इतनी घृणा कहाँ से लाए पाण्‍डे जी?

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भूमिका: एक बाल साहित्‍यकार हैं पाण्‍डे जी, उन्‍होंने पिछले दिनों से ब्‍लॉग जगत में और फेसबुक पर मेरे विरूद्ध काफी दुर्गंध फैलाई हुई है...

भूमिका: एक बाल साहित्‍यकार हैं पाण्‍डे जी, उन्‍होंने पिछले दिनों से ब्‍लॉग जगत में और फेसबुक पर मेरे विरूद्ध काफी दुर्गंध फैलाई हुई है। यह पोस्‍ट उनके उस निकृष्‍ट कर्म की प्रतिक्रिया स्‍वरूप लिखी गयी है। मेरा मानना है कि जब लोग कामयाबी की सीढि़याँ चढ़ते हैं, तो उन्‍हें नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह की शातिर चालें चली जाती हैं। हालाँकि समझदार लोग ऐसे मौकों पर चुप ही रहते हैं, लेकिन जब पानी सर से ऊपर निकल जाए, तो एक्‍शन लिया जाना जरूरी हो जाता है, वर्ना आने वाला समय ऐसे लोगों को डरपोक और कायर की संज्ञा से विभूषित करता है।

वाह भई वाह, आपकी शातिर बुद्धि की दाद देने को जी चाहता है। ऐसी शतरंजी चाल बिछाई, कि सास-बहू सीरियल के सारे नकारात्‍मक वृत्ति के पात्र फीके पड़ गये।

अपने बालिकाओं के कहानियाँ संग्रह के लिए कहानियाँ मंगाना, एक हजार रचनाओं से प्रथम चुनी गयी कहानी बेबी माने अप्‍पी को ईर्ष्‍यावश/जानबूझकररिजेक्‍ट करना, जानबूझकर किसी खास कहानी को मंगाना, फिर उसी विषय की दूसरे लेखक की कहानी को छापना, पूछने पर देर से मिलने का बहाना बनाना, ब्‍लॉग पर संग्रह के परिचय में एक लेखक का नाम गायब करना, किसी के याद दिलाने पर उस कमेंट को ही डिलीट कर देना, लेखक द्वारा टिप्‍पणी करने पर विवादित टिप्‍पणियों को प्रकाशित न करने की बात कह कर उन्‍हें हटा देना, मेल भेज कर इस कष्‍ट के लिए खेद व्‍यक्‍त करना, फिर कुछ चुने हुए कमेंट को प्रकाशित करके मामले को भड़काना, जानबूझकर कीचड़ उछाना, फिर उसके ब्‍लॉग पर जॉकर बेनामी बन कर उसकी सूचना देना, उसपर भी घृणा की आग ठन्‍डी न पडने पर फेसबुक पर चौर्यवृत्ति की चर्चा करती पोस्‍ट लगाना, फिर सीधे कहानी को लक्ष्‍य करके पोस्‍ट लगाना।

इतनी घृणा कहाँ से लाए बंधु?
कब से इसे सहेजे फिर रहे हो?

तभी तो कहूँ कि क्‍यों इतने कटु होते हैं आपके कमेंट। तभी तो कविता में ग्‍यारहको ग्‍यारा लिखने पर आप लाल-पीले हो जाते हैं, तभी जरा सा अशुद्ध शब्‍द लिख जाने पर गुरूजी बनकर समझाने चले आते हैं।

अब समझ में आया उन सारे कर्मकाण्‍डों का औचित्‍य। वह भीतर की घूणा ही थी, जो जरा-जरा से अवसरों के ताक में मारी-मारी फिरा करती थी,

पर बंधु, कब तक इसे ढ़ोते फिरोगे? कब तक इस नौटंकी को सबको फोन पर बताते फिरोगे भाई? कब तक इस जबरदस्‍ती के ड्रामे को सबकी फेसबुक वॉल पर चिपकाते रहोगे भाई?

आखिर इससे हासिल क्‍या करना चाहते हो, साफ-साफ कहो?
अगर आप उम्र में बड़े होकर भी स्‍वयं को पीछे छूट गया महसूस करते हैं, तो यह मेरी गल्‍ती नहीं है भाई। मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।

मैं तो हमेशा आपको बड़ा भाई मानता रहा हूँ। हमेशा समय-समय पर फोन करके हालचाल लेता रहा हूँ, होली-दिवाली, नये साल पर बधाई भी देता रहा हूँ। आपको ध्‍यान होगा, इस दिवाली भी दिया था, भीलवाड़ा में आप द्वारा इतनी कटुता दिखाने के वाबजूद। क्‍योंकि मेरा मानना है कि सामने वाला कुछ भी करे, आप अपना व्‍यवहार मत बदलिए। मैं तो जैसा हूं, वैसा ही रहूँगा। अगर आप मुझे समझ सको, तो मुझे भी प्रसन्‍नता होगी।

और हाँ, दूसरे पर वार करते समय सामने वाले को निहत्‍था बिलकुल नहीं समझना चाहिए। अपनी हालिया प्रकाशित किताब की पहेलीनुमा भूमिका और चल मेरे घोडेकविता को याद रखिए। अगर सामने वाला आपकी तरह अपने पर उतर आए, तो इनको लेकर आपको भी तिगनी का नाच नचाया जा सकता है।

इस पूरे प्रकरण में पाण्‍डे जी ने अपनी शातिर चालों से बाल साहित्‍यकार श्री रावेन्‍द्र कुमार रवि का नाम जोड़ दिया है। हालाँकि मैंने अपने कमेंट में कहीं भी न तो उनका नाम लिया था और न ही उनकी कहानी का, लेकिन फिरभी जैसा कि पाण्‍डे जी ने माहौल बना दिया है, उससे रवि जी का नाम शामिल हो गया है और उनपर आक्षेप भी। मैं इसके लिए खेद व्‍यक्‍त करता हूँ। यदि इस घटना से उनके मन को किसी प्रकार का कष्‍ट पहुँचा हो, तो मैं खुले मन से उनसे क्षमा माँगता हूँ।

इस पूरे घटनाक्रम का एक फायदा यह हुआ हुआ कि पाण्‍डे जी का असली चरित्र सामने आ गया है। मैं बहुत दिनों से छिपे रूप में उनकी घृणा का शिकार हुआ करता था, अब किसी प्रकार का धोखा नहीं रहेगा। हाँ, यदि इस घटना से अन्‍य लोग भी सबक ले सकें, तो यह इसका लोकहितकारी पक्ष होगा।

COMMENTS

BLOGGER: 42
  1. यह आलेख लिख कर आपने स्वस्थ परम्परा का निर्वहन किया है!

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  2. यह हम सब की ज़िम्मेदारी है कि अपने ज़ुल्म से तौबा करें।

    देखिए एक वीडियो :

    http://youtu.be/i4Jci3U5MYI

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रिय भाई, इस पोस्ट को यदि आप मेरे नाम के साथ भी लगा देते तो मुझे कोई आपत्ति न होती.अपनी बात कहने का सभी को हक़ है, और सहमती/असहमति अलग बात हो सकती है.
    ............
    सरासर झूंठ लिखकर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं, मेरी समझ से परे है ?

    मूल विषय को छुपाना कोई आपसे सीखे.
    'बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियाँ' संग्रह के लिए आपने 'सच्ची सुन्दरता' कहानी भेजी थी, जिसे मैंने रिजेक्ट कर दिया था क्योंकि वह रावेन्द्र कुमार रवि की कहानी की कापी जैसी थी, किन्तु यह बात पूर्णत: गोपनीय थी.
    आपने ही मुझे मेल भेज कर और 'अभिनव सृजन' पर टिप्पणी कर इस बात को लगभग पांच साल बाद हवा दी. अन्यथा जब आप सिधोली मेरे कालेज में पी.एच.डी. हेतु अपनी सिनाप्सिस के लिए आये थे , तभी मैंने खेदपूर्वक आपको बता दिया था कि आपकी कहानी का उपयोग मैं नहीं कर सका.

