत्ति या असुर होने का इल्जाम तक लगाने लगते हैं... अब नीरज जी जैसा कविहॄदय इसी बात को कह रहा है... अब क्या कहोगे यारों ?

    छोटी सी जिंदगी है... मस्त रहो यारों... जो मन करे वह खाओ... और अपनी फूड च्वायस को दूसरों पर मत लादो!


    ...

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  21. बेनामी11/20/2010 9:30 pm

    मैं इससे सहमति व्यक्त कर सकता हूं

    ब्लॉगर Arvind Mishra ने कहा…

    बेवकूफी भरा आलेख ...कोढ़ मगज महिला ने लिखा मगर ताज्जुब है आपने इसे उद्धृत किया ...
    क्या जीवाणुओं को बड़े जानवरों के समतुल्य रखा जा सकता है ? जीवाणु तो हवा में भी होते हैं और हर साँस के साथ शरीर में जाते हैं ...
    यहाँ बात पशुओं की निर्ममता से वध की हो रही है ,हिंसा के महिमामंडन की हो रही है ....हिंसा के उत्सवीकरण की हो रही है चाहे धर्म के नाम पर या आखेट के नाम पर ..इसे बंद होना चाहिए !

    जवाब देंहटाएं
  22. जाकिर जी
    नमस्कार
    सूक्ष्मजीवों(जीवाणु,विषाणु,प्रोतोज़ोआ,कवक/फफूंदी) औरगर्म/ठन्डे रक्त वाले उच्च जीवों और पौधों(वनस्पति जगत)में समानता साबित करके अगर पशुवध जायज़ है तो ठीक
    अगर हमने वक्त के साथ और बहौत कुछ बदल लिया तो हम ये भी बदल सकते है|
    बाकी ये धार्मिक और व्यक्तिगत मामला है आपने मांस खाना छोड़ दिया बधाईयां,ये स्वाद वैसे जल्दी से छुटता नहीं है|
    इस तरह की पोस्ट आपने लिंक की ..........ताज़्जुब!!

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  23. बेनामी11/20/2010 10:58 pm

    किसका लेख? प्रस्तूत किया किसने?
    लेखिका को गालियां दी जा रही है, जबकि वह जानती ही नहिं यह आलेख यहां पर है।उसे कोढमग्ज ॰


    कहा जा रहा है। वाह!
    हो सकता है, जाकिर का उद्देश्य और कुछ हो?
    एक कहेता है प्रकृति जानवरों को एक दूसरे को मार कर खाना ही सिखाती है...
    प्रकृति में तो मानव मानव को भी खा जाता था तो प्रकृति ने सिखायां? तो करो शुरू।
    दूसरा कहता है हम पर मत लादो,
    कौन लाद रहा है, एक बात है मानना है तो मानो नहिं तो कौन तुमे फ़ांशी चडा रहा है

    ॰॰॰

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  24. जाकिर भाई!
    .......................इस आलेख के सहारे तथाकथित तार्किकता की आड़ में शायद मांसाहार को जायज ठहराने की नाकाम कोशिश दीख पड़ रही है |
    आप जैसे वैज्ञानिक सोच वाले व्यक्ति का इससे इतनी आसानी से प्रभावित हो जाना थोड़ा अटपटा लग रहा है | मैं अरविन्द जी के मुद्दे पर सहमत हूँ |

    मूलतः व्यक्ति के विचार अपने स्वयं के सापेक्ष आते हैं.....बावजूद इसके कि यह खानपान अपनी पसंद या नापसंद का मामला है के सहारे .....इसे किसी बहस का सामना करने से नहीं रोका जा सकता है |

    क्रूरतम प्रथाओं को मांसाहार से जोड़ कर और फिर धर्म से जोड़कर उसे जायज ठहराने के बजाय इस पर समुचित विचारोपरांत एक राय निकालनी चाहिए |

    .......बाकी स्वाद के लिए तो आदमी क्या ना कर गुजरे !

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  25. @Dr. Arvind Mishra : सर माफ़ कीजिये पर आपका यह तल्ख़ रवैया किसी भी लिहाज से उचित नहीं है. आपको मैंने पहले भी इस तरह की टिप्पणी करते हुए देखा है, उस समय कई लोगो ने आपके खिलाफ लिखा भी था. पर इस बार आपने कुछ ज्यादा ही कह दिया है सो मुझे भी कहना पड़ रहा है, आप को डॉ. पदवी से नवाजा गया है. इस का अर्थ होता है विचारक और एक विचारक का काम होता है अपने विचार दूसरों के सामने रखना तथा दूसरों के विचारों को अपने विचारों से चुनौती देना, गली गलोज करना नहीं. यदि आप किसी दूसरे विचारक को कोढ़ मगज कह रहे हैं तो आप किसी भी तरह से विचारक नहीं हुए. आपको हक़ है अपना मत रखने का पर किसी को जलील करने का कोई हक़ नहीं है| मैं भी पी.एच. डी. कर रहा हूँ, देश के न. एक विश्वविद्यालय आई.आई.टी. बॉम्बे से, कभी कभी किसी प्रोफेसर का मत हमसे नहीं मिलता पर वो हमसे एक स्वस्थ बहस करते हैं, गाली गलौज पर नहीं उतर आते|
    आपसे अनुरोध है कि अपना नहीं तो कम से कम आपको दी गयी उपाधी की गरिमा का ध्यान रखें|

