थैंक्यू रवीश जी।

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मैं रवीश कुमार की ही बात कर रहा हूं, एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार। वैसे उन्हें कौन नह...


मैं रवीश कुमार की ही बात कर रहा हूं, एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार। वैसे उन्हें कौन नहीं जानता। उन्होंने अपने कार्यक्रमों 'रवीश की रिपोर्ट', 'हम लोग' और 'प्राइम टाइम' के द्वारा लोगों के दिलों में जगह बनाई है। वे जिस गम्भीरता से विषयों को उठाते हैं, उनकी भूमिका बनाते हैं और अपनी बेबाक शैली में उसे प्रस्तुत करते हैं, उसकी वजह से दर्शक उनके मुरीद से हो जाते हैं। वे अपने संचालन में न तो अनर्गल प्रलाप करते हैं और न ही दूसरों को इसकी इजाजात देते हैं। वे अपनी निष्पक्षता के कारण सर्वत्र सराहे जाते हैं। पिछले दिनों केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा का हिन्दी सेवा के लिए दिया जाने वाला प्रतिषि्ठत 'गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार' भी उन्हें प्रदान किया गया है।

रवीश कुमार की एक अन्य पहचान यह है कि वे ब्लॉगर भी हैं और फरवरी 2007 से ब्लॉगर के रूप में सक्रिय हैं। हालांकि वे लिखने को 'टीवी जर्नलिज्म की तुलना में कम गम्भीर मानते हैं, पर बावजूद इसके उनका ब्लॉग 'कस्बा' हिन्दी के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले ब्लॉगों में शामिल है।

इसके अतिरिक्त रवीश कुमार की एक अन्य पहचान कॉलम राइटर के रूप में भी रही है। हिदी के ब्लॉगों की समीक्षा पर केंद्रित उनका कॉलम 'ब्लॉग वार्ता' काफी चर्चा में रहा है। दैनिक 'हिन्दुस्तान' समाचार पत्र में प्रत्येक बुधवार को प्रकाशित होने वाला यह कॉलम बेहद चर्चित रहा है और हिन्दी ब्लॉगिंग को प्रतिष्िठत कराने में उसका बहुत बड़ा योगदान रहा है। और इसमें कोई दोराय नहीं कि उनके कॉलम की लोकप्रियता से ही मुझे 'जनसंदेश टाइम्स' में 'ब्लॉगवाणी' कॉलम की प्रेरणा मिली।

मैंने रवीश जी को पहले पहल उनके कॉलम 'ब्लॉग वार्ता' के माध्यम से ही जाना। उसके बाद एनडीटीवी पर 'प्राइम टाइम' में जब उनको देखा, तो फिर वह मेरा प्रिय कार्यक्रम बन गया। हालांकि टीवी पर ज्यादा समय न दे पाने के कारण 'हम लोग' और 'रवीश की रिपोर्ट' को मुझे कम ही देखने का भी सौभाग्य मिला, पर जब भी अवसर हाथ आया, मैं उससे नहीं चूका।

रवीश कुमार से मेरा पहला इंटरैक्शन फोन के माध्यम से हुआ। यह उस समय की बात है, जब निर्मल बाबा का भंडाफोड़ हुआ था और वह चर्चा का बना हुआ था। उसी दौरान एक दिन मेरे पास फोन आया। वे उधर से बोले- 'रवीश बोल रहा हूं।' उस समय मैं किसी कार्य में उलझा हुआ था, इसलिए मैं समझ नहीं पाया। इसलिए मेरे 'जी कौन?' कहने पर उन्होंने जब पुन: 'मैं रवीश कुमार, एनडीटीवी से' कहा, तो मैं एकदम से रोमांचित हो उठा।

मैंने इस बात की कल्पना सपने में भी नहीं की थी। उन्होंने फोन पर बताया कि 'तस्लीम' (वर्तमान में 'साइंटिफिक वर्ल्ड') में अंधविश्वास को लेकर किये जा रहे कार्य को मैं देखता रहता हूं। फिर बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि मैं निर्मल बाबा को लेकर एक रिपोर्ट पर कार्य कर रहा हूं। उसे किस एंगल से प्रस्तुत किया जाना बेहतर होगा, इसपर आपकी राय जानना चाहता हूं।