    ......................
    आप कहते हैं कि पूरे प्रकरण में पाण्‍डे जी ने अपनी शातिर चालों से बाल साहित्‍यकार श्री रावेन्‍द्र कुमार रवि का नाम जोड़ दिया है। हालाँकि मैंने अपने कमेंट में कहीं भी न तो उनका नाम लिया था और न ही उनकी कहानी का, >>>>>>>>>>>>>>>>लीजिये अपनी वह टिप्पणी देखिये जिसमें 'सच्ची सुन्दरता' क़ी कापी का संकेत है,
    +++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++++
    डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…
    नागेश जी, संयोग से कल शैलेन्‍द्र जी से आपके द्वारा सम्‍पादित बालिकाओं
    की श्रेष्‍ठ कहानियां पुस्‍तक मिली। पुस्‍तक देखकर आश्‍चर्य हुआ कि उसमें
    आपने मेरे द्वारा भेजी गयी कहानी 'सच्‍ची सुंदरता' के स्‍थान पर उसकी
    'कॉपी' जैसी दूसरे लेखक की कहानी को स्‍थान दिया गया है, जोकि मेरी रचना
    की तुलना में शिल्‍प एवं प्रभाव की दृष्टि से 'काफी कमजोर' प्रतीत होती
    है। जबकि मुझे ध्‍यान है कि आपने स्‍वयं फोन करके उस कहानी की मांग की
    थी। मैं यह समझ पाने में अस्‍मर्थ हूं कि आपने मंगाने के बाद उस कहानी को
    संग्रह में स्‍थान क्‍यों नहीं दिया?


    ८ सितम्बर २०११ १०:०२ पूर्वाह्न


    टिप्पणी हटा दी गई
    यह पोस्टलेखक के द्वारा निकाल दी गई है.

    ८ सितम्बर २०११ १०:०४ पूर्वाह्न


    डॉ. नागेश पांडेय "संजय" ने कहा…
    जाकिर जी , २००७ में प्रकाशित 'बालिकाओं की श्रेष्‍ठ कहानियां' पुस्‍तक
    की जिस कहानी 'सुन्दर कौन' की ओर आपका संकेत है , वह हिंदी के लगभग तीन
    दशक पुराने बाल साहित्यकार रावेन्द्र कुमार रवि की (अमर उजाला के 'बच्चों
    का पन्ना' में प्रकाशित)22 साल पुरानी रचना है. तब तो आपने लेखन भी आरम्भ
    नहीं किया था . फिर.. वह आपकी कहानी 'सच्‍ची सुंदरता' की 'कॉपी' जैसी
    कैसे हो सकती है ?
    रावेन्द्र कुमार रवि की कहानी को इसी मौलिकता के आधार पर प्राथमिकता के
    साथ प्रकाशित किया गया. उसके कमजोर या मजबूत होने की बात तो फ़िलहाल पाठक
    ही तय कर सकते हैं .

    १२ सितम्बर २०११ ७:२८ पूर्वाह्न


    रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…
    धन्यवाद, नागेश जी!
    आपका कहना बिल्कुल सही है!
    मेरी यह कहानी आपने बहुत पहले अमर उजाला में ही बीस साल पहले पढ़ी होगी!
    सही तिथि अभी बता पाना संभव नहीं है,
    क्योंकि पुराने पत्र-पत्रिकाएँ शाहजहाँपुर में रखे हैं
    और अब दीपावली से पहले मेरा शाहजहाँपुर आना संभव नहीं है!
    --
    शायद आपको ध्यान होगा कि रजनीश जी की कहानी पढ़कर मैंने आपसे यह कहा था
    कि इन्होंने मेरी कहानी की नकल मार रखी है!
    उसके बाद मैं इस बात को भूल गया,
    पर अब उपरोक्त दोनों टिप्पणियाँ पढ़कर याद आ गई!

    १२ सितम्बर २०११ ६:३६ अपराह्न


    डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…
    नागेश जी, आश्‍चर्य का विषय है कि कहानी के लेखक को उसके प्रकाशन की मूल
    तिथि याद नहीं है और आपको है। कृपया उस कहानी के प्रथम प्रकाशन की
    छायाप्रति उपलब्‍ध कराने का कष्‍ट करें। इस हेतु मैं आपका हृदय से आभारी
    होऊगा।

    १६ सितम्बर २०११ २:०६ अपराह्न
    ====================================

    आपकी यह टिप्पणियाँ मेरे मेल बाक्स में भी सुरक्षित हैं.
    आप खुद देखिये कि मूल लेखक से आपका संकेत किसकी ओर है ?
    ...और बालिकाओं की श्रेष्‍ठ कहानियां में तो सुन्दरता पर बस रवि जी क़ी ही कहानी आई है.
    मूल विषय यह था क़ि इस कहानी का वास्तविक लेखक कौन है और आप मेरे ऊपर अनर्गल आरोप मढ़ रहे हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. पाण्‍डे जी, सबसे पहली बात जिसे आप जानबूझ कर इग्‍नोर कर रहे हैं, वह यह कि आपने 'बेबी माने अप्‍पी' कहानी रिजेक्‍ट की। क्‍यों, इसका कोई कारण नहीं दिया, इसी से आपकी दुर्भावना सामने आई, क्‍योंकि आप नहीं चाहते थे कि उस जैसी सराहनीय कहानी को, जोकि बालहंस कहानी प्रतियोगिता में प्रथम आई थी, संग्रह में स्‍थान मिले।


    दूसरी बात जिस आपकी इस पोस्‍ट पर अरशद ने कमेंट किया, तो आपने उसका कमेंट डिलीट कर दिया और उसका जवाब मुझे प्रेषित किया।
    यह कमेंट अभी तक अप्रकाशित है, जबकि उसमें कोई भी अनुचित बात नहीं थी। इससे भी आपकी दुर्भावना प्रकट होती है।

    तीसरी बात जब उसके बाद मैंने इस शिकायत को लेकर कमेंट किया, तो आपने उसे भी डिलीट कर दिया।
    यह कमेंट भी अभी तक अप्रकाशित है। इससे भी आपकी दुर्भावना प्रकट होती है।

    इतना होने के बाद किसी भी व्‍यक्ति का आवेशित होना स्‍वाभाविक है। इसीलिए उत्‍तेजना में मेरे कमेंट में 'कॉपी' वाली बात आ गयी। हालांकि मैंने यहां पर सावधानी बरते हुए किसी लेखक का नाम नहीं लिया, पर मुझसे गलती यह हो गयी कि मैंने आवेश में शिल्‍प के कमजोर वाली बात कह दी। इसीलिए मैंने महसूस किया कि मुझे ऐसा नहीं कहना चाहिए था, इसीलिए मैंने इस पोस्‍ट को लगाया और उसपर खेद व्‍यक्‍त किया।
    चौथी बात जब मैंने इसे लेकर आपको शिकायत की, तो आपने विवाद का बहाना बना कर सारे कमेंट डिलीट कर दिये और खेद व्‍यक्‍त कर दिया।

    आपने एक बार सारे कमेंट हटाने के बाद खेद व्‍यक्‍त किया और चुपके से मौका देखकर उन्‍हें फिर से प्रकाशित करके बात को भड़काया (इस तरह की स्थितियों के लिए ही संभवत: थूक कर चाटना और दोगना होना के मुहावरे प्रचलित हैं), इससे भी आपकी दुर्भावना प्रकट होती है।

    समझ में नहीं आता कि आपकी इस दुर्भावना की वजह क्‍या है, जिसकी वजह से आप ऐसा कर रहे हैं। यह सचमुच अशोभनीय है, शर्मनाक है।

    मुझे इस बात का पछतावा है कि मैंने आप जैसे व्‍यक्ति को अपना मित्र और बडा भाई समझा, और आपने मौका देखकर मेरी पीठ पर छूरा भोंक दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  6. जाकिर जी, मैं हमेशा आपसे यह कहता रहा हूँ कि साहित्यकार की भाषा में विनम्रता होनी चाहिए. गाली गलौज की भाषा कम से कम बाल साहित्यकार की तो नहीं है. और.. यह बेबी माने अप्पी का नया शिगूफा क्या है ?
    यह कहानी तो आपने भेजी ही नहीं.


