वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन : कुछ खट्टा कुछ मीठा।

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स्टेशन पहुँचते ही कैमरा चालू। महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में आयोजित ...

स्टेशन पहुँचते ही कैमरा चालू।
महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में आयोजित ब्लॉगिंग सेमिनार पर अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है। पर फिरभी मुझे ऐसा लग रहा था कि बहुत कुछ है जो अभी लिखा जाना बाकी है। इस दो दिवसीय संगोष्ठी के दौरान मैंने जो कुछ देखा, समझा और महसूस किया, उसमें से कुछ बातें आपके साथ शेयर करना चाह रहा हूँ।

कमरे से लिया गया चित्र। पहचानो कौन-2 ?
वर्धा पहुँचने पर सबसे पहली मुलाकात अनूप शुक्ल जी से हुई, स्टेशन पर ही, बावजूद इसके कि वे हमारी ही ट्रेन में हमारे बगल वाले डिब्बे में थे। शायद 'चिट्ठा चर्चा' में 'संवाद समूह' के प्रति बरती जाने वाली विशेष सजगता और अनूप जी की खोज-खोज कर एक से एक ब्लॉग लाने की वृत्ति दोनों ही इसके जिम्मेदार रहे। खैर, जो भी होता है, अच्छा ही होता है।

इस सम्मेलन में मुझे कुछ लोगों को नज़दीक से जानने का मौका मिला, इनमें रवीन्द्र प्रभात, अनुप शुक्ल, जय कुमार झा, अविनाश वाचस्पति, यशवंत, कविता वाचक्नवी, रचना त्रिपाठी और गायत्री शर्मा के नाम शामिल हैं!

रवीन्द्र प्रभात बाएँ से दूसरे।
तो शुरूआत करते हैं रवीन्द्र प्रभात जी से। यूँ तो उनसे लखनऊ में अक्सर ही मुलाकात होती रहती है, और जिस जोश-खरोश के साथ वे सभी लोगों का स्वागत करते हैं, वह बहुत कम देखने को मिलता है। लेकिन यात्रा के दौरान उनका एक नया रूप जानने को मिला, वह था समय और स्थिति के अनुसार स्वयं को ढ़ाल लेने की उनकी कला। हुआ यूँ कि जिस दिन हम लोगों ने वर्धा के लिए यात्रा शुरू की, उसी दिन से नवरात्रि के व्रत शुरू हो रहे थे। अब ट्रेन में व्रत का खाना तो मिलने से रहा। इस पर वे बोले कि स्टेशन पर देखते हैं, कुछ मिल जाएगा तो ठीक है, वर्ना डट कर खाना खाया जाएगा। और सचमुच हमने साथ में डट कर खाना खाया। चूँकि मैं भी स्वभावत: धर्म में विशेष रूचि नहीं रखता हूँ, इसलिए उनका यह व्यवहार मुझे अच्छा लगा।
 शुक्ल जी, कवि गोष्ठी में पत्रिका पढते हुए
अनूप जी से यूँ तो स्टेशन पर ही मुलाकात हो गयी थी, पर न जाने क्यों पूरे सम्मेलन के दौरान वे और उनकी बातों ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। जब भी उनसे बात हुई, जानबूझकर वे डॉ0 अरविंद मिश्र का जिक्र ले ही आए। और जब भी मिश्र जी का नाम आए, वे कोई भी चुटकी लिए बिना न रह सके। अपनी बातों के दौरान उन्होंने कई बार दोहराया कि उनसे चुटकी लेने में उन्हें विशेष आनन्द आता है। अरविंद जी, सुन रहे हैं आप?

अनूप शुक्ल जी, ब्लॉग जगत के नारीवादी समर्थक ब्लॉगर माने जाते हैं। मेरे दिमाग में यह बात हमेशा गूँजती रहती है। इसलिए मैंने सोचा था कि इस बात का गहराई से अध्ययन किया जाए। और नतीजे सचमुच चौंकाने वाले थे। प्रोग्राम के दो दिनों में मेरी जब भी उनपर नजर पड़ी, वे 75 प्रतिशत से अधिक बार किसी न किसी नारी ब्लॉगर का उत्साह वर्द्धन करते मिले। कार्यक्रम में पहली बार पधारी नवोदित ब्लॉग गायत्री शर्मा, जोकि ब्लॉग पर शोध कार्य भी कर रही है, का उन्होंने विशेष ध्यान रखा।

और अन्त में उनके सम्बंध में एक विशेष बात, शायद जिससे उन्हें समझने में आपको भी मदद मिले। हुआ यूँ कि वे 10 तारीख को कार्यक्रम समाप्त होने के बाद स्टेशन के लिए निकल रहे थे। तभी सिद्धार्थ जी का लड़का जिद करने लगा कि पापा घर चलिए। इसपर वे बाले कि आप लोग ज़रा रूकिए, मैं दो मिनट में बेटे को घर छोड़कर आता हूँ। इसपर अनूप जी बोले- चलो, तब तक लोगों की और थोड़ी बहुत झूठी तारीफ की जाए। उनका यह वचन सुनकर कविता वाचक्नवी जी ने फौरन उन्हें टोका- यानी कि आप हमेशा दूसरों की झूठी तारीफ करते हैं? इसपर सभी लोग हंस पड़े और बात आई-गई हो गयी। लेकिन क्या सचमुच यह हंसी में टाल देने वाली बात है?

