हरिकृष्‍ण देवसरे और उनका बालसाहित्‍य।

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डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे के बाल साहित्‍य लेखन एवं उनकी चिंतन पद्धति को रेखांकित करती एक अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक- हरिकृष्‍ण देवसरे का बाल साहित्‍य।

यह कहना शायद अतिश्‍योक्ति न होगी कि हिन्‍दी में बालसाहित्‍य को आज जो मुकाम हासिल है, वह उसे कदापि न प्राप्‍त होता, यदि उसे हरिकृष्‍ण देवसरे जैसा साहित्‍यकार न हासिल हुआ होता। हिन्‍दी बाल साहित्‍य के भंडार को भरने, हिन्‍दी ही नहीं भारतीय भाषाओं की स्‍तरीय रचनाओं को सामने लाने एवं बाल साहित्‍यकारों को आत्‍मगौरव का बोध कराने की दृष्टि से उन्‍होंने जो कार्य किये हैं, हिन्‍दी बालसाहित्‍य में उसकी कोई मिसाल खोजने से भी नहीं मिलती। 

हरिकृष्‍ण देवसरे ने यद्यपि लेखन की शुरूआत कविताओं से की, तथापि वे मुख्‍य रूप से गद्यकार के रूप में जाने जाते हैं। उन्‍होंने कहानी, उपन्‍यास, जीवनी, एकांकी, समीक्षा आदि विधाओं में इतनी विपुल मात्रा में बाल साहित्‍य की रचना की है, कि सिर्फ उसकी सूची को देखकर ही पाठक आश्‍चर्यपूर्वक अपनी उंगलियों कों दांतो तले दबाने को विवश हो जाता है। 

Dr. Harikrishna Devsare Ka Balsahitya - डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे का बालसाहित्‍यडॉ. देवसरे ने बाल कहानियों को लेकर जितने प्रयोग किये, विज्ञान कथा साहित्‍य को समृद्ध करने हेतु जो सक्रिय भूमिका निभाई, बच्‍चों के लिए विज्ञान लेखन को बढ़ावा देने के लिए जो सकारात्‍मक माहौल बनाया, ‘पराग’ के ज़रिये बालसाहित्‍य पत्रकारिता को जो ऊंचाईयां प्रदान कीं और बाल साहित्‍य में राजतंत्र और जादू-टोने वाली रचनाओं के विरूद्ध जो प्रभावशाली आंदोलन खड़ा किया, वह सब यूं तो इतिहास के पन्‍नों में दर्ज है, किन्‍तु वर्तमान पीढ़ी उस सबसे बहुत कम वाकिफ है। 

शायद यही कारण है कि हरिकृष्‍ण देवसरे के उस महान योगदान को रेखांकित करने, उसे सारी दुनिया के सामने लाने की जरूरत महसूस की गयी और तत्‍पश्‍चात ओमप्रकाश कश्‍यप की पारखी लेखनी के सौजन्‍य से ‘हरिकृष्‍ण देवसरे का बालसाहित्‍य’ जैसी महत्‍वपूर्ण पुस्‍तक सामने आ सकी। 

ओमप्रकाश कश्‍यप मूलत: एक कहानीकार हैं और किस्‍सागोई की परम्‍परा को चमत्‍कारिक शैली में प्रस्‍तुत करने वाले जादूगर के रूप में जाने जाते हैं। इसके साथ ही साथ उन्‍होंने आलोचनात्‍मक लेखन के द्वारा भी बालसाहित्‍य के भंडार को भरने का महत्‍वपूर्ण कार्य किया है। जिस प्रकार उनकी कहानियां मंत्रमुग्‍ध करने के लिए जानी जाती हैं, उसी प्रकार उनके आलोचनात्‍मक लेख भी अपनी बेबाकी के लिए पहचाने जाते हैं। और इसी बेबाकी के कारण ‘हरिकृष्‍ण देवसरे का बालसाहित्‍य’ जैसी कृति अत्‍यंत विशिष्‍ट बन पड़ी है। 