    अच्छा होगा आप रवि और अपनी कहानी के मूल रूप के स्केन को साथ साथ प्रकाशित कर दें. पाठक खुद तय कर लेंगें कि कहानी का वास्तविक लेखक कौन है ?
    ...और यह बात पुन: मैं आपको बताना चाहता हूँ कि विश्वाश रखें - ऊपर वाले को याद कर यह बात लिख रहा हूँ : आप के प्रति मेरे मन में कोई दुर्भाव नहीं है. वैचारिक असहमति के लिए छुरा जैसा शब्द प्रयोग न करें.

    उत्तर देंहटाएं
  7. पाण्‍डे जी, लोग मेरे बारे में अच्‍छी तरह से जानते हैं कि न मैं शिगूफे छोड़ने में यकीन रखता हूं और न ही मिथ्‍या प्रचार करने में। उस संग्रह के लिए मैंने आपको 'बेबी माने अप्‍पी' भेजी थी, जिसके बाद आपने फोन करके 'सच्‍ची सुंदरता' की मांग की थी। हालांकि अभी तक इस बात का भी जवाब नहीं आया है कि जब आप रावेन्‍द्र की कहानी पहले ही पढ चुके थे, तो फिर 'सच्‍ची सुंदरता' की मांग क्‍यों की थी। यह सवाल मैं आपसे पहले भी पूछ चुका हूं, जिसका जवाब आप टालते रहे हैं।


    और हां, एक बार कमेंट हटाने के बाद, खेद व्‍यक्‍त करने के बाद उन्‍हें फिर चुपके से प्रकाशित करना पीठ में छूरा भोंकना ही है। आपकी जानकारी में इसके लिए क्‍या कहा जाना चाहिए, बताने का कष्‍ट करें। साथ ही यह भी आखिर आपने ऐसा किस पवित्र भावना के वशीभूत होकर किया।

    और हां, यहां पर कहानी के वास्‍तविक लेकर का कोई मुददा ही नहीं है, असली मुददा है आपकी भावना का और उसी के उजागर के लिए यह पोस्‍ट लिखी गयी है।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जाकिर जी, पहली बात बेबी मने अप्पी जैसी आपकी कोई कहानी मुझे मिली नहीं.
    'सच्‍ची सुंदरता' आपने भेजी थी जिसे रवि जी के यह कहने पर कि यह तो उनकी कहानी की नक़ल है (यह बात आप रवि जी की टिप्पणी में भी देख सकते हैं),के कारण मैंने आपकी कहानी को रिजेक्ट कर दिया.

    मौलिकता का ध्यान किसी संकलन और उसके संपादक का दायित्व होता है. यद्यपि संकलन कि सीमाएं भी तो हैं 120 पेज की पुस्तक में सबको शामिल भी नहीं किया जा सकता. लेकिन मैं यह मानता हूँ कि मैंने आपको नहीं बताया कि मौलिक न होने के कारण मैंने आपकी कहानी को रिजेक्ट कर दिया.
    और.. भाई, चुपके से प्रकाशित करने की क्या बात है. मैं बार बार आपको मेल कर रहा हूँ कि रवि जी ने अपनी मूल कहानी 'सुन्दर कौन' जिस पर आपका आरोप भी था और आप उसकी प्रति भी देखना चाहते थे) उपलब्ध करा दी है. कृपया उन्हें अपना स्पष्टीकरण देने का कष्ट करें. किन्तु आपने बजाय स्पष्टीकरण देने के अपनी टिप्पणी ही हटा दी.
    मेरी भावना में कोई खोट नहीं है, यदि आप मुझे बड़ा भाई मानते रहे हैं तो मैं भी उसी नाते आपको सुझाव देना अपना अधिकार मानता रहा. फिर भी ...........आप लेखनी के धनी हैं, यह मैंने अपने अनेक आलेखों में ही नहीं अपने शोध ग्रन्थ 'बाल साहित्य के प्रतिमान' में भी लिखा है. आप सम्मान देते हैं, वह आपका व्यक्तित्व है. किन्तु जो आपका कृतित्व है, उसका मैं सम्मान करता हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  9. नागेश जी, 'बेबी माने अप्‍पी' की बात पर आप सर्वथा असत्‍य बोल रहे हैं। मुझे अच्‍छी तरह से ध्‍यान है कि उसके भेजने पर आपने फोन करके कहा था कि संग्रह हेतु मैं तो सच्‍ची सुंदरता कहानी चाह रहा था, वह कहानी संग्रह की भावना के ज्‍यादा अनुकूल है।

    इस सारे विवाद की जड़ यही मूल बिन्‍दु है कि आपने 'बेबी माने अप्‍पी' को किस आधार पर रिजेक्‍ट किया और 'सच्‍ची सुंदरता' की मांग क्‍यों की, जबकि आप इस विषय पर दूसरी कहानी पहले ही पढ चुके थे।

    इसके साथ ही तीसरा सवाल भी महत्‍वपूर्ण है, जब एक बार आपने ब्‍लॉग के सारे कमेंट विवाद के कारण हटा दिये थे, और उनके लिए खेद भी व्‍यक्‍त कर दिया था, फिर उन्‍हें दुबारा पब्लिश करके आप क्‍या साबित करना चाहते थे?

    मुझे इन सवालों के सीधे-सीधे जवाब चाहिए, कोई किन्‍तु-परंतु नहीं।

    उत्तर देंहटाएं
  10. दो-तीन दिन से मैं लगातार पाण्डेय जी की तल्ख़ वयानी को पढ़ रहा हूँ, कितनी शर्म की बात है की स्वयं को स्वयंभू मनीषी कहने वाले ये साहित्यकार व्यक्तिगत खुन्नस निकालने हेतु सारे क्षद्म प्रयत्न कर जाते हैं. पाण्डेय जी तो अपने को वाल साहित्य के समीक्षक विश्लेषक और न जाने क्या -क्या कहते रहते है ...खैर मुझे याद है की एकबार जाकिर भाई ने मुझसे चर्चा की थी की ‘बेबी माने अप्‍पी’ कहानी भेजी है किन्तु उनके द्वारा इसे ईर्ष्‍यावश/जानबूझकर’ रिजेक्ट कर दिया गया है. जाकिर भाई की बातों से सहमत हूँ की अगर सामने वाला आपकी तरह अपने पर उतर आए, तो इनको लेकर आपको भी तिगनी का नाच नचाया जा सकता है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. नागेश जी,
    जब इस सारे विवाद की जड़ यही मूल बिन्‍दु है कि आपने 'बेबी माने अप्‍पी' को किस आधार पर रिजेक्‍ट किया और 'सच्‍ची सुंदरता' की मांग क्‍यों की, जबकि आप इस विषय पर दूसरी कहानी पहले ही पढ चुके थे। सीधे-सीधे क्यों नहीं कहते की जाने या अनजाने में गलती हो गयी है मामला तूल नहीं पकड़ता .....जाकिर भाई एक सम्मानित साहित्यकार हैं इस तरह कीचड़ उछालना आपको शोभा नहीं देता !

