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क्‍यों डराती है हमें पुलिस?

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नि:संदेह पुलिस का चेहरा बहुत क्रूर है, लेकिन विज्ञान कहता है कि इस दुनिया में शून्‍य से अथवा...

http://3.bp.blogspot.com/-wv9o8u0OIaM/TdE9ZLKHqLI/AAAAAAAAF60/lKfkCTR5OdQ/s1600/akammm_2Zs1t_6943.jpgनि:संदेह पुलिस का चेहरा बहुत क्रूर है, लेकिन विज्ञान कहता है कि इस दुनिया में शून्‍य से अथवा अपने आप कुछ भी नहीं बनता। हमेशा दो ऊर्जाओं के मिलन से ही तीसरी ऊर्जा का ऊर्जा का निर्माण होता है। इसके साथ ही साथ वह यह भी बताता है कि ऊर्जा कभी नष्‍ट नहीं होती। हाँ, उसका स्‍वरूप अवश्‍य बदला जा सकता है। लेकिन उसके लिए एक बहुत बड़ी प्रक्रिया की जरूरत हुआ करती है।

मुझे ठीक एक साल पहले की घटना याद आ रही है। इसी अगस्‍त के महीने में मेरा मोबाइल खो गया था। मैं उसे सर्विलाँस पर लगवाने के लिए सर्विलाँस सेल गया था। मेरा परिचय पाकर उन लोगों ने मुझे घेर लिया और अपने मन की पीड़ा बताने लगे। एक कह रहा था, अधिकारी लोग हमें कुत्‍ता समझते हैं 24-24 घंटे, 36-36 घंटे ड्यूटी करवाते हैं। घर जाने की फुर्सत नहीं मिलती है। घर में चाहे माँ बीमार पड़ी हो, चाहे बच्‍चे, उनपर पर कोई फर्क नहीं पड़ता। दूसरा बोला, आप तो जानते ही हैं भाई साहब कितनी मँहगाई है आजकल। एक समय था जब प्राइमरी के मास्‍टरों और हम लोगों की तनख्‍वाह में सिर्फ एक रूपये का फर्क हुआ करता था और आज जमीन-आसमान का अंतर है। वो लोग दो घंटा हल्‍ला मचाके मोटी तनख्‍वाह उठा रहे हैं और हम लोग 24-24 घंटे की ड्यूटी के बाद भी घुट-घुट कर जीने के लिए अभिशप्‍त हैं।

दूसरे की बात पूरी होते ही तीसरा बोल उठा, सरकार ढ़ाई सौ रूपया महीने भर के पेट्रोल के देती है। इत्‍ता पेट्रोल दो दिन में फुक्‍क हो जाता है। उसके बाद हम क्‍या करें? घुइयाँ छीलें?’ चौथे ने उसके स्‍वर में मिलाया, आप यकीन नहीं करोगे, आज भी हमें ड्रेस धुलाई के 15 रूपइया मिलते हैं। 15 रूपयों में  होता क्‍या है? और ड्रेस बनवाने के लिए सिर्फ ढ़ाई सौ रूपया, वो भी तीन साल में एक बार। ऐसे में हम क्‍या करें? अपना और परिवार का खर्चा कैसे चलाएं?’

तो आप लोग इसके विरूद्ध आवाज क्‍यों नहीं उठाते?’ मेरे यह कहते ही वे लोग फट पड़े। उनके तेवर देखकर मैं भौंचक्‍का रह गया। उस समय उन लोगों ने जो-जो बातें कहीं, उन्‍हें यहाँ पर हूबहू लिखना संभव नहीं। पर उसका सार यही था कि हमारी इन स्थितियों के लिए हमारे अधिकारी ही जिम्‍मेदार हैं। वे खुद नहीं चाहते कि हम इस स्थितियों से बाहर निकलें। ताकि हम उनके गुलाम बने रहें और उनके आगे-पीछे नाचने के लिए मजबूर रहें।

कितना गुस्‍सा है इन पुलिस वालों के भीतर, यह मुझे पहली बार पता चला। ऐसे में ये क्‍या करेंगे? मानव व्‍यवहार के विशेषज्ञ ए.एस. नील का मानना है कि बुराई मानवीय स्‍वभाव का मूलभूत हिस्‍सा नहीं होती। पर अगर किसी अच्‍छे कुत्‍ते को भी लगातार बाँधे रखो, तो वह भी खूँखार बन जाता है। ऐसे में जब पुलिसवाले 24-24 घंटे लगातार ड्यूटी करते हैं, तनख्‍वाह आदि के कारण अधिकारियों से खिन्‍न रहते हैं, तो उनके मन की क्‍या दशा होती होगी? 