    @नीरज: मै आपकी बात से पूर्णतः सहमत हूँ, मै यह तो नहीं कहूँगा कि मै पूरी तरह से शाकाहारी हूँ, पर मै अंडा तथा मांस नहीं खाता, इसलिए नहीं कि यह मांसाहार है बल्कि इसलिए क्यूंकि इन चीज़ों को खाने से कुछ जानवरों को तकलीफ होगी. हालांकी मै दूध पीता हूँ जिससे भी गाय, भैंस को काफी तकलीफ होती है | यदि भविष्य में मैं किसी ऐसी जगह पर फँस गया जहाँ पर खाने के लिए कुछ और उपलब्ध ना हो तो मुझे मांस खाने में कोई हर्ज नहीं है, पर शाकाहार के होते हुए में मांसाहार नहीं कर सकता |

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  28. बहुत शानदार पोस्ट. लेकिन इतनी बारीकी से शाकाहार और मांसाहार का विभाजन हम कहां करते हैं? अगर करने लगें, तो शाकाहारी तो भूखे ही मर जायें. जानवरों से मिलने वाला खाद्य मांसाहार और पेड़-पौधों से मिलने वाला शाकाहार की श्रेणी में आता है, तब दूध और उससे बने तमाम खाद्य पदार्थ भी मांसाहार हो जाते हैं. अब क्या करें??

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  29. बेनामी11/20/2010 11:58 pm

    एकदम कठीन शाकाहार वाली पोस्ट से भयभीत करके,यह अप्रत्यक्ष मांसाहार को ही प्रोत्साहित करने की कोशीश है।

    और 'देखो हम पर लाद रहे है' कह रहे है जैसे अभी ही कानून बना दिया गया है। और ये लोग भूखे मर जायेंगे।
    = = =

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  30. कुछ लोग अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं, जो गलत है आप अपनी बात रखने के लिए तर्क दीजिये

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  31. यह प्रकृति का नियम है, केवल इंसान ही इसका वर्गीकरण कर सकता है।

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  32. एक कोरी बकवास पोस्ट हैं , मांसाहार का मतलब वो होता हैं. जिसमे प्रतक्ष्य रूप मैं आप को मांस दिखे न कि , दूध -दही, शहद और सब्जिया. मांसाहार का मतलब होता हैं कि किसी जीव कि प्रतक्ष्य रूप में काट कर उसका मांस खाया जाय.

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  33. बेनामी11/21/2010 12:00 pm

    Neeraj ji ne likha hai ki diniya ke 80 pratihat log manasahari hain. tab ye kuchh log kyon itni chillpon kar rahe hain? had hai besharmi ki, chori chhupe maans khate hain aur pashu wadh ka virodh karte hain. in logo ko chullu bhar pani men doob marna chahiye.

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  34. बेनामी11/21/2010 12:06 pm

    क्या जाकिर सचमुच शाकाहारी है? मुझे तो लगता है कि वो नौटंकी कर रहा है। और वो है कहां, पोस्ट लगा के सन्डे मना रहा है क्या? क्या कोए मेरी बातों का जवाब देगा?????????????

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  35. Is post pe comment karne walo se poochna chahta hoo ki kitne logo ne gost ka swad liya hai? kripya dil pe hath rakhke jawab de fir apni bat kahe.

    Arshad Kamal, Amroha

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  36. दूध-दही-शहद को भी मांसाहार की श्रेणी में रखना तो नितान्त कुतर्क ही कहा जायेगा…
    इस हिसाब से तो हमें साँस लेना भी बन्द कर देना चाहिये… :) :)

    ज़ाकिर भाई ने यह ऊटपटांग लेख छापकर मांसाहार के पक्ष में माहौल बनाया है… ब्लॉग जगत में जो मूल बहस चल रही थी उस पर तो किसी ने टिप्पणी ही नहीं की, वह ये कि "बलि" अथवा "कुर्बानी" का महिमामण्डन क्यों? बात "सुधारों" की हो रही थी, कि आज की तारीख में कितने भारत में कितने मन्दिर बचे हैं जहाँ "बलि" प्रथा अपने क्रूर रूप में मौजूद है…

    और :-
    1) "सुधार की प्रक्रिया" में हमेशा हिन्दुओं को ही क्यों टारगेट किया जाता है? (जैसे कि बलि घृणित है, जाति प्रथा बकवास है, दहेज कुरीति है… आदि-आदि-आदि)

    2) कितने प्रतिशत मुस्लिम ब्लॉगरों ने कुर्बानी-नकाब-बुर्का-शरीयत-शाहबानो-शिया-सुन्नी-अहमदिया इत्यादि मसलों पर ""परम्परागत लीक"" से हटकर विरोध दर्ज करवाया है? कितनों ने कट्टर मुल्लाओं के खिलाफ़ जोरदार कलम चलाई है?