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  12. आप दोनों सृजन कर्म से जुड़े हैं, वेहतर होगा कि एक दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आक्षेप न करें ...वल्कि एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें . शास्त्री जी ने सही कहा है कि यह आलेख लिख कर आपने स्वस्थ परम्परा का निर्वहन किया है!
    नागेश जी को भी एक कदम आगे बढ़कर स्वस्थ साहित्यिक परंपरा का निर्वहन करना चाहिए .

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  13. बस इतना ही कहूँगा कि
    " यहाँ हम ब्लॉग के द्वारा अपने विचारों को पेश करने के लिए है , न कि किसी के विचारों को चुराने के लिए , अगर हम किसी के विचारों को अपने ब्लॉग पर पेश करते है तो हमको वह पर उसका आभार व्यक्त करना जरूरी है या उस श्रोत का नाम लिखना जहा से हमने जानकारी ली है , लेकिये जर्रोर ही दुःख कि बात है कि हम किसी कि मौलिक रचना को किसी और कि रचना बता देते है. या अपनी रचना के रूप में पेश कर देते है. जहा तक विज्ञान कि जानकारी का सवाल है तो खबरे तो कॉमन ही होती है बस उनको प्रस्तुत करने का ढंग अलग होता है है पर जहा तक shahitya और kavita का sawaal है wo तो अपनी खुद कि रचना होती हैउसके साथ ये अन्नियाय नहीं होना चाहिए

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  14. आपकी इल उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है! सूचनार्थ!

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  15. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  16. पाण्‍डे जी, पिछले एक सप्‍ताह से तो आप घर-घर, द्वार-द्वार जाकर 'सच' बोलते फिर रहे हैं। क्‍या अब भी कोई 'सच' बताना रह गया है?

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  17. विद्वानों ने कहा है कि जो व्‍यक्ति दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, ईश्‍वर उसके लिए उससे बड़ा गड्ढा खोद देता है। इस सम्‍पूर्ण प्रकरण से यह बात एक बार पुन: प्रमाणित हो गयी है।

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  18. मनोज पाण्‍डेय जी, आपने सही कहा। मैं इन विद्वान महोदय के इस निर्णय से सचमुच हतप्रभ था कि आखिर इन्‍होंने 'बेबी माने अप्‍पी' को क्‍या सोच कर रिजेक्‍ट किया था। मेरे जितने भी मित्र हैं, मैंने उस समय सभी से इसकी चर्चा की थी। सभी लोग उस समय यह सुनकर आश्‍चर्यचकित रह जाते थे।

    आपने इस प्रकरण की चर्चा करके, मुझे बहुत मानसिक सम्‍बल दिया है, वर्ना ये सज्‍जन तो उसको इतिहास से ही मिटाने पर उतारू नजर आ रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  19. .
    .
    .
    यह एक अप्रिय प्रसंग है और साफ दिखाई दे रहा है कि कटुता और बढ़ रही है... दोनों पक्ष विद्वजन हैं... मैं यही अनुरोध करूँगा कि अपनी अपनी गलतियों के लिये एक दूसरे से क्षमा माँगने के बाद एकदूसरे को दिल से माफ कर इस वाकये को हमेशा-हमेशा के लिये भूल जायें... जिंदगी बहुत छोटी है इसे लड़ने में लगा देना मूर्खता है...


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  20. प्रवीण जी, आपने सही कहा जिंदगी बहुत छोटी है, लेकिन जब कोई आपके सम्‍मान के पीछे हाथ धोकर पड़ जाए, तो? आमतौर पर ऐसे मौकों पर चुप रहने वालों को कुसूरवार मान लेने का रिवाज है हमारे देश में।

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  21. जाकिर अली रजनीश जी, 'बेबी माने अप्‍पी' आपकी कहानी है? किन्‍तु जहां पर यह कहानी प्रकाशित है, वहां पर लेखक का नाम सिर्फ 'जाकिर अली' लिखा है, इसलिए मैंने पूछा। किन्‍तु आपने लिखा है, तो वह आपकी ही होगी, वर्ना अब तक नागेश जी, इसपर भी प्रोपोगन्‍डा कर चुके होते।

    वैसे मैंने बच्‍चों की अधिक कहानियां तो नहीं पढी हैं, लेकिन जितनी भी अब तक पत्र पत्रिकाओं में पढी हैं, सब एक जैसी ही लगती रही हैं। इस कहानी को पढकर पहली बार लगा कि वाह क्‍या कहानी है। ऐसी अदभुत कहानी भी बाल साहित्‍य के इतिहास में है, यह लोगों को मालूम ही नहीं है। नागेश जी को चाहिए था कि इस कहानी को बिना पूछे सबसे पहले बालिकाओं के संग्रह में स्‍थान देते। इससे उनके संग्रह का भी महत्‍व बढ़ता और उनका सम्‍पादन भी सार्थक हो जाता।

    लेकिन सम्‍भवत: इसे पढकर उनके भीतर का ईर्ष्‍या भाव जागृत हो गया हो कि अगर मैंने अपने संग्रह में यह अद्वितीय रचना सहेज ली, तो फिर इसी कहानी की सर्वत्र चर्चा होगी, मेरी कहानी को कोई नहीं पूछेगा। सम्‍भवत: इसीलिए उन्‍होंने जानबूझकर इसे संग्रह में स्‍थान नहीं दिया। जाकिर जी, इसमें उनकी कोई गलती नहीं है, यह तो मानवीय स्‍वभाव है, इसी के चलते उन्‍होंने ऐसा किया।

    वैसे इसका एक कारण और भी प्रतीत होता है। वह यह कि इस कहानी के अंत में सीख या उपदेश जैसा कुछ नहीं है। हो सकता है कि इससे नागेश जी को लगा हो कि अरे यह भी कोई कहानी है, इससे तो बच्‍चों को कोई सीख मिलती ही नहीं। फिर यह बाल कहानी कैसे हो सकती है। बाल कहानी तो वही है, जिससे कोई उपदेश मिले, कोई सीख मिले। संभवत: इसलिए भी वे यह कहानी रिजेक्‍ट कर सकते हैं। ऐसा करिए जाकिर जी, आप इस कहानी को फिर से लिखिए, और इसमें थोडा सा उपदेश डालिए, जिससे यह कहानी नागेश जी को समझ में आ सके, जिससे अगली बार जब वे कोई अन्‍य संग्रह सम्‍पादित करें, तो उसमें इसे स्‍थान देकर आपको उपकृत करें।

    हां, यह दूसरी कहानी का खेल उन्‍होंने क्‍यों खेला, यह भी समझ से परे नहीं है। हो सकता हो, इसी बहाने वह अपना कोई पुराना हिसाब चुकता करना चाहते हों।
    उम्र में बड़े होने का अर्थ यह भी तो नहीं होता न कि व्‍यक्ति बडप्‍पन के बोझ से दोहरा हो जाए। उसकी व्‍यक्तिगत आकांक्षाएं एवं अभिलाषाएं उससे जो-जो न करवा लें, कम है। सम्‍भवत: इसी भावना के वशीभूत होकर नागेश जी ऐसा कर गुजरे। लेकिन यह ऐसा भी कोई बुरा काम नहीं कि आप उनकी इतनी...।
    प्‍लीज, इसे समाप्‍त करें।

