इतनी घृणा कहाँ से लाए पाण्‍डे जी?

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भूमिका: एक बाल साहित्‍यकार हैं पाण्‍डे जी, उन्‍होंने पिछले दिनों से ब्‍लॉग जगत में और फेसबुक पर मेरे विरूद्ध काफी दुर्गंध फैलाई हुई है...

भूमिका: एक बाल साहित्‍यकार हैं पाण्‍डे जी, उन्‍होंने पिछले दिनों से ब्‍लॉग जगत में और फेसबुक पर मेरे विरूद्ध काफी दुर्गंध फैलाई हुई है। यह पोस्‍ट उनके उस निकृष्‍ट कर्म की प्रतिक्रिया स्‍वरूप लिखी गयी है। मेरा मानना है कि जब लोग कामयाबी की सीढि़याँ चढ़ते हैं, तो उन्‍हें नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह की शातिर चालें चली जाती हैं। हालाँकि समझदार लोग ऐसे मौकों पर चुप ही रहते हैं, लेकिन जब पानी सर से ऊपर निकल जाए, तो एक्‍शन लिया जाना जरूरी हो जाता है, वर्ना आने वाला समय ऐसे लोगों को डरपोक और कायर की संज्ञा से विभूषित करता है।

वाह भई वाह, आपकी शातिर बुद्धि की दाद देने को जी चाहता है। ऐसी शतरंजी चाल बिछाई, कि सास-बहू सीरियल के सारे नकारात्‍मक वृत्ति के पात्र फीके पड़ गये।

अपने बालिकाओं के कहानियाँ संग्रह के लिए कहानियाँ मंगाना, एक हजार रचनाओं से प्रथम चुनी गयी कहानी बेबी माने अप्‍पी को ईर्ष्‍यावश/जानबूझकररिजेक्‍ट करना, जानबूझकर किसी खास कहानी को मंगाना, फिर उसी विषय की दूसरे लेखक की कहानी को छापना, पूछने पर देर से मिलने का बहाना बनाना, ब्‍लॉग पर संग्रह के परिचय में एक लेखक का नाम गायब करना, किसी के याद दिलाने पर उस कमेंट को ही डिलीट कर देना, लेखक द्वारा टिप्‍पणी करने पर विवादित टिप्‍पणियों को प्रकाशित न करने की बात कह कर उन्‍हें हटा देना, मेल भेज कर इस कष्‍ट के लिए खेद व्‍यक्‍त करना, फिर कुछ चुने हुए कमेंट को प्रकाशित करके मामले को भड़काना, जानबूझकर कीचड़ उछाना, फिर उसके ब्‍लॉग पर जॉकर बेनामी बन कर उसकी सूचना देना, उसपर भी घृणा की आग ठन्‍डी न पडने पर फेसबुक पर चौर्यवृत्ति की चर्चा करती पोस्‍ट लगाना, फिर सीधे कहानी को लक्ष्‍य करके पोस्‍ट लगाना।

इतनी घृणा कहाँ से लाए बंधु?
कब से इसे सहेजे फिर रहे हो?

तभी तो कहूँ कि क्‍यों इतने कटु होते हैं आपके कमेंट। तभी तो कविता में ग्‍यारहको ग्‍यारा लिखने पर आप लाल-पीले हो जाते हैं, तभी जरा सा अशुद्ध शब्‍द लिख जाने पर गुरूजी बनकर समझाने चले आते हैं।

अब समझ में आया उन सारे कर्मकाण्‍डों का औचित्‍य। वह भीतर की घूणा ही थी, जो जरा-जरा से अवसरों के ताक में मारी-मारी फिरा करती थी,

पर बंधु, कब तक इसे ढ़ोते फिरोगे? कब तक इस नौटंकी को सबको फोन पर बताते फिरोगे भाई? कब तक इस जबरदस्‍ती के ड्रामे को सबकी फेसबुक वॉल पर चिपकाते रहोगे भाई?

आखिर इससे हासिल क्‍या करना चाहते हो, साफ-साफ कहो?
अगर आप उम्र में बड़े होकर भी स्‍वयं को पीछे छूट गया महसूस करते हैं, तो यह मेरी गल्‍ती नहीं है भाई। मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता।

मैं तो हमेशा आपको बड़ा भाई मानता रहा हूँ। हमेशा समय-समय पर फोन करके हालचाल लेता रहा हूँ, होली-दिवाली, नये साल पर बधाई भी देता रहा हूँ। आपको ध्‍यान होगा, इस दिवाली भी दिया था, भीलवाड़ा में आप द्वारा इतनी कटुता दिखाने के वाबजूद। क्‍योंकि मेरा मानना है कि सामने वाला कुछ भी करे, आप अपना व्‍यवहार मत बदलिए। मैं तो जैसा हूं, वैसा ही रहूँगा। अगर आप मुझे समझ सको, तो मुझे भी प्रसन्‍नता होगी।

और हाँ, दूसरे पर वार करते समय सामने वाले को निहत्‍था बिलकुल नहीं समझना चाहिए। अपनी हालिया प्रकाशित किताब की पहेलीनुमा भूमिका और चल मेरे घोडेकविता को याद रखिए। अगर सामने वाला आपकी तरह अपने पर उतर आए, तो इनको लेकर आपको भी तिगनी का नाच नचाया जा सकता है।

इस पूरे प्रकरण में पाण्‍डे जी ने अपनी शातिर चालों से बाल साहित्‍यकार श्री रावेन्‍द्र कुमार रवि का नाम जोड़ दिया है। हालाँकि मैंने अपने कमेंट में कहीं भी न तो उनका नाम लिया था और न ही उनकी कहानी का, लेकिन फिरभी जैसा कि पाण्‍डे जी ने माहौल बना दिया है, उससे रवि जी का नाम शामिल हो गया है और उनपर आक्षेप भी। मैं इसके लिए खेद व्‍यक्‍त करता हूँ। यदि इस घटना से उनके मन को किसी प्रकार का कष्‍ट पहुँचा हो, तो मैं खुले मन से उनसे क्षमा माँगता हूँ।

इस पूरे घटनाक्रम का एक फायदा यह हुआ हुआ कि पाण्‍डे जी का असली चरित्र सामने आ गया है। मैं बहुत दिनों से छिपे रूप में उनकी घृणा का शिकार हुआ करता था, अब किसी प्रकार का धोखा नहीं रहेगा। हाँ, यदि इस घटना से अन्‍य लोग भी सबक ले सकें, तो यह इसका लोकहितकारी पक्ष होगा।

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