'तस्लीम'  ब्लॉग के बहाने रवीश जी की आई वल कॉल अब भी मेरे ज़हन में कैद है। वह उनसे मेरी पहली और अभी तक की आखिरी बातचीत थी। हालांकि कई बार उनकी रिपोर्ट देखकर और ब्लॉग पढकर उन्हें फोन करने की इच्छा हुई, पर यह सोच मैं ढ़ीला पड़ गया कि पता नहीं किस ज़रूरी काम में बिजी हों, मैं बिना वजह उनके काम में ख़लल डालूं।

'तस्लीम' रवीश जी का पसंदीदा ब्लॉग रहा है और उन्होंने इसे अपने ब्लॉग की 'लिंक रोड' में इसे जगह भी दी है (हालांकि वहां पर भी 'तस्लीम' का पुराना वेब पता और नाम ही दर्ज है, वह अपडेट नहीं हुआ है), जो मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं है।

गत वर्ष बॉब्स पुरस्कारों के नामांकन के दौरान जब हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों के नामांकन में 'तस्लीम' और 'सर्प संसार' ब्लॉगों को दो श्रेणियों में जगह मिली, तो बॉब्स पुरस्कारों की जूरी में शामिल होने के कारण कुछ लोगों ने उन्हें अनावश्यक रूप से आलोचना का विषय बनाया। पर सुकून की बात यह रही कि दोनों ब्लॉगों को क्रमश: 'सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग-हिन्दी' एवं 'सबसे रचनात्मक ब्लॉग' श्रेणियों का यूजर श्रेणी का पुरस्कार मिला, जिससे उनकी पसंद को निर्णय पर थोपने के सम्बंधित आरोप स्वत: ही खारिज हो गये।
शंभूनाथ शुक्ल जी, ब्लॉगर मीट का सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान करते हुए
इस वक्त रवीश जी को याद करने का विशेष कारण यह है कि पिछले दिनों 'ए बिलियन आइडिया' के तत्वाधान में 8 मार्च को लखनऊ के जेमिनी कांटिनेन्टल में 'एनुअल ब्लॉगर मीट' का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के संयोजक थे चर्चित पत्रकार और अमर उजाला एवं जनसत्ता सहित कई समाचार पत्रों के सम्पादक रहे शंभूनाथ शुक्ल। शंभूनाथ शुक्ल जी घुमक्कड़ी के बेहद शौकीन हैं और देश-विदेश में यहां-वहां घूम-घूम कर लोगों से मिलते रहते हैं। अपनी इसी रूचि के क्रम में वे वर्तमान में कांग्रेस के बिहाफ पर सामाजिक मुद्दों पर ब्लॉगरों की राय जानने के लिए विभिन्न शहरों में ब्लॉगर मीट का आयोजन कर रहे हैं और उसमें वहां के ब्लॉगर्स और पत्रकारों से चर्चा कर रहे हैं।

शंभूनाथ जी से जब मुलाकात हुई, तो उन्होंने एक रोचक बात बताई। उन्होंने ब्लॉगर मीट के दौरान मेरा परिचय कराते हुए कहा कि ज़ाकिर अली रजनीश लखनऊ के चर्चित लेखक और ब्लॉगर हैं। लेकिन मैंने इन्हें रवीश कुमार के जरिए जाना है। उन्होंने कहा था आप अलग-अलग शहरों में ब्लॉगर मीट कर रहे हो, यह बहुत अच्छी बात है। लेकिन हो सके, तो इनमें दो ब्लॉगर्स को ज़रूर बुलाएं, एक जाकिर अली रजनीश और दूसरे नीरज जाट। क्योंकि सामाजिक जागरूकता के नजरिए से जाकिर ने ब्लॉग जगत में अच्छा काम किया है और घुमक्कड़ी के क्षेत्र में नीरज जाट ने नए-नए कीर्तिमान बनाए हैं।

शंभूनाथ जी की बात सुनकर मेरा मन रवीश जी के प्रति श्रद्धा से भर उठा और उनतक अपने उद्गार पहुंचाना जरूरी लगने लगा (और यह व्यवहारिकता का तकाज़ा भी है)। पहले मैंने सोचा कि इस अपनत्व के लिए उन्हें फोन करके धन्यवाद दिया जाए। फिर संकोची भाव मुझ पर हावी हो गया और मैं सोचने लगा कि फोन करने उन्हें डिस्टर्ब करने से अच्छा है, एक धन्यवाद की पोस्ट ही लिख दी जाए।

सो इसलिए, शुक्रिया रवीश जी। आपके इस अपनत्व एवं प्रेम के लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूं। आपका यह स्नेह निश्चय ही मुझे अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा।
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