    उत्तर देंहटाएं
  22. सर्वप्रथम सभी सुधी मित्रों को धन्यवाद जिन्होंने इस प्रकरण में रूचि लेकर मुझे भला या बुरा कहा.
    मैं एक बार पुन: स्पष्ट कर दूँ कि इस पोस्ट के बहाने पाठकों का ध्यान मूल विषय से हटाने की कोशिश की गयी है. सारी स्थिति जाने बिना सब अपनी अपनी बात कह रहे हैं.
    आप मूल विषय के लिए 2 माह पुरानी इस पोस्ट को देखिए जहाँ जाकिर भाई ने 'बेबी माने अप्पी' का नाम तक नहीं लिया. निश्चित रूप से यह उम्दा कहानी है और इसे १९९८ में 'इक्कीसवी सदी की बाल कहानियां' संकलन में मैंने पढ़ा है. वह जाकिर की श्रेष्ठ कहानियों में से है , इसमें भी मुझे संदेह नहीं, पर क्या एक ही कहानी को बाल साहित्य के इने गिने छपने वाले संकलनों में छापा जाना चाहिए,और जब बाल साहित्य अपनी पहचान के लिए आज भी संघर्ष की ही स्थिति में है,
    जाकिर ने तो ढेरों श्रेष्ठ कहानियां लिखी हैं, और मैंने ही उन्हें आज से नहीं, जब १९९१ में मैं कानपुर से प्रकाशित पत्रिका 'बाल दर्शन' में संपादक था, तब भी सस्नेह प्रकाशित किया है.
    मेरे संकलनों 'किशोरों की श्रेष्ठ कहानिया'(2004) और 'इन्द्रधनुषी बाल कहानियां'(2011) में भी वह ससम्मान प्रकाशित हुए हैं. एक.. बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियां(2007) में वह शामिल नहीं हो सके ... और वह भी इसलिए कि उन्होंने किसी की कापी जैसी कहानी भेज दी तो इतना बखेड़ा क्यों ?
    'बेबी माने अप्पी' उन्होंने मुझे नहीं भेजी, ...और यदि भेजते भी तो मैं उसे इसलिए प्रकाशित नहीं करता कि वह पूर्व प्रकाशित रचना है. मैंने हमेशा उनसे कुछ नए की अपेक्षा की है.
    मेरा उनसे कोई दुराव नहीं है, किसी को लगता है तो ऊपर वाला मेरा साक्षी है, सच एक न एक दिन सामने जरुर आएगा.
    ==============================
    ...और यह पढ़िए वह टिप्पणी जो जाकिर भाई ने 'अभिनव सृजन' पर लिखी थी. पाठक खुद देखें कि जाकिर भाई स्वयं किस कहानी को भेजने की बात लिख रहे हैं ?
    ================================
    ८ सितम्बर २०११ १०:०२ पूर्वाह्न --------------------- डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा… नागेश जी, संयोग से कल शैलेन्‍द्र जी से आपके द्वारा सम्‍पादित बालिकाओं की श्रेष्‍ठ कहानियां पुस्‍तक मिली। पुस्‍तक देखकर आश्‍चर्य हुआ कि उसमें आपने मेरे द्वारा भेजी गयी कहानी 'सच्‍ची सुंदरता' के स्‍थान पर उसकी 'कॉपी' जैसी दूसरे लेखक की कहानी को स्‍थान दिया गया है, जोकि मेरी रचना की तुलना में शिल्‍प एवं प्रभाव की दृष्टि से 'काफी कमजोर' प्रतीत होती है।

    उत्तर देंहटाएं
  23. कितना झूठ बोलोगे नागेश भाई?

    दुनिया जानती है कि कि मैंने बालिकाओं के संग्रह के लिए आपको 'बेबी माने अप्‍पी' भेजी थी। ऊपर के कमेंट में भाई मनोज पाण्‍डेय ने इस बात की तस्‍दीक की है। भाई अरशद खान, साजिद खान और फहीम से इस बारे में मेरी बीसियों बार चर्चा हो चुकी है। मैं उनसे कहूंगा कि कृपया वे इस बारे में अपना कमेंट करें, जिससे स्थिति और साफ हो। वैसे इस बारे में संतोष कुमार गुप्‍ता जी ने भी काफी महत्‍वपूर्ण बातें लिखी हैं।

    आपका यह तर्क एकदम भोथरा है कि 'बेबी माने अप्‍पी' किसी अन्‍य संग्रह में छप चुकी थी, इसलिए उसे संग्रह में नहीं ली गयी। ऐसी दशा में आप मेरी 'मैं स्‍कूल जाऊंगी', 'इससे तो अच्‍छा', 'रूबी का रोबोट' भी ले सकते थे, ये सारी बाल मनोविज्ञान एवं बालिकाओं को लेकर लिखी गयी हैं और मेरे विचार में इस तरह की मनोविज्ञानपरक बाल क‍हानियां हिन्‍दी में न के बराबर लिखी गयी हैं। लेकिन आपको यह सारा बखेडा करना थ, इसलिए आपने जानबूझकर ऐसा किया।

    उत्तर देंहटाएं
  24. कर्मयोग सर्वोत्तम योग.

    उत्तर देंहटाएं
  25. पाण्‍डे जी, यह आपकी धृष्‍टता की पराकाष्‍ठा है कि बार-बार आप अपनी पोस्‍ट का रिफरेंस दे रहे हो कि जाकिर भाई ने ये लिखा था, वो लिखा था, पर आपने अभी तक उस पोस्‍ट पर आए चार कमेंट प्रकाशित नहीं किए हैं। क्‍यों?

    इससे साफ जाहिर हो रहा है कि आपके मन में चोर है और शुरू से ही आपकी नियत साफ नहीं थी।
    सभी पाठकों की सुविधा के लिए मैं उन्‍हें यहां दे रहा हूं।

    उस पोस्‍ट पर सबसे पहले डॉ0 मोहम्‍मद अरशद खान ने कमेंट किया था, जिसके जवाब में आपने मुझे मेल किया था(तभी मुझे इस मैटर की पहली बार जानकारी मिली थी)। अभी तक वह कमेंट अप्रकाशित है। क्‍यों? इस सम्‍बंध में भी मैं अरशद भाई से आग्रह करूंगा कि वे यहां पर कमेंट करके बताएं कि उन्‍होंने उस कमेंट में क्‍या लिखा था, जिसे पाण्‍डे जी प्रकाशित करने से डर रहे हैं।
    (दुर्भाग्‍य से मैं उस कमेंट का बैकप लेने से रह गया था, वर्ना मैं स्‍वयं ही उसे यहां प्रकाशित कर देता।)

    अरशद भाई के कमेंट के बाद मैंने एक कमेंट किया था, उसे भी आपने हटा दिया था। बाद में चुपके से आपने जब अपनी पोस्‍ट से हटाए गए कमेंट पुन: प्रकाशित किए, तो उसे जान बूझकर प्रकाशित नहीं किया था। उस कमेंट में मैंने अरशद के कमेंट को डिलीट करने पर आपत्ति जताई थी। मैंने उस कमेंट का बैकप ले लिया था, वह इस प्रकार है--


    डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

    नागेश जी, डॉ0 मोहम्‍मद अरशद खान को सम्‍बोधित दो मेलों को बिना किसी सम्‍बोधन के भेजने के बाद जब मैंने अरशद भाई से बात की, तो मुझे मैटर समझ में आया। आपसे निवेदन है कि कृपया किसी को मेल भेजते समय उचित सम्‍बोधन और उददेश्‍य का उल्‍लेख किया करें, जिससे उन्‍हें उचित महत्‍व दिया जा सके।
    अरशद भाई ने यह भी बताया कि उन्‍होंने आपकी पोस्‍ट पर मेरा नाम छूटने सम्‍बंधी कमेंट किया था, लेकिन यहां पर वह दिखाई नहीं दे रहा है। शायद उसे आपने डिलीट कर दिया है? मेरी समझ से यह उचित नहीं प्रतीत होता, क्‍योंकि यदि कोई व्‍यक्ति आपके ब्‍लॉग को गम्‍भीरता से पढ रहा है और आपकी त्रुटियों की ओर ध्‍यान दिला रहा है, तो उसकी सजगता का सम्‍मान किया जाना चाहिए।
    ८ सितम्बर २०११ ९:५२ पूर्वाह्न