आप एक बार सोच कर तो देखिए। घर में बच्‍चा 100 फॉरेनहाइट के बुखार में तप रहा है, बार-बार पत्‍नी और माँ का फोन आ रहा है। पर पुलिस वाला मजबूर है। उसकी ड्यूटी रैली में लगाई हुई है। वह मन ही मन दाँत भींच रहा है, पर कुछ कह नहीं सकता। विरोध करने का उसके पास अधिकार ही नहीं है। वह और कर्मचारियों की तरह यूनियन नहीं बना सकता है, जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे नहीं लगा सकता। बस मन ही मन घुटता रहता है। ऐसे में जब सामने प्रदर्शनकारियों की भीड़ सामने आती है, तो उसके अवचेतन में बसा हुआ गुस्‍सा उस पर हावी हो जाता है और वह सामने वालों पर ऐसे लाठियाँ बरसाता है, जैसे उसकी इन स्थितियों के लिए वे लोग ही जिम्‍मेदार हों।

दैनिक 'जनसंदेश टाइम्‍स'
तो क्‍या इसका मतलब वे मनोरोगी हो चुके हैं? नहीं, यह मनोरोग नहीं है। यह मनुष्‍य की साइकालॉजी है। आप अपने घर में देखिए। औरतें दिन भर घर में खटती रहती हैं। उनके सिर में, कमर में लगातार दर्द बना रहता है। ऐसे में अगर कोई बच्‍चा कोई सामान तोड़ दे, फिर देखिए। जिस बच्‍चे को वह अपनी जान से ज्‍यादा प्‍यार करती हैं, उस पर वे रणचंडी की तरह टूट पड़ती हैं। धड़-धड़-धड़। गुस्‍से में वह यह भी नहीं देखतीं कि उसके चोट लग सकती है, खून निकल सकता है। और चोट लगती भी है, खून निकलता भी है। पर यह सब वह जानबूझ कर नहीं करती। वह अपने जान से प्‍यारे बच्‍चों के साथ जानबूझ ऐसा कर भी कैसे सकती है? यह सब अनजाने में ही हो जाता है।

मनोविश्‍लेषणकर्ता ए.एस. नील की एक बात मुझे याद आ रही है। वे अपनी विश्‍वविख्‍यात पुस्‍तक समरहिल में लिखते हैं: एक बार मैंने एक सामान्‍य, खुश व संतुलित बच्‍ची को हमारे शिक्षक कक्ष में रखी कीमती लकड़ी की अलमारी में गरम सलाख से छेद करते देखा था। जब मैंने उसे टोका, तो वह चौंक सी गयी। उसने पूरी ईमानदारी से जवाब दिया, मैंने यह बिना सोचे कर डाला। उसका यह काम प्रतीकात्‍मक था। चेतन दिमाग के नियंत्रण से परे था। ऐसा ही हमारे साथ होता है, पुलिस वालों के साथ होता है। हम सबके भीतर असंतुष्‍टी, नाराजगी और पीड़ा के ज्‍वालामुखी भरे हुए हैं। और जहाँ कहीं मौका मिला नहीं कि वे फूट पड़ते हैं।

शायद आपने मुन्‍नाभाई एम.बी.बी.एस. फिल्‍म देखी हो। फिल्‍म में एक प्रसंग है। मुन्‍नाभाई के बाबू जी गाँव से शहर आते हैं। स्‍टेशन पर एक जेबकतरा उनके ऊपर हाथ साफ कर देता है, लेकिन वह पकड़ा जाता है। भीड़ उसे मारने को उतावली हो जाती है। तब बाबूजी उससे कहते हैं- बोल, कर दूँ इनके हवाले? ये हमारे देश की जनता है, जनता। इनके चेहरे देखे हैं? कितने गुस्‍से में हैं। कोई बीवी से लड़ कर आया है, किसी का बेटा उसकी बात नहीं सुनता, किसी को अपने पड़ोसी की तरक्‍की से जन है, कोई मकान-मालिक के ताने सुन कर आया है। सरकार के भ्रष्‍टाचार से लेकर क्रिकेट की हार तक हर बात से नाराज़ हैं ये, लेकिन सब चुप हैं। किसी में मुँह से आवाज नहीं निकलती। और यह सारा गुस्‍सा तुझपे निकालेंगे।
ज्‍यादातर लोग पुलिस को आम इंसान से इतर मानने की गलती कर बैठते हैं। एक मशीन, जो ईमानदारी से अपनी ड्यूटी बजाए, जनता की सेवा करे, वगैरह-वगैरह। ऐसा सम्‍भव ही नहीं है। वे भी इंसान हैं, उनके पास भी परिवार है, उनकी भी कार्य करने की एक सीमा है। और उनकी भी आर्थिक जरूरते हैं। और अगर उनकी ड्यूटी से ये सारी चीजें बाधित हो रही हैं, तो ऐसे में उनका व्‍यवहार तो विकृत होगा ही। ऐसे में उनका क्रूर चेहरा तो सामने आएगा ही। वह कैसे रूक सकता है? क्रोध को अथवा ऊर्जा के भण्‍डार को बाहर आने के लिए सिर्फ एक हल्‍के से सुराख की जरूरत होती है। ऐसे सुराख हमारी व्‍यवस्‍था में बेशुमार हैं। और अगर हम चाहते हैं कि उनके भीतर के इस क्रोध को शान्‍त किया जाए, तो हमें उनके बारे में गम्‍भीरता से विचार करना होगा। उनके काम के घंटों को निर्धारित करना होगा, उनकी आर्थिक जरूरतों का सही से आकलन करना होगा, उनके बारे में मानवीय दृष्टिकोण से सोचना होगा। अन्‍यथा पुलिस यूँ ही डराती रहेगी, काले इतिहास बनाती रहेगी। 
Keywords: Indian Police, Jansandesh Timesh, Police Terror, Police Law and Order

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क्‍यों डराती है हमें पुलिस?
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