रहमत चचा का घोड़ा (मो. साजिद खान): बिखरते सामाजिक मूल्‍यों की जीवंत दास्‍तान

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Mohammad Sajid Khan Ki Bal Kahaniyan


बहुत से लोग बाल साहित्‍य का मतलब आज भी राजा-रानी और परियों की कहानियों से लगाते हैं। ऐसे लोग बाल साहित्‍य को उपदेश और संस्‍कार प्रदान करने के एक माध्‍यम के रूप में देखते हैं। जबकि जमाना बहुत आगे निकल आया है। आज का बच्‍चा कम्‍प्‍यूटर युग का प्राणी है और वह हर कदम पर प्रतियोगिता का सामना करने के लिए अभिशप्‍त है। यही कारण है कि उसकी रूचियों, उसकी प्राथमिकताओं में ही नहीं, उसके सपनों में भी जबरदस्‍त बदलाव आ चुका है। ऐसे में आवश्‍यक हो गया है कि उन्‍हें ऐसा साहित्‍य उपलबध कराया जाए, जो न सिर्फ अपने आसपास के वास्‍तविक माहौल से रूबरू कराए वरन पाठकों को समाज में सकारात्‍मक बदलाव के लिए प्रेरित भी कर सके।

यह प्रसन्‍नता का विषय है कि युवा रचनाकारों ने न सिर्फ समय की इस माँग को भलीभाँति समझा है, वरन वे अपनी अपनी रचनाओं में उसे ढ़ालकर साहित्‍य को एक नई ऊँचाई भी प्रदान कर रहे हैं। ऐसे ही गम्‍भीर उद्देश्‍य के साथ साहित्‍य रचना करने वाले चर्चित एवं सशक्‍त बाल साहित्‍यकार हैं मोहम्‍म्‍द साजिद खान, जिनका सद्य प्रकाशित बाल कथा संग्रह है ‘रहमत चचा का घोड़ा’।

आलोच्‍य संग्रह में साजिद खान की चार लम्‍बी कहानियाँ ‘रहमत चचा का घोड़ा’, ‘अफरे में बसा गाँव’, ‘हादसा’ और ‘बदलाव’ संग्रहीत हैं, जो बिखरते सामाजिक मूल्‍यों और ग्रामीण जीवन में तेजी से आ रहे बदलावों की जीवन्‍त दास्‍तां को बयाँ करती हैं। ये कहानियाँ अपने ‘फार्म’ और ‘विज़न’ दोनों के कारण बाल कहानियों को एक नया आयाम प्रदान करती हैं। इन कहानियों को लेखक ने ‘लम्‍बी कहानी’ कहकर सम्‍बोधित किया है, जो औपन्‍यासिक उद्देश्‍यों के साथ गढ़ी गयी हैं। आलोच्‍य संग्रह की ‘बदलाव’ कहानी इससे पूर्व ‘ग्‍यारह बाल उपन्‍यास’ (सं0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’) में संग्रहीत होकर पाठकों का ध्‍यान अपनी ओर आकर्षित कर चुकी है। ये अपने तरह की अद्भुत कहानियाँ हैं, क्‍योंकि न तो इनमें कहीं बच्‍चे हैं न बचपना और न ही बाल साहित्‍य के तमाम तथाकथित तत्‍व। लेकिन बावजूद इसके इनमें मौजूद घटनाएँ और संवेदनाएँ न सिर्फ पाठक को बाँधे रखती हैं, वरन उसे बुरी तरह से झकझोरती भी हैं।

परियों और फैंटेसी की काल्‍पनिक नगरी से दूर ये कहानियाँ हमारे अधिसंख्‍य समाज के चुभते यथार्थ पर केन्द्रित हैं और उनके दर्द को अविकल रूप में प्रस्‍तुत करती हैं। इन्‍हें पढ़ते हुए पाठक के मस्तिष्‍क में समाज की विकृत लेकिन सच्‍ची तस्‍वीर उभरती है, जो उसे सोचने के लिए विवश करती है और एक अर्थ में पाठक की रूचि के परिष्‍कार का गुरूतर दायित्‍व का निर्वहन करती भी प्रतीत होती हैं। अपनी इस विशिष्‍ट अप्रोच के कारण ही यह कहानियाँ वर्ष 2008 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के भारतेन्‍दु पुरस्‍कार से भी समादृत हो चुकी हैं।

‘मार्मिक बाल कहानियाँ’ (प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) के द्वारा बाल साहित्‍य में अपनी एक विशिष्‍ट पहचान बना चुके मोहम्‍म्‍द साजिद खान इस संग्रह के द्वारा बाल साहित्‍य में ग्रामीण परिवेश की यथार्थपरक कहानियों की एक शानदार नींव रखते हुए नजर आते हैं। इस नींव में गाँव की माटी की महक ही नहीं प्रेमचंद की स्‍वर्णिम परम्‍परा की झलक भी है। आशा है बाल साहित्‍य के वायवीय परिवेश के बीच ये कहानियाँ न सिर्फ पाठकों के बीच सराही जाएँगी, वरन अपनी गम्‍भीर शैली के कारण एक ठोस विमर्श की शुरूआत करने में भी समर्थ होंगीं।

पुस्‍तक: रहमत चचा का घोड़ा
लेखक: मोहम्‍मद साजिद खान
सम्‍पादक: आर0 अनुराधा  
प्रकाशक: प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रलाय, सी0जी0ओ0 काम्‍प्‍लेक्‍स, लोधी रोड, नई दिल्‍ली-110003
पृष्‍ठ: 65, मुल्‍य: 65
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