    उत्तर देंहटाएं
  26. इसके अलावा मेरे दो अन्‍य कमेंट आपने प्रकाशित नहीं किये। उनमें से एक कमेंट इस प्रकार है-


    डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

    इस पर आया मेरा सबसे पहला कमेंट, जिसमें अरशद के कमेंट डिलीट करने पर आपत्ति जताई गयी थी, आपने डिलीट कर दिया है, जिससे प्रतीत हो रहा है कि आप जानबूझकर अपने विरूद्ध होने वाली बातों को छिपाना चाहते हैं। यह स्‍वस्‍थ मानसिकता की निशानी हैं।

    वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मेरे पास उस कमेंट का स्‍क्रीन शॉट सुरक्षित है।
    १६ सितम्बर २०११ ४:१४ अपराह्न

    इसके अतिरिक्‍त मेरा एक अन्‍य कमेंट भी था, जिसका स्‍क्रीन शॉट मैंने लिया था, किन्‍तु वह असावधानीवश मुझसे डिलीट हो गया है।


    इन तमाम कमेंटस से स्‍पष्‍ट होता है कि आपके मन में शुरू से दुर्भावना थी, इसलिए जानबूझकर आपने यह सब किया।

    उत्तर देंहटाएं
  27. पाण्‍डे जी, एक महत्‍वपूर्ण बात जिससे आप अब तक बच रहे हैं, वह यह कि आपने जब विवाद के नाम पर सारे कमेंट पोस्‍ट से हटा दिये थे, तो फिर उन्‍हें किसलिए दुबारा पोस्‍ट पर प्रकाशित किया, उनमें से भी आपने उन कमेंटस को नहीं छापा, जिनसे आपकी किरकिरी हो रही थी। आपके उस मेल को मैंने सुरक्षित रखा हुआ है। वह मेल इस प्रकार था-



    डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
    16 September 2011 22:13
    To: "डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish')"
    Reply | Reply to all | Forward | Print | Delete | Show original
    प्रिय जाकिर भाई,
    सस्नेह नमस्कार.
    ऐसी सारी टिप्पणियाँ , जिनका सम्बन्ध 'अभिनव सृजन 'से नहीं है,
    उन्हें हटा दिया जाता है.
    अनुरोध है कि कृपया प्रकाशित पोस्ट से सम्बंधित आलोचना / प्रतिक्रिया ही
    भेजें : उनका सदैव स्वागत है.

    'अभिनव सृजन ' का मूल उद्देश्य बच्चों को उनके साहित्य से जोड़ना है, न
    कि बाल साहित्यकारों के विवादों से . इस ब्लाग पर केवल विवाद रहित
    टिप्पणियों का ही स्वागत है.

    व्यक्तिगत टिप्पणियों के लिए मेरे डाक पते अथवा ई-मेल का उपयोग करें.

    On 16/09/2011, डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish')
    wrote:
    > डॉ0 ज़ाकिर अली 'रजनीश' (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने आपकी पोस्ट " संकलन :
    > इन्द्रधनुषी बाल कहानियां " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
    >
    > इस पर आया मेरा सबसे पहला कमेंट, जिसमें अरशद के कमेंट डिलीट करने पर आपत्ति
    > जताई गयी थी, आपने डिलीट कर दिया है, जिससे प्रतीत हो रहा है कि आप जानबूझकर
    > अपने विरूद्ध होने वाली बातों को छिपाना चाहते हैं। यह स्वस्थ मानसिकता की
    > निशानी हैं।
    >
    > वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मेरे पास उस कमेंट का स्क्रीन शॉट
    > सुरक्षित है।
    >
    > डॉ0 ज़ाकिर अली 'रजनीश' (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') द्वारा अभिनव सृजन के लिए १६
    >
    > सितम्बर २०११ ४:१४ अपराह्न को पोस्ट किया गया
    >
    --
    हार्दिक सम्मान सहित ,
    भवदीय ,
    डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
    निकट रेलवे कालोनी , सुभाष नगर , शाहजहाँपुर- 242001. (उत्तर प्रदेश, भारत)


    कृपया उप पवित्र उद्देश्‍य का खुलासा करें कि आखिर आपकी वह कौन सी मजबूरी थी, जिसकी वजह से आपको यह निकृष्‍ट कर्म करना पड़ा?
    इससे आपके ब्‍लॉग से कितने बच्‍चे जुड़े अथवा इससे किस गुप्‍त उद्देश्‍य की प्राप्ति हुई?
    क्‍या आपने ऐसा किसी के उकसाने पर किया? यदि हां, तो उस सज्‍जन का क्‍या नाम है?

    उत्तर देंहटाएं
  28. पाण्‍डे जी, आपने इससे पूर्व किसी कमेंट में मेल सुरक्षित होने और उनके द्वारा सत्‍य उजागर करने की बात की है। तो लीजिए, आपकी सेवा में आपका ही एक अन्‍य मेल हाजिर है। कृपया इसका भी जवाब दीजिए-


    डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
    16 September 2011 22:52
    To: ज़ाकिर अली ‘रजनीश’
    Reply | Reply to all | Forward | Print | Delete | Show original
    प्रिय जाकिर भाई,
    सस्नेह नमस्कार.
    मैं 'ऊपर वाले' , जिसे सब अपनी-अपनी भाषा में अलग अलग नामों से पुकारते हैं - को साक्षी मानकर, आपको बताना चाहता हूँ कि आपके प्रति मेरे मन में कोई दुर्भावना नहीं है. आप इस भ्रम को अपने मन से निकाल दें.
    जब असहमति होती है तो बहुत कुछ अनर्गल प्रलाप भी होता है. उसे
    पूर्वाग्रह से नहीं जोड़ना चाहिए.

    कहानी के प्रथम प्रकाशन की छायाप्रति उपलब्‍ध कराने के लिए आज ही रवि को मेल कर दिया है. जहाँ तक , मुझे याद है, मैंने यह कहानी , -जब मैं बी. काम का छात्र था, तब पढ़ी थी. संतोषजनक उत्तर प्राप्त करने के लिए तो आपको मूल लेखक से ही बात करने का साहस करना चाहिए.
    समान विषयों पर लिखने से प्राय : ऐसी विसंगतियां आती हैं . उसके लिए किसी पर कापी कर देने का आरोप लगाना , क्म से क्म मैं तो ठीक नहीं मानता. ..और तब , जबकि केवल विषयगत साम्य ही हो .
    बाल साहित्य में ऐसा बहुधा है और यही बाल साहित्य के पिछड़ेपन का कारण भी है . कई 'धुरंधरों ' ने तो पुराने चरित्रों और लोकप्रिय दन्त
    कथाओं को सीधे -सीधे अपने नाम से ही प्रकाशित करा दिया है. किसी रचना के मूल लेखक पर शोध करने के बजाय उसकी रचना पर अपना नाम डाल देना - कितनी बड़ी बेमानी है ?

    कदाचित मेरे कारण ,
    आप बहुत अधिक आहत हैं. मुझे इसका हार्दिक खेद है.
    भविष्य में भी आपकी व्यक्तिगत टिप्पणियों का स्वागत है.
    भवदीय ,
    डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
    असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष ,
    शिक्षा संकाय,
    राजेंद्र प्रसाद पी. जी. कालेज , बरेली
    Reply | Reply to all | Forward | Print | Delete | Show original


    आपने अपनी इस मेल में ऊपर लिखा है मैं 'ऊपर वाले' , जिसे सब अपनी-अपनी भाषा में अलग अलग नामों से
    पुकारते हैं - को साक्षी मानकर, आपको बताना चाहता हूँ कि आपके प्रति मेरे
    मन में कोई दुर्भावना नहीं है.


