ब्‍लॉगवाणी (8) : जीवन की हरियाली के पक्ष में!

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('जनसंदेश टाइम्स', 30  मार्च, 2011 में  'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉ...



('जनसंदेश टाइम्स', 30  मार्च, 2011 में 
'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग समीक्षा)

वर्तमान युग विद्रूपताओं का युग है। आज का मानव अपने स्‍वार्थ में इतना अंधा हो गया है कि वह अपनी गल्तियों को सही साबित करने के जुनून में सरेआम बेशर्मी और बेहयाई की चादर ओढ़ने में भी गर्व का अनुभव करने लगा है। एक ओर जहां धरती के समक्ष आसन्‍न खतरों के मद्देनजर कुछ समझदार लोग विद्युत शवदाह ग्रहों को अपनाने की सलाह दे रहे हैं, वहीं रूढि़यों में जकड़े कुछ तथाकथित विद्वान ऐसे भी हैं, जो विक़ृत परम्‍पराओं की खातिर हरे पेड़ों की कटान को भी सही साबित करने पर उतारू हैं। पर सुखद यह है कि सच को समझने वालों का प्रतिशत धीरे-धीरे ही सही बढ़ रहा है। इस बढ़ते हुए प्रतिशत की एक शानदार मिसाल है डॉ0 पवन कुमार मिश्र का ब्‍लॉग हरी धरती (http://haridhari.blogspot.com/)।

कानपुर इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी, कानपुर में औद्योगिक समाजशास्‍त्र के सहायक आचार्य के रूप में कार्यरत पवन मूलत: एक कवि हैं। लेकिन कविता के साथ ही साथ उन्‍हें प्‍यार है अपने समाज से, अपनी संस्‍कृति से और इन सबसे ज्‍यादा अपनी धरती से। रूढि़यों में जकड़े समाज को देखकर पवन जहां असहज हो उठते हैं वहीं धरती के पर्यावरण के साथ होने वाले खिलवाड़ को देखकर वे दु:ख का अनुभव करते हैं। अपने इसी दर्द को आम जनता तक पहुँचाने और धरती के पर्यावरण को बचाने के उद्देश्‍य से उन्‍होंने हरी धरती ब्‍लॉग का सृजन किया है।
पवन का मानना है कि आधुनिकता की वर्जनाओं को तोड़ती हुई उत्‍तर आधुनिकता स्‍वयं को एक अंधेरी सुरंग के सिवा कुछ और नहीं साबित कर पाई है। जबकि उम्‍मीद यह थी कि औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण के दुष्‍प्रभावों को उत्‍तर आधुनिकता में ढ़ूँढ़ लिया जाएगा। यह दु:ख का विषय कि वह अब तक सिर्फ प्रतिक्रियात्‍मक स्‍वरूप ही अख्तियार कर सकी है। और इसके दुष्‍परिणाम स्‍वरूप आधुनिकता के बजबजाते सीवर सभ्‍यता रूपी गंगा को काला करने के अतिरिक्‍त कुछ और नहीं कर सके हैं। पवन इस ब्‍लॉग के औचित्‍य की व्‍याख्‍या करते हुए कहते हैं, हरी धरती एक अभियान है, जो पागलखाने और खुली जेल में तब्दील हो चुके समाज को पुनर्गठित करने हेतु संकल्पबद्ध है। इस क्रम में बिगड़ी आब-ओ-हवा को ठीक करना प्राथमिकता है। अपने इस उद्देश्‍य के लिए वे संरक्षणात्‍मक विकास का नारा बुलंद करते हैं और स्‍पष्‍ट रूप से घोषणा करते हुए कहते हैं कि हमारा लक्ष्य जल, जंगल, जमीन और जानवरों के संरक्षण में निहित है।

