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चाणक्य नीति के 55 अनमोल विचार

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चाणक्य के अनमोल विचारों का चुनिंदा संग्रह।

अपने अपमान के कारण पाटलिपुत्र के नंद वंश का नाश करने वाले और मौर्य साम्राज्य की स्थापना करने वाले चाणक्य एक महान रणनीतिकार ही नहीं, जीवन के मर्मज्ञ भी थे। उन्होंने अपने ग्रन्थ 'चाणक्यनीति' में धर्म, संस्कृति, न्याय, शांति, शिक्षा, जीवन-सिद्धान्त, जीवन-व्यवहार, आदर्श समाज और यथार्थ का बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। यह ग्रंथ संस्कृत में है और इसमें सूत्रात्मक शैली में जीवन को सुखमय एवं सफल बनाने के सुझाव दिये गये हैं। 'चाणक्यनीति' की बहुत सी बातें हालांकि राजकाल से सम्बंध‍ित हैं, किंतु उनमें नीति के बहुत से ऐसे सूत्र भी हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। ऐसे ही 55 नीति वाक्य यहां पर प्रस्तुत हैं:

चाणक्य - Chanakya
शिक्षा सम्बंधी चाणक्य के विचार
  • शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है।
  • शास्त्र का ज्ञान आलसी को नहीं हो सकता।
  • एक शिक्षित व्यक्ति हर जगह सम्मान पता है।
  • शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है। 
  • अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के लिए दर्पण एक समान उपयोगी है।
  • दूसरों की गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी।
  • मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का सदुपयोग शास्त्रों आदि के अध्ययन में करना चाहिए।
  • वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को ‍अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है।

जीवन मूल्य सम्बंधी चाणक्य के विचार
  • रोग शत्रु से भी बड़ा है।
  • आवश्यकतानुसार कम भोजन करना ही स्वास्थ्य प्रदान करता है।
  • विश्वास की रक्षा प्राण से भी अधिक करनी चाहिए।
  • लोक चरित्र को समझना सर्वज्ञता कहलाती है।
  • व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं। 
  • आत्मसम्मान के हनन से विकास का विनाश हो जाता है।
  • मुर्ख व्यक्ति को अपने दोष दिखाई नहीं देते, उसे दूसरे के दोष ही दिखाई देते हैं। मूर्खों से विवाद नहीं करना चाहिए, उनसे मूर्खों जैसी ही भाषा बोलनी चाहिए।
  • राजा (स्वामी), गुरु और देवता के पास कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।
  • बल प्रयोग के स्थान पर क्षमा करना अधिक प्रशंसनीय होता है।
  • मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
  • दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है। 
  • सभा के मध्य जो दूसरों के व्यक्तिगत दोष दिखाता है, वह स्वयं अपने दोष दिखाता है।
  • सुगंध का प्रसार हवा के रुख का मोहताज़ होता है पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है। 
  • किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं। 
  • जन्‍म के पांच साल तक पुत्र को प्‍यार करना चाहिये, फिर दस साल तक दंडित करना चाहिये और एक बार जब वह सोलह वर्ष का हो जाए, तब उसे अपना दोस्‍त बना लेना चाहिये। 
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मित्रता सम्बंधी चाणक्य के विचार
  • कपटी मित्र पर कभी विश्वास ना करें।
  • अच्छे मित्र पर भी अंधविश्वास ठीक नहीं। क्यूंकि यदि ऐसे लोग आपसे रुष्ट होते हैं, तो आपके सभी रहस्य खोल देंगे। 
  • हर मित्रता के पीछे कोई ना कोई स्वार्थ होता है। ऐसी कोई मित्रता नहीं जिसमें स्वार्थ ना हो।
  • बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। 
  • जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है।

सफलता और असफलता सम्बंधी चाणक्य के विचार
  • जो व्यक्ति जिस कार्य में कुशल हो, उसे उसी कार्य में लगाना चाहिए।  
  • ईमानदारी से काम करने वाले लोग सदैव खुश रहते हैं। 
  • कार्य के लक्षण ही सफलता-असफलता के संकेत दे देते है।
  • अपने स्वामी के स्वभाव के अनुरूप कार्य करने वाले सेवक सदैव सफल रहते हैं।
  • अपने रहस्यों को किसी पर भी उजागर मत करो। यह आदत आपको बर्बाद कर सकती है। 
  • एक बार जब आप कोई काम शुरु करते हैं, तो असफलता से डरे नहीं और ना ही उसे त्‍यागें। 
  • जब कार्यों की अधिकता हो, तब उस कार्य को पहले करें, जिससे अधिक फल प्राप्त होता है।
  • कोई काम शुरू करने से पहले, स्वयं से तीन प्रश्न करें- मैं ये क्यों कर रहा हूं? इसके परिणाम क्या हो सकते हैं? और क्या मैं सफल हो पाऊगां? और जब गहरई से सोचने पर इन प्रश्नों के संतोषजनक उत्तर मिल जायें, तभी आगे बढें। 
  • हमें भूत के बारे में पछतावा नहीं करना चाहिए, ना ही भविष्य के बारे में चिंतित होना चाहिए। विवेकवान व्यक्ति सदैव वर्तमान में जीते हैं।

धन और धर्म सम्बंधी चाणक्य के विचार
  • धनवान व्यक्ति का सारा संसार सम्मान करता है।
  • धन होने पर अल्प प्रयत्न करने से कार्य पूर्ण हो जाते है।
  • दूसरे के धन का लोभ नाश का कारण होता है।
  • धर्म का आधार ही सत्य और दान है।
  • धर्म को व्यावहारिक होना चाहिए। धर्म से भी बड़ा व्यवहार है।
  • ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ।

स्त्रियों सम्बंधी चाणक्य के विचार
  • स्त्रियों का मन क्षणिक रूप से स्थिर होता है। स्त्री का निरिक्षण करने में आलस्य न करें।
  • स्त्री बिना लोहे की बड़ी है। स्त्री के बंधन से मोक्ष पाना अति दुर्लभ है।
  • स्त्री रत्न से बढ़कर कोई दूसरा रत्न नहीं है।
  • पति के वश में रहने वाली पत्नी ही व्यवहार के अनुकूल होती है।
  • स्त्री भी नपुंसक व्यक्ति का अपमान कर देती है।

भोग (आसक्ति) सम्बंधी चाणक्य के विचार
  • अति आसक्ति दोष उत्पन्न करती है।
  • स्त्री के प्रति आसक्त रहने वाले पुरुष को न स्वर्ग मिलता है, न धर्म-कर्म।
  • अधिक मैथुन (सेक्स) से पुरुष बूढ़ा हो जाता है और उचित समय पर सम्भोग सुख न मिलने से स्त्री बूढी हो जाती है।
  • राजदासी से कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए।
  • अपनी दासी को ग्रहण करना स्वयं को दास बना लेना है।
  • नीच और उत्तम कुल के बीच में विवाह संबंध नहीं होने चाहिए।
  • पराए खेत में बीज न डालें। अर्थात पराई स्त्री से सम्भोग (सेक्स) न करें।
  • मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है, क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। 


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चाणक्य नीति के 55 अनमोल विचार
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