    अगर आपके मन में दुर्भावना नहीं थी, तो फिर एक बार विवाद शान्‍त होने के बाद इसे कमेंट दुबारा प्रकाशित कर क्‍यों भड़काया। क्‍या इससे यह जाहिर नहीं होता कि आपने मेंल में कुछ और लिखा था, लेकिन आपके मन में कुछ और चल रहा था?


    आपने इस मेल में ऊपर लिखा है समान विषयों पर लिखने से प्राय: ऐसी विसंगतियां आती हैं. उसके
    लिए किसी पर कापी कर देने का आरोप लगाना, क्म से क्म मैं तो ठीक नहीं


    पाण्‍डे जी, क्‍या दर्शनशास्‍त्र सिर्फ दूसरों को उपदेश देने के लिए होता है? या फिर दोगलापन आपका मूल चरित्र है, जिसकी वजह से नेताओं की तरह आप कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं।

    मेल पर लफ्फाजी, और पोस्‍ट पर षणयंत्र? क्‍या चरित्र पाया है आपने। इसपर कुछ कहने के लिए बचा है आपके पास?


    इसी मेल में आपने लिखा है- कदाचित मेरे कारण ,
    आप बहुत अधिक आहत हैं. मुझे इसका हार्दिक खेद है.


    वाह, क्‍या गजब का खेद व्‍यक्‍त हुआ है। इधर खेद, उधर खेल।
    पाण्‍डे जी, इसे ही कहते हैं पीठ में छूरा भोंकना।


    पाण्‍डे जी, यह सब करते हुए मुझे अच्‍छा नहीं लग रहा! क्‍योंकि नकारात्‍मकता मेरी प्रवृत्ति नहीं है। पर मुझे बार-बार मजबूर कर रहे हैं आप।

    उत्तर देंहटाएं
  29. धरती में कई प्रकार के पाण्डेय जी पाये जाते हैं। ऐसी पोस्ट लिखते समय नाम देना था न कि....पाण्डेय जी। एक पल के लिए भी किसी को आहत कर अपने पोस्ट में बुलाना मैं ठीक नहीं समझता।

    यह विवाद चैट से भी सुलझाये जा सकते थे। सार्वजनिक वाद कभी-कभी इतना दुखदायी होते हैं कि पछतावे की नौबत आने पर शर्मसार होना पड़ता है।

    उत्तर देंहटाएं
  30. जाकिर भाई, आप पहले भी सही थे और आज भी. रचना ज़रूरी है, दुर्रचना नहीं. वहीँ आपकी ख़ामोशी की ख़ासियत को मैंने अपने जीवन में उतारा. अच्छा रिज़ल्ट आ रहा है.


    सलीम ख़ान
    हमारी अन्जुमन
    विश्व का प्रथम इस्लाम धर्म का साझा ब्लॉग, हिन्दी में

    उत्तर देंहटाएं
  31. पोस्ट पढ़ कर बस यही निष्कर्ष निकला कि ऐसा भी होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  32. इस पोस्ट और इस पर आई टिप्पणियों से यह निष्कर्ष निकलता है की एक ब्लागर को दूसरे ब्लागर पर विश्वास करके ब्लाग जगत हेतु सहयोग नहीं करना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  33. जहाँ दशकों पुराने प्रसंग उठ रहे हों वहाँ बिना गहराई में जाए अपनी प्रतिक्रिया देना बेमानी है

    उत्तर देंहटाएं
  34. दिल तो दुख ही जाता है...
    पर अपना मन छोटा नहीं करना चाहिए...

    :)

    उत्तर देंहटाएं
  35. डॉ0 मोहम्‍मद अरशद खान11/14/2011 5:41 pm

    इधर बाल साहित्य के दो युवा और सचेत बाल साहित्यकारों में जो घमासान हुआ, जो बहसबाज़ियां और गोलंदाज़ियां देखने में आईं, वह सिर्फ दुखी करनेवाला ही नहीं, बल्कि हैरत में डालनेवाला भी है।

    इस घटना से मैं व्यक्तिगत रूप से ज़्यादा आहत हूं; इसलिए कि दोनों बाल साहित्यकार मेरे अभिन्न और बेहद क़रीबी दोस्त हैं, और इसलिए भी इस संपूर्ण घटनाक्रम के प्रस्थान बिंदु से परिचित और किसी रूप में संबंधित भी हूं। इसलिए यह मेरा नैतिक दायित्व बनता है कि मैं इस पूरे घटनाक्रम की सच्चाई से लोगों को रू-ब-रू कराऊं। दरअसल पूरा घटनाक्रम इस प्रकार है--

    रमज़ान का महीना था, अर्थात् अगस्त का। इलाहाबाद से लौटते समय एक दिन नागेश भाई ने ट्रेन से ही फोन किया कि एक खुशख़बरी है, शाम को चाय पर मुलाक़ात होगी तो पूरी बात होगी। मेरा पूरा दिन बेचैनी से कटा। शाम को रोज़ा-इफ्तार करके पहुंचा तो वहां देशबंधु शाहजहांपुरी भी बैठे हुए थे। नागेश भाई ने अपनी ‘इंद्रधनुषी बाल कहानियां’ पुस्तक दिखाई और हम दोनों को एक-एक प्रति भी दी। पुस्तक सचमुच बहुत अच्छी थी-गेटअप से लेकर सामग्री और उसके प्रस्तुतिकरण तक।

    उसी शाम को या फिर अगले दिन ज़ाकिर भाई का फोन आया तो मैंने उनसे भी इस कृति की चर्चा की। तब तक उन्हें इस संग्रह की जानकारी नहीं थी। उन्हें खुशी भी हुई और हैरत भी कि इसमें नागेश जी ने मेरी कहानी कैसे लगा दी, जबकि ‘बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियां’ में उन्होंने मेरी ‘बेबी माने अप्पी’ रिजेक्ट कर दी थी।


    बात आई-गई हो गई। एक दिन जब मैं नागेश भाई का ब्लाग देख रहा था, तो उसमें ‘इंद्रधनुषी बाल कहानियां’ के विज्ञापन संबंधी पोस्ट देखी। ज़ाहिर है कि रचनाकारों में अपना नाम देख पाने की कोशिश में पूरी सूची देख गया। खैर उसमें मेरा नाम तो था, पर ज़ाकिर भाई का नहीं था। मुझे लगा कि दोनों के बीच में औरा गलतफहमियां न बढ़ें इसलिए मैंने नागेश भाई को इस बात की सूचना दी। उन्होंने जाने इसका क्या मतलब निकाला कि जवाब में उन्होंने मुझे दो मेल किए और उनकी कॉपी ज़ाकिर भाई को भी फारवर्ड कर दी। मेरे नाम से संबोधित मेल जब ज़ाकिर भाई को मिले तो उन्होंने चकित होकर मुझे फोन किया। मैंने उन्हें सारी बात बताई। उसके बाद घटना ने कई मोड़ लिए जिनसे आप सभी परिचित हैं।

    दरअसल जिन दो कहानियों को लेकर चोरी और कॉपी करने के आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं और सार्वजनिक मंच पर जिस तरह कटुतापूर्ण छींटाकशी हो रही है, वह निहायत शर्मनाक है। सच बात कहूं तो मुझे लगता है कि इस विषय और थीम पर रावेंद्र जी से पहले भी कम से कम दस-बीस कहानियां तो लिखी ही गई होंगी; और शायद बहुत सारी कविताएं भी।