पवन पूरी तरह से जमीन से जुड़े हुए आदमी हैं। उन्‍हें मालूम है कि आजकल पर्यावरण की बात करना फैशन या स्टेटस सिम्बल सा बन गया है। वे यह भी जानते हैं कि पर्यावरण बचाने के नाम पर तमाम सरकारी, गैर सरकारी संस्थाएं पैसा और पुरस्कार बटोरने में लगी हुई हैं। यही कारण है कि हमारा वातावरण लगातार बदहाल हो रहा है। वे अपनी पोस्‍ट धरती की उत्तरजीविता में आपकी सहभागिता के द्वारा पर्यावरण संरक्षण के नाम पर दूसरों पर दोषारोपण करने की प्रवृत्ति को उजागर करते हैं। वे इस समस्‍या को रेखांकित करते हुए कहते हैं, एक और ट्रेंड चल निकला है- पर्यावरण प्रदूषण की जिम्मेदारी अपने से कमजोर लोगों पर डालना। विकसित देश विकासशील देशों पर इसकी जिम्मेदारी डालते हैं, तथाकथित सभ्य लोग गंवारों पर और पूंजीवादी गरीबों पर प्रदूषण फैलाने का आरोप मढ़ कर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेते हैं। इसीलिए वे अपनी इस सोच को आम जनता के बीच ले जाना चाहते हैं और धरती को बचाने के लिए खुले मन से हर खास-ओ-आम का आह्वान करते हैं।
 
भारतीय संस्‍कृति में महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखने वाली और भारतीय कृषि में महत्‍वपूर्ण योगदान देने वाली जीवनदायिनी नदी गंगा की बदहाली देखकर पवन अकसर दु:खी हो उठते हैं। वे गंगा से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े पोस्‍ट में दु:खपूर्वक बताते हुए कहते हैं कि गंगा में लगभग 3840 नाले गिरते है, जिसके कारण गंगोत्री से लेकर गंगा सागर तक प्रतिदिन 144.2 मिलियन क्यूबिक मल-जल गंगा को प्रदूषित करता है। वे बताते हैं कि गंगा तट पर स्थापित औद्योगिक इकाईयां प्रतिदिन 430 मिलियन लीटर जहरीले अपशिष्ट गंगा में बहा देती है तथा लगभग 172.5 हजार टन कीटनाशक रसायन और खाद हर वर्ष गंगा में पहुंचता है। वे बताते हैं कि इन्‍हीं सब कारणों से वर्तमान समय में गंगा से डालफिन लुप्तप्राय हो गयी हैं। और उससे भी बड़ी चिन्‍ता की बात यह है कि ये तमाम प्रदूषक तत्‍व अंततोगत्‍वा पीने वाले पानी के रूप में हमारे पेट में पहुंचते हैं और तमाम तरह की बीमारियों का कारक बनते हैं।

पवन गंगा की प्रमुख धाराओं की वर्तमान स्थिति की चर्चा करते हुए कहते हैं कि इसकी 26 धाराओं में से रूद्र गंगा, खंडव गंगा, नवग्राम गंगा, शीर्ष गंगा, कोट गंगा, हेमवती गंगा, शुद्धतरंगिनी गंगा, धेनु गंगा, सोम गंगा, दुग्ध गंगा, घृत गंगा विलुप्‍त हो चुकी हैं तथा गणेश गंगा (पातालगंगा), गरुड्गंगा और हेम गंगा सूख चुकी हैं। वे बताते हैं कि ऋषी गंगा, धवल गंगा, विरही गंगा, आकाश गंगा, गूलर गंगा, हनुमान गंगा, सिद्धतरंग गंगा, अमृत गंगा, लक्ष्मण गंगा, केदार गंगा के जल स्‍तर में तेजी से गिरावट हो रही है, जबकि रामगंगा तेजी से सूख रही है और कंचन गंगा वनस्‍पति के तीव्र दोहन के कारण गादयुक्‍त स्थिति में पहुंच गयी है। वे अपनी इस चिंता को मुखर बनाते हुए कहते हैं कि हालांकि गंगा को साफ करने के लिए सरकार द्वारा करोड़ों रूपये खर्च किये जा रहे हैं, लेकिन इन रूपयों की गंगा सरकारी बाबुओं, हाकिमों, नेताओं के घर में बह रही है। वे अपनी पीड़ा को अभिव्‍यक्ति प्रदान करते हुए कहते हैं, गंगा अब मरने के कगार पर पहुंच चुकी है। वह दिन दूर नहीं जब गंगा इतिहास के पन्नों में सरस्वती नदी की तरह कहीं खो जाएगी।