आलोच्‍य पुस्‍तक कुल पांच अध्‍यायों में विभक्‍त है- डा. देवसरे की संक्षिप्‍त जीवनयात्रा, हिन्‍दी बालसाहित्‍य की यात्रा, डॉ. हरिकृष्‍ण देवसरे का रचनात्‍मक अवदान, डॉ. देवसरे के बालसाहित्‍य की प्रमुख विशेषताएं, डॉ. देवसरे के कृतित्‍व की समसामयिकता एवं समीक्षा दृष्टि। पुस्‍तक का यह खाका उसकी रूपरेखा और सामग्री को स्‍पष्‍ट रूप से बयां करने सक्षम है। इसके साथ ही साथ इससे यह भी पता चल जाता है कि पुस्‍तक में देवसरे के मौलिक साहित्‍य को ही विवेचन का विषय बनाया गया है। एक तरह से लेखक की यह सोच सही भी है क्‍योंकि उनके आलोचनात्‍मक कार्य ‘हिन्‍दी बालसाहित्‍य: एक अध्‍ययन’, ‘बाल साहित्‍य : रचना और समीक्षा’ तथा ‘बाल साहित्‍य : मेरा चिंतन’ जैसी पुस्‍तकों के द्वारा पाठकों के समक्ष आ चुके हैं, ऐसे में उनके मौलिक कार्यों की मीमांसा ही अति महत्‍वपूर्ण हो जाती है। 

हिन्‍दी बालसाहित्‍य में जब भी आलोचनात्‍मक लेखन की चर्चा चलती है, तो बेहद निराशाजनक स्थिति सामने आती है। वहां जिस प्रकार से सपाटबयानी का वायरस फैला हुआ नजर आता है, उससे सारा का सारा लिखा पढ़ा गुड़-गोबर हो जाता है। पर प्रसन्‍नता का विषय यह है कि कश्‍यप इस व्‍याधि से सर्वथा मुक्‍त हैं। जब वे आलोचना के धरातल पर भी उतरते हैं तो भी उनकी लेखनी सृजनात्‍मकता और सरसता का दामन नहीं छोड़ती। यही कारण है कि उनका आलोचनात्‍मक लेखन भी बेहद रचनात्‍मक और प्रभावशाली हो उठता है। 

लेखक की यह विशेषता हिन्‍दी बालसाहित्‍य में उन्‍हें महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिलाती है और यही कारण ही उनकी यह कृति अत्‍यंत विशिष्‍ट बन पड़ी है। लेखक ने जिस सूक्ष्‍मता और गम्‍भीरता के साथ हरिकृष्‍ण देवसरे के मौलिक साहित्‍य की विवेचना प्रस्‍तुत की है, उससे यह पुस्‍तक समीक्षकों के लिए एक आदर्श की भांति उपस्थित हुई है। 

जो लोग हरिकृष्‍ण देवसरे के साहित्यिक अवदान से भलीभांति परिचित नहीं हैं, उनके लिए यह पुस्‍तक बाल साहित्‍य के विश्‍वकोश के समान है। क्‍योंकि लेखक ने इसमें न सिर्फ देवसरे की जीवनगाथा और उनकी लेखनी के प्रताप को समोया है, प्रकारांतर से हिन्‍दी बालसाहित्‍य के विकासक्रम को भी समेट लिया है। लेकिन जो लोग हरिकृष्‍ण देवसरे के बाल साहित्‍य को काफी नजदीकी से निरखते रहे हैं, उनके लिए भी यह पुस्‍तक किसी अमूल्‍य निधि से कम नहीं है। कारण लेखक ने जिस मौलिकता एवं मार्मिकता के साथ देवसरे के बचपन एवं परिवार की घटनाओं को वर्णित किया है, वे बेहद प्रभावशाली हैं और पाठक को बांध लेने में सक्षम हैं। इसके साथ ही लेखक ने हरिकृष्‍ण देवसरे की रचनाओं का जिस सूक्ष्‍मता एवं सजगता से विवेचन प्रस्‍तुत किया है, उसे पढ़कर उनके साहित्‍य का एक सर्वथा नवीन पक्ष पाठक के समक्ष अवतरित होता है। 

जो लोग हरिकृष्‍ण देवसरे के साथ गहराई से जुड़े रहे हैं, वे जानते हैं कि उनका जीवन भी किसी रोचक उपन्‍यास की तरह जीवन के विविध रंगों से सराबोर रहा है। उन्‍होंने मध्‍य प्रदेश के सतना जिले की नागौर तहसील के अपने छोटे से गांव से लेकर दिल्‍ली तक की यात्रा में जितने मोड़ देखे और उन्‍होंने अपने जीवन के विभिन्‍न अवसरों पर जो महत्‍वपूर्ण निर्णय लिये, उससे उनकी जीवटता और बालसाहित्‍य के प्रति समर्पण का भाव भलीभांति परिलक्षित होता है। उनके इस विराट व्‍यक्तित्‍व के निर्माण में उनके पिता इकबाल बहादुर देवसरे का कितना योगदान रहा और साथ ही इसके लिए पत्‍नी विभा देवसरे ने अपनी साहित्यिक अभिलाषाओं की कितनी कुर्बानी दिया, लेखक ने इस पहलू को भी पुस्‍तक से ओझल नहीं होने दिया है। बल्कि एक तरह से उन्‍होंने हरिकृष्‍ण देवसरे के जीवन से जुड़े इन दो महत्‍वपूर्ण चरित्रों की लेखन की भी पुस्‍तक में जो हल्‍की सी झलक दी है, उससे उनके बारे में और अधिक जानने की इच्‍छा पाठक के मन में कुलबुलाने लगती है। 