    ज़ाकिर भाई के ब्लाग पर संतोष गुप्ता जी का कमेंट मुझे बहुत सटीक लगा कि, ‘मुझे तो सारी बाल कहानियां एक जैसी लगती हैं।’ बात बिल्कुल सही है। क्या आपको नहीं लगता कि बाल साहित्य का जो रूप हमारे सामने प्रस्तुत होकर आ रहा है उसमें विषयों की पुनरावृत्ति दिखती है ? ‘‘रूप नहीं गुण सुंदर होता है’’--यह थीम न तो रावेंद्र जी की मौलिक है और न ही ज़ाकिर भाई की। यह तो सर्वविदित और सर्वस्वीकृत है। इस थीम पर गद्य-पद्य में न जाने कितना कुछ लिखा जा चुका है। जिन लोगों ने दोनों कहानियां पढी हैं, वे जानते होंगे कि उनमें थीम को छोड़ दिया जाए तो समानता या नक़ल ढूंढना मूर्खता होगी। दोनों के प्रस्तुतिकरण में बहुत फर्क है। और फिर यहां पर फर्क तो थीम के प्रस्तुतिकरण में ही देखा जाना चाहिए। मेरे ख्याल से, नक़ल की बात उठी होगी, तो शायद इसलिए कि दोनों में रूप और गुण के सौंदर्य का फर्क प्रश्नोत्तर के माध्यम से दिखाया गया है। लेकिन कहानियां पढ़नेवाले लोग जानते होंगे कि इस समानता के बावजूद दोनों कहानियों के ट्रीटमेंट में कितना फर्क है। क्या सिर्फ इस सतही समानता के आधार पर उन्हें एक-दूसरे की कॉपी ठहराया जा सकता है ? वास्तव में रावेंद्र जी ने रचना के उद्देश्य को संप्रेषित करने के लिए जिस शैली, टेक्नीक और संदर्भ का उपयोग किया है, जाकिर भाई की कहानी में वह बिल्कुल भिन्न है। दोनो के प्रभाव भी अलग-अलग हैं।

    अगर हम इन चीज़ों को लेकर चोरी और नक़ल के आरोप लगाते फिरेंगे तो बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी। संपूर्ण साहित्य का एक बड़ा हिस्सा इस दायरे में सिमट आएगा। आज हम जिसे ‘भाव-साम्य’ कहकर मान देते हैं, वह सीधे-सीधे चोरी कहा जाने लगेगा। कबीर के साहित्य में सरहपा और गोरखनाथ की बानियां भाषा के अंतर के साथ जस की तस मिल जाती हैं। उन्हें हम क्या कहेंगे ? इस तरह तो विद्यापति जयदेव के अपराधी ठहरेंगे और सूर विद्यापति के। तुलसी की ‘नानापुराणनिगमागमसम्मत’ की विनयोक्ति चोरी बेशर्म स्वीकारोक्ति ही ठहरेगी। पंत और निराला के विवाद से कौन अपरिचित है ? पर उन दोनों मौलिकता और महत्व से भी किसे इंकार है?

    (यह कमेंट मेल द्वारा प्राप्‍त हुआ है।)

    उत्तर देंहटाएं
  36. डॉ0 मोहम्‍मद अरशद खान का उपरोक्‍त कमेंट मेल से प्राप्‍त हुआ है, जिसे मैंने स्‍वयं पब्लिश किया है। सम्‍भवत: कमेंट सिर्फ रजिस्‍टर्ड यूजर्स के लिए खुला था, इसलिए वे कमेंट नहीं कर पाए थे।


    डॉ0 मोहम्‍मद अरशद खान के उपरोक्‍त कमेंट से यह पुन: स्‍पष्‍ट हो गया है कि नागेश जी ने 'बेबी माने अप्‍पी' को रिजेक्‍ट (इससे पूर्व श्री मनोज पाण्‍डेय जी इस बात की तस्‍दीक कर चुके हैं) किया था। जबकि वे यहां पर साफ झूठ बोल रहे हैं कि मैंने यह कहानी उन्‍हें भेजी ही नहीं थी।


    उपरोक्‍त कमेंट से यह भी स्‍पष्‍ट है कि उनकी जिस पोस्‍ट से विवाद शुरू हुआ, उसपर सबसे पहला कमेंट डॉ0 अरशद खान ने किया था और वह कमेंट उन्‍होंने जान बूझकर डिलीट कर दिया था।


    पाण्‍डे जी दो मुख्‍य बातें डॉ0 अरशद खान के कमेंट से गलत प्रमाणित हो गयी हैं। इससे स्‍पष्‍ट होता है कि पाण्‍डे जी ने जानबूझकर यह प्रोपेगण्‍डा किया, ताकि वे अपनी घृणित भावनाओं को विस्‍तार दे सकें। पर कहावत है कि बुरे काम का बुरा नतीजा हुआ और उनका असली चरित्र सामने आ गया।

    उत्तर देंहटाएं
  37. अन्य व्यस्तताओं के रहते
    मैं अभी तक ये सब टिप्पणियाँ और पोस्ट
    ध्यान से नहीं पढ़ पाया हूँ!
    --
    चाह कर भी बालदिवस पर
    "सरस पायस" तक पर कोई पोस्ट नहीं लगा पाया!
    --
    कुछ तो मुझे भी कहना ही पड़ेगा!

    उत्तर देंहटाएं
  38. बाल साहित्‍य के प्रयोगवादी रचनाकार डॉ0 अरशद खान जी ने मेरी टिप्‍पणी को कोट किया, यह देख कर अभिभूत हूं।

    अरशद जी की टिप्‍पणी से नागेश जी का यह झूठ प्रकट हो गया है कि बालिकाओं के संग्रह हेतु 'बेबी माने अप्‍पी'नहीं भेजी गयी थी। इससे यह भी स्‍पष्‍ट होता है कि उनके मन में चोर प्रारम्‍भ से था, जिसकी वजह से यह विवाद पनपा।

    आप द्वारा नागेशजी के मेल सार्वजनिक किये जाने के बाद उनके द्वारा किसी टिप्‍पणी का न आना भी यह स्‍पष्‍ट करता है कि उनकी चोरी जाहिर होने के बाद उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं बचा है।

    उत्तर देंहटाएं
  39. मुझे नहीं लगता कि
    यहाँ मेरे कहने लायक कुछ शेष है!
    --
    हाँ, एक काम जो किसी ने नहीं किया,
    वो मैंने कर दिया है!
    --
    ये दोनों कहानियाँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं!

    उत्तर देंहटाएं
  40. बेनामी5/22/2018 10:30 pm

    पूरा प्रकरण ध्यान से पढा । चरित्र की पहचान पहले से ही थी अब और मज़बूत हुई है । मज़ा भी खूब आया ।

    उत्तर देंहटाएं
  41. बालसाहित्य के तथाकथित जाने-माने आलोचक और इनसाइक्लोपीडिया डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' पर बालसाहित्यकार ज़ाकिर अली द्वारा कराई जा रही चर्चा में प्रतिभाग करने के लिए निम्नांकित कड़ी का अनुसरण किया जा सकता है!

    डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' किस कोटि के आलोचक हैं?

    https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=597838563912972&id=100010605017004

    कुछ लोगों की प्रवृत्ति कभी नहीं बदलती। ऐसे लोग अगर आपका पक्ष लेंगे, तो भी आपको आहत ही करेंगे और आपको दूसरों की नज़रों में गिराने का प्रयास करेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  42. बंधु कुशावर्तीजी का कहना है -

    हिंदी बालसाहित्य की समीक्षा-आलोचना का क्षितिज सूना ही है!

    https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=374812109680145&id=100014540777860

    उत्तर देंहटाएं
आपके अल्‍फ़ाज़ देंगे हर क़दम पर हौसला।
ज़र्रानवाज़ी के लिए शुक्रिया! जी शुक्रिया।।

नाम

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हिंदी वर्ल्ड - Hindi World: इतनी घृणा कहाँ से लाए पाण्‍डे जी?
इतनी घृणा कहाँ से लाए पाण्‍डे जी?
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