समूह चर्चा में झा जी, बाएँ से तीसरे
आनेस्टी प्रोजेक्ट वाले जय कुमार झा जी से मेरी पहली मुलाकात थी, इससे पहले मैंने न तो उनके किसी ब्लॉग को ध्यान से पढ़ा  था और न ही उनके कमेंट को। लेकिन उनसे मिलने के बाद मेरे दिमाग में एक सोशल एक्टिविस्ट का चेहरा घूम गया, जो अपने कार्य को अंजाम देने के लिए तन-मन-धन से लगा रहता है। उनसे मिलने के बाद लगा कि अगर ऐसे समर्पण के साथ आप कोई भी काम करें, तो कामयाबी मिलने से आपको कोई रोक ही नहीं सकता।

गले में चश्मा लटकता देख कर पहचाना?
अविनाश वाचस्पति एक ऐसा नाम है, जिससे शायद ही कोई सक्रिय ब्लॉगर अपरिचित हो। यूँ तो वे एक सक्रिय व्यंग्यकार और ब्लॉगर हैं, लेकिन इसके साथ ही साथ वे एक अच्छे इंसान भी हैं और इसका सबूत वे जनसत्ता आदि में प्रकाशित विभिन्न ब्लॉगर्स की पोस्ट की कटिंग भेजकर देते रहते हैं। अविनाश जी के मन में ब्लॉगिंग और उससे जुडे लोगों के प्रति जो स्नेहभाव मैंने देखा, वह बहुत कम लोगों में मिलता है।

यशवंत जी मुख्य रूप से अपने ब्लॉग 'भड़ास फॉर मीडिया'  के लिए जाने जाते हैं। भड़ास ब्लॉग की आमछवि के कारण मेरे मन में उनके प्रति एक अलग ही छवि बनती थी। लेकिन पहली बार उन्हें जब नजदीक से देखने को मिला, तो मेरे मन में जमी वह धारणा छिन्न-भिन्न हो गई। यशवंत जी का हिन्दी के वरिष्ठ कवित आलोक धन्वा के साथ विशेष लगाव, बात-बात में गाने के मचलता उनका कवि ह़दय और सबसे प्रमुख आलोचना के सम्बंध में उनके विचार (जब भी कोई मेरी आलोचना करता है, मैं तुरंत उसका जवाब नहीं देता हूँ। उस वक्त मैं यह निर्णय लेता हूँ कि इसका जवाब मैं 24 घण्टे के बाद दूँगा। और तब तक गुस्से के बादल छंट चुके होते हैं।) के कारण वे मुझे एक आदर्श और कामयाब ब्लॉगर के आईकॉन के रूप में नजर आए।

कविता जी को तो पहचान ही लेंगे?
कविता वाचक्नवी जी से मैं जब भी मिला, तो चिटठा चर्चा पर उनके द्वारा होने वाली चर्चा ही बहाना रही। लेकिन इस कार्यक्रम के द्वारा मैंने जब उनकी समर्पण भावना को देखा तो दंग रह गया। वे निमंत्रित ब्लॉगर होने के बावजूद वे जिस समर्पण और अपनत्व के भाव से कार्यक्रम को व्यवस्थित ढंग से सम्पन्न कराने हेतु तत्पर दिखीं, उसे देखकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई। हिन्दी के प्रति उनके मन में जो लगन है, जो जुनून है, उसे देखकर उनके आगे सिर झुकाने को मन करता है। काश, ऐसी लगन अगर कुछ और लोगों में भी होती, तो आज हमारी हिन्दी सारे विश्व के माथे की बिन्दी होती।

श्रीमती त्रिपाठी नहीं, तो श्री से ही काम चलाएँ
यूँ तो रचना त्रिपाठी जी को लोग हिन्दी ब्लॉगर्स सम्मेलन के संयोजक के रूप में प्रसिद्ध सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी की पत्नी के रूप में जानते हैं, पर इस कार्यक्रम के दौरान मुझे यह पहली बार ज्ञात हुआ कि वे एक प्रतिभा सम्पन्न कवियत्री भी हैं। कार्यक्रम के पहले दिन को सायंकालीन सत्र में उन्होंने जो कविता सुनाई, वह सचमुच शानदार थी। और उस कविता की वजह थी, सिद्धार्थ जी का ब्लॉगिंग में अत्यधिक डूब जाना। हालाँकि मैं सिद्धार्थ जी से यह नहीं कहूँगा कि वे ब्लॉगिंग में डूब कर भाभी जी को भूल जाएँ, पर रचना जी से यह आग्रह तो कर ही सकता हूँ कि वे अपनी लेखनी को विराम न दें।

और हाँ, पूरे कार्यक्रम के दौरान उन्होंने त्रिपाठी जी के साथ जिस तरह कंधे से कंधा मिलाकर मिलाकर लगी रहीं, उसे देखकर सच्चे मन से उनकी प्रशंसा करने का दिल चाहता है।

क्या इनका भी नाम बताना पड़ेगा?
गायत्री शर्मा इन्दौर की रहने वाली एक युवा पत्रकार हैं, जो तमाम सारी डिग्रियाँ हासिल करने के बाद अब ब्लॉगिंग में पी-एच0डी0 भी कर रही हैं। वे हमारे ब्लॉगिंग एथिक्स पर होने वाली ग्रुप चर्चा में हमारे साथ थीं, इसलिए उनके विचारों को नजदीक से जानने को मिला। वे एक प्रखर पत्रकार होने के साथ ही साथ एक बोल्ड आधुनिक नारी भी हैं। उनका जुनून और काम करने की लगन देखकर यह अच्छा लगा कि उनके द्वारा किया जा रहा शोधकार्य भी स्तरीय होगा और समाज में ब्लॉगिंग को उसका यथोचित स्थान दिलाने में सहायक होगा।

आज बस इतना ही, अगली पोस्ट में कुछ और रोचक अनुभवों को आपके साथ शेयर करने की कोशिश रहेगी।
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वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन : कुछ खट्टा कुछ मीठा।
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