    इसलिये बहस को मूल विषय से न भटकाओ… अपने-अपने धर्मों की "किताबों" में लिखी बातों को छोड़कर कितना सुधार हुआ है ये बताओ…

    सीधी बात नो बकवास…

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  37. जाकिर सुरेश कि बात पर ध्यान दे और अपने पिछले कुछ आलेखों को देखे जहां आप निरंतर हिन्दू धर्म के ढकोसलो पर बात करते हैं पर मुस्लिम धर्म के किसी ढकोसले पर नहीं

    जवाब देंहटाएं
  38. लिंक किसी जैन धर्म कि वेबसाइट पर जाता हैं और संभवता हैं पोस्ट जैन धर्म के अनुयायी के लिये ही लिखी हो तो इसमे इतना गलत क्या हैं । जापान मे मछली शाकाहारी मानी जाती हैं तो क्या मे शाकाहारी हूँ इस लिये उसको अगर मे जापान मे हूँ तो खा सकती हूँ या क्युकी मछली जापान मे शाकाहारी हैं इस लिये भारत मे भी उसको शाकाहारी मान लिया जाए । बैंकोक मे गाय का मॉस शाकाहारी माना जाता हैं और अगर आप वहाँ बर्गर खाते हैं तो वेज बर्गर मे टिक्की गोमांस कि ही होती हैं

    अपने धर्म का प्रचार करने के लिये जैन धर्म माँ दुष्प्रचार करना गलत और निंद्निये हैं

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  39. बेनामी11/21/2010 4:08 pm

    इस पोस्ट से जाकिर रजनीश की कुटिलता स्पष्ट झलक रही है।

    जवाब देंहटाएं
  40. यह बिलकुल गैर ज़रूरी चर्चा है ।

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  41. जाकिर भाई,

    रचना जी ने सही कहा है, यह रचना जैन साईट की ही है और निश्चित ही जैनधर्मावलम्बीयों को सम्बोधित है क्योंकि उसमें 'रात्री भोजन' का भी उल्लेख है जो किसी जैन को ही कहा जा सकता है।

    पूर्व में मैने टिप्पणी कर इस लेख को लगाने की सराहना की, लेकिन अब मुझे भी संदेह हो रहा है कि आखिर इसी लेख को लगाने के पिछे आपकी मंशा क्या थी?, क्यो आपकी चुहले हिल गई?
    आपको स्पष्टीकरण तो देना ही चाहिए।

    अब जिस विचारों से आप सहमत ही नहिं उसे पोस्टरूप में प्रस्तूत कर किसी अनजान महिला का अपमान करवाना योग्य नहिं है बंधु।

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  42. सबसे पहले आप सबका आभार, यहॉं आकर अपने विचार रखने के लिए।


    यह पोस्‍ट मैंने जानबूझकर लगाई थी, क्‍यों यह बताना जरूरी है, लेकिन साथ ही उन प्रश्‍नों के जवाब देना भी जरूरी है, जो मुझसे पूछे गये हैं। मैं पूरी ईमानदारी से कोशिश करूँगा कि उन सभी बिन्‍दुओं और प्रश्‍नों का यथोचित जवाब दे सकूँ, जो आप सब ने उठाए हैं।


    जैसा कि जाहिर है, इतने सारे प्रश्‍न हैं, इतनी सारी शंकाऍं, तो सब के जवाब टिप्‍पणी में देना सम्‍
    भव नहीं हो पाएगा, इसलिए मैं इस क्रम में दूसरी पोस्‍ट तैयार कर रहा हूँ। मेरी कोशिश रहेगी कि मैं यह पोस्‍ट आज ही प्रकाशित कर सकूँ।

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  43. एक दीया ऐसा 'मौहब्बत' का जलाया जाये,
    जिसका पडो़सी के घर तक भी उजाला जाये,
    इससे बढ़कर ना कोर्इ 'पूजा' ना 'इबादत' होगी
    कि किसी रोते हुए 'इन्सां' को हंसाया जाये।

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आपके अल्‍फ़ाज़ देंगे हर क़दम पर हौसला।
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया! जी शुक्रिया।।

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हिंदी वर्ल्ड - Hindi World: ...क्या आप शुद्ध शाकाहारी हैं?
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