नदियों की तरह ही आज बाघ संरक्षण भी एक ज्‍वलंत मुद्दा बन गया है। पवन बताते हैं कि पिछले 36 महीनों में उत्तर प्रदेश के जिला खीरी एवं पीलीभीत के जंगलों से बाहर आये बाघों के द्वारा खीरी, पीलीभीत, शाहजहांपुर, सीतापुर, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद में लगभग दो दर्जन लोग मारे जा चुके हैं। वे इन घटनाओं के पीछे के कारणों का खुलासा करते हुए कहते हैं, बाघों को सुनियोजित तरीके से नरभक्षी बनाया जाता है फिर उनकी हत्या को वैध रूप प्रदान करने में आसानी हो जाती है। उनका मानना है कि ये सब एक सुनियोजित शाजिस का हिस्‍सा है। वे अपनी पोस्‍ट बाघों के संरक्षण के लिए मातमपुरसी में इन घटनाओं के पीछे के मुख्‍य कारण को उल्लिखित करते हुए कहते हैं कि बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल कामोत्तेजना बढ़ाने वाले उत्पाद, जोड़ों या हड्डियों की बीमारियों की दवाएं आदि बनाने में किया जाता है। वहीं बाघ के नाखून बुरी शक्तियों को दूर भगाने के लिए लोकप्रिय हैं। इनकी कीमत भी हड्डियों के बराबर ही है। वे बताते हैं कि तकरीबन 6 साल पहले बाघ की हड्डियां प्रति किलो 3,000 से 5,000 डॉलर हुआ करती थी। तब से लेकर अब तक इनकी कीमतें 10 से 15 फीसदी बढ़ चुकी हैं।

पवन को ढ़पोरशंखियों और आडम्‍बरों से सख्‍त नफरत है। उन्‍होंने दैवी शक्तियां और भ्रष्टाचार में क्या सम्बन्ध है नामक पोस्‍ट में कानपुर में भ्रष्‍टाचार को मिटाने के उद्देश्‍य से गंगा किनारे यज्ञ आयोजित कराने वाले प्रखर जी महाराज की अच्‍छी क्‍लास ली है- ये पोंगा पंडित 10 लाख लोगों को गंगा  के किनारे इकठ्ठा करके और भी प्रदूषण फैलाने का काम नहीं कर रहे हैं क्या? यज्ञ से अगर भ्रष्टाचार रुकता, तो सी. बी. आई. जैसी संस्थाओं को ख़तम कर देना चाहिए। इस यज्ञ के आयोजन में जितना खर्च आएगा, उतने पैसे अगर पेड़ लगाने और उनके संरक्षण में लगाए जाएं, तो भ्रष्टाचार तो नहीं प्रदूषण रुक सकता है। वे इस तरह के कार्यक्रमों के औचित्‍य पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि ये नेता, अभिनेता, उद्योगपति और नौकरशाह भ्रष्टाचार के सबसे बड़े स्रोत हैं आम जनता नहीं। और आश्‍चर्य का विषय है कि यज्ञ भी इन्हीं के पैसों से होता है। अंत में वे लाख टके की बात कहते हैं कि भ्रष्टाचार रोकने हेतु यज्ञ की नहीं वरन कुरीतियों, दिखावा, शोषण और असमान वितरण को रोकना होगा।