यूं तो हिन्‍दी में बाल साहित्‍यकारों के लेखन पर केन्द्रित अब तक अनेक पुस्‍तकों का प्रकाशन हो चुका है, पर उनमें प्रशंसा का भाव ही सर्वत्र नजर आता है। यह पुस्‍तक इसलिए भी रेखांकित करने योग्‍य है कि इसमें लेखक ने जहां आवश्‍यक होने पर प्रशंसा के पुष्‍प बिखेरने में कसर नहीं छोड़ी है, वहीं जरूरत पड़ने पर आलोचना से भी परहेज नहीं किया है। इससे लेखक की निरपेक्ष दृष्टि का पता चलता है और इस वजह से यह पुस्‍तक विशेष रूप से उल्‍लेखनीय बन पड़ी है। पुस्‍तक का एक अन्‍य रोचक पहलू यह भी है कि यह हरिकृष्‍ण देवसरे के जीवनकाल में ही प्रकाश में आ सकी, जोकि देवसरे जैसे समर्पित रचनाकार के लिए किसी महत्‍वपूर्ण सम्‍मान से कम नहीं है। 

संक्षेप में यदि कहा जाए, तो यह पुस्‍तक सिर्फ हरिकृष्‍ण देवसरे के बालसाहित्‍य के विभिन्‍न पहलुओं का निष्‍पक्ष विवेचन ही प्रस्‍तुत नहीं करती, बालसाहित्‍य की विकासयात्रा एवं उसकी चुनौतियों को भी पाठकों के सामने रखने का महत्‍वपूर्ण कार्य करती है। यद्यपि हरिकृष्‍ण देवसरे द्वारा सम्‍पादित महत्वपूर्ण पुस्‍तकों (बच्‍चों की 100 कहानियां, बच्‍चों की 100 कविताएं, बच्‍चों के 100 नाटक-शकुन प्रकाशन, दिल्‍ली, प्रतिनिधि बाल नाटक-उ0प्र0 हिन्‍दी संस्‍थान, लखनऊ, भारतीय बाल कहानियां(4भाग), साहित्‍य अकादेमी दिल्‍ली आदि) को इस ग्रन्‍थ में स्‍थान नहीं मिल सका है और पुस्‍तक में डॉ. हरिकृष्ण देवसरे द्वारा सृजित समस्‍त पुस्‍तकों की सूची की कमी भी पाठक को खलती है, तथापि हिन्‍दी बाल साहित्‍य के इतिहास की यह एक अनमोल पुस्‍तक है। जो व्‍यक्ति हिन्‍दी बाल साहित्‍य की चुनौतियों के बारे में रूचि रखते हों, जो रचनाकार बाल साहित्‍य के आदर्श स्‍वरूप से परिचित होना चाहते हों और जो समीक्षक बाल साहित्‍य आलोचना के उच्‍च मानदण्‍डों को समझने की अभिलाषा रखते हों, उनके लिए निश्‍चय ही यह एक अपरिहार्य पुस्‍तक है। 

यदि पुस्‍तक के मूल्‍य को प्रकाशन तंत्र की जटिलताओ का दुष्‍परिणाम समझ कर उसे बहस का मुद्दा न बनाया जाए, तो कहा जा सकता है कि ऐसी पुस्‍तकें हर वर्ष नहीं प्रकाशित होतीं, वे कभी-कभी ही अवतरित होती हैं। 

पुस्‍तक: हरिकृष्‍ण देवसरे का बालसाहित्‍य 
लेखक: ओमप्रकाश कश्‍यप 
प्रकाशक: विजया बुक्‍स, 1/10753, सुभाष पार्क, गली नं0-13, नवीन शाहदरा, दिल्‍ली-110032, फोन-011-22822514, ईमेल-vijyabooks@gmail.com 
प्रथम संस्‍करण: 2013 
पृष्‍ठ: 360 
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हरिकृष्‍ण देवसरे और उनका बालसाहित्‍य।
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