एक ओर जहां पवन की चिन्‍ताओं में पर्यावरण और पाखण्‍ड है, तो वहीं दूसरी ओर असमान वितरण और शोषण से शुरू हुई नक्‍लवाद की समस्‍या भी उनके एजेन्‍डे में शामिल है। एक अकथ कहानी जो शुरू हुई शोषण से नामक पोस्‍ट में उन्‍होंने आदिवासियों की पीड़ा को बखूबी बयां किया है। लेकिन इस चिन्‍ता के मूल में भी जमीन है, पहाडि़यां हैं, खेत हैं और हैं मवेशी। यह कविता कुछ इस प्रकार से है: उन्होंने मुझसे अनगिनत वादे किये/ इतने कि मुझे सब याद नही हैं/ लेकिन पूरा सिर्फ एक वादा किया/ उन्होंने मुझसे कहा था कि मेरी जमीन ले लेंगे/ और उन्होंने ले ली/ मेरी हरी भरी पहाड़ियां कहां गयीं?/ मेरे बचपन में चरागाहें इतनी इतनी हरी भरी थीं/  कि मेरे मवेशी व जानवर यहाँ साल भर चरते थे/ आज नज़र उठा कर देखता हूँ/ तो केवल भूरी-भूरी चट्टानें ही नज़र आती हैं/ मैं क्या करूँ?’ वे इस तरह की तमाम समस्‍याओं की नब्‍ज पर उंगली रखते हुए कहते हैं कि इस देश में सामाजिक नीतियों का निर्माण पूंजीपति करते हैं जो हर चीज़ में लाभ-हानि का गुणा भाग करके किसी भी योजना को मूर्त रूप देते हैं। वे बताते हैं कि बात महज सामजिक नीतियों की ही नहीं है, चाहे शैक्षिक नीति हो या सांस्कृतिक, ये सब में लिप्त हैं। वे नीति निर्माताओं की नियत पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि हमारे यहां किसी सांस्कृतिक नीति निर्माण में किसी मानवशास्त्री या समाजशास्त्री के शामिल होने की संभावना नगण्य रहती है और अगर रहती भी है तो केवल हाथी के दांत सरीखी। अंत में वे चेतावनी देते हुए कहते हैं, अब भी समय है अगर चेता न गया तो सम्पूर्ण देश को कुरुक्षेत्र बनने में समय नहीं लगेगा।

पवन अपने ब्‍लॉग में धरती के एक सजग प्रहरी के रूप में नजर आते हैं। चाहे वे प्लास्टिक की 'निपटान' एक मिथक है में प्‍लास्टिक के द्वारा व्‍यापक पैमाने पर फैलाये जाने वाले प्रदूषण की चर्चा कर रहे हों अथवा कागजों से शौच बनाम पर्यावरण चेतना फैलाने हेतु दौड़ या रैली में अभिजात्‍य वर्ग के ढ़ोंग की पोल खोल रहे हों, उनका तरीका बेहद धारदार और निर्मम होता है। वे प्‍लास्टिक के दुष्‍परिणाओं को बताते हुए कहते हैं कि हानिकारक प्लास्टिक के उत्पादन के दौरान उत्सर्जित होने वाले पदार्थ इथाइल ऑक्साइड, बेंजीन, और जैलीन वातावरण को बेहद जहरीला कर रहे हैं और पृथ्वी पर मौजूद सभी प्रजातियों के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे है। इन रसायनों से जन्म दोष,  कैंसर, तंत्रिका तंत्र का क्षरण और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली, रक्त और गुर्दे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही वे बताते हैं कि प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग के दौरान भी यही रसायन दुगुनी मात्र में उत्सर्जित होते हैं। इसके साथ ही साथ पवन अभिजात्‍य वर्ग के पर्यावरण प्रेम के ढ़ोंग को कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकते। वे बताते हैं कि दुनिया में मात्र 7% अभिजात्य देश अकेले दुनिया के 50% कार्बन का उत्सर्जन करने के जिम्‍मेदार हैं। वे इन धनिकों की मानसिकता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि एक ओर ये लोग शौच के लिए पानी के स्‍थान पर उत्‍तम कोटि के कागजों का प्रयोग करते हैं और दूसरी ओर पेड़ों को बचाने के लिए रैली का आयोजन करते हैं। इससे यह स्‍पष्‍ट है कि वे पर्यावरण चेतना नहीं फैलाना चाहते, इस तरह के आयोजनों से अपने अपराधबोध को कम करने का प्रयत्‍न करते हैं।

उपर्युक्‍त विवेचन से स्‍पष्‍ट है कि हरी धरती एक ब्‍लॉग भर नहीं, इस धरती को बचाने का, इसे प्रदूषण से मुक्‍त कराने का, इसे हरा भरा बनाने का एक आंदोलन है। क्‍या आप भी इसमें शामिल होना चाहेंगे?
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