ब्‍लॉगवाणी: मानवता के ‘स्‍पंदन’ ही इंसान हमें बनाते हैं।

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('जनसंदेश टाइम्स', 24 अगस्‍त, 2011 के 'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग...


('जनसंदेश टाइम्स', 24 अगस्‍त, 2011 के
'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग समीक्षा)
अक्‍सर लोग इस बात पर चिंतन करते मिल जाते हैं कि मनुष्‍य के भीतर ऐसा क्‍या है, जो उसे मनुष्‍य बनाता है। इस सवाल से लगभग हर व्‍यक्ति जीवन में कभी न कभी अवश्‍य ही जूझता है। यह एक ऐसा सवाल है, जो सदियों से चला आ रहा है और आने वाली सदियों तक चलता रहेगा, बावजूद इसके इस सवाल का कोई एक सर्वमान्‍य जवाब न तो अभी तक मिल सका है और न ही शायद खोजा जा सकेगा। कारण हर व्‍यक्ति की रूचि और रूझान अलग-अलग होते हैं। जो व्‍यक्ति धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं, वे स्‍वयं को धार्मिक कार्यों में डुबाकर अपने जन्‍म को सार्थक बनाना चाहते हैं। जो लोग सामाजिक रूझान रखते हैं, वे समाज सेवा में अपने औचित्‍य को साबित करते मिल जाते हैं। और इन सबसे अलग होता है वैचारिक रूझान वाला व्‍यक्ति। वह अपने विचारों से समाज को स्‍पंदित करने का ख्‍वाहिशमंद होता है और इसी में अपने जीवन की सार्थकता को तलाशता रहता है।
ऐसी ही एक तलाश में निमग्‍न एक शख्शियत का नाम है शिखा वार्ष्‍णेय, जो अपने ब्‍लॉग स्पंदन (http://shikhakriti.blogspot.com) के द्वारा विचारशील लोगों के मन के तारों को झंकृत करने के लिए प्रयासरत नजर आती हैं। नई दिल्‍ली में जन्‍मीं और रूस से टीवी जर्नलिज्‍म में मास्‍टर डिग्री करने वाली शिखा कलम की धनी हैं और अपनी स्‍वस्‍थ वैचारिक सोच के कारण ब्‍लॉग पाठकों के बीच सराही जाती रही हैं। कभी भारत में एक टीवी चैनल में न्‍यूज प्रोड्यूसर के रूप में काम कर चुकी शिखा वर्तमान में लंदन में स्‍थापित हैं और स्‍वतंत्र पत्रकारिता तथा स्‍फुट लेखन के द्वारा अपनी शख्शि‍यत की एक स्‍पष्‍ट पहचान बना रही हैं।

असरदार लेखन के लिए ब्‍लॉग जगत के संवाद एवं परिकल्‍पना सम्‍मानों से विभूषित शिखा यूँ तो हिन्‍दी, अंग्रेजी और रूसी भाषा में समान अधिकार रखती हैं। लेकिन अपनी मातृभाषा से उन्‍हें विशेष लगाव है। इसीलिए वे हिन्‍दी में सृजनात्‍मक लेखन का कार्य करती हैं। उन्‍होंने ब्‍लॉगिंग की शुरूआत 2009 में एक डायरी के रूप में की थी, जहाँ वे अपनी रचनाएँ संकलित कर सकें। उनकी नजर में ब्‍लॉगिंग विचारों की अभिव्‍यक्ति का सबसे सशक्‍त माध्‍यम है। यहाँ पर आप अपने आपको पूरी तरह उड़ेल सकते हैं। वे बताती हैं कि गृहस्‍थी में रमने के बाद जब मेरे लिए लेखन एवं प्रकाशन एक तरह से बिलकुल समाप्‍त सा हो गया था, ऐसे समय में ब्लॉग ने हमारी अभिव्यक्ति के लिए नए द्वार खोले। इससे उन विचारों को एक नई उड़ान मिली, जो पहले हमारे मन के बंद दरवाजों/डायरी के बंद पन्नो में दम तोड़ दिया करते थे।

शिखा के पास संवेदनाओं का जखीरा है, जो पत्रकारिता के पेशेवराना तेवर के साथ मिलकर अत्‍यधिक प्रभावी हो उठता है। वे अपनी सूक्ष्‍म दृष्टि से समकालीन समाज के बदलावों पर नजर रखती हैं। लोगों की बदलती हुई आदतों ही नहीं इस बदलाव के बाई प्रोडक्ट की ओर भी पाठकों का ध्‍यान दिलाती हैं। शिखा के पास लेख, कविता, कहानी के साथ ही साथ यात्रा वृत्‍तांतों और संस्‍मरणों का खजाना भी है। अपने इन विवरणों में वे सिर्फ स्‍थानों अथवा भौगोलिक वातारण का ही वर्णन नहीं करती, वहाँ के खान-पान, तौर-तरीके, यहाँ तक की उनकी पूरी जीवन-शैली उनकी पोस्‍टों में समा जाती है। उन्‍होंने अपने ब्‍लॉग में रूस और इंग्‍लैण्‍ड के ऐसे जीवंत नजारे प्रस्‍तुत किये हैं, जो बेहद रोचक हैं और पाठकों को बाँध लेने में पूरी तरह से सक्षम भी।

शिखा सिर्फ साहित्यिक दुनिया में रमी रहने वाली कोई पारम्‍परिक लेखिका नहीं हैं। वे सामाजिक परिवेश और उसमें आने वाले बदलावों की चश्‍मदीद गवाह भी हैं। एक ओर वे जहाँ वे बच्‍चों की आदतों को रेखांकित करती हैं, वहीं उनके खानपान की भी पड़ताल करती चलती हैं। दूसरी ओर वे हमारी सामाजिक बुराइयों और उसके कारण उपजे जनआक्रोश को भी अपने अंदाज में व्‍य‍क्‍त करती हुई नजरआती हैं। मीडिया से दिली जुड़ाव होने के कारण शिखा अक्‍सर मीडिया की प्रवृत्तियों की भी खबर लेती हुई चलती हैं। ऐसे अवसरों पर उनकी भाषा एक अलग ही तेवर में नजर आती है। और कहीं-कहीं पर जब उनकी लेखनी पर व्‍यंग्‍य की शान लग जाती है, तो वह देखते ही बनती है।

कुल मिलाकर शिखा का ब्‍लॉग स्‍पंदन समय के एक जीवंत कोलाज की तरह नजर आता है। यहाँ पर हर वय और हर वर्ग के पाठकों के लिए सामग्री है। साहित्यिकता और संवेदनाओं से लबरेज इस ब्‍लॉग में वैचारिकता एक छौंके के समान विद्यमान है। यही कारण है कि जो पाठक एक बार यहाँ पर आता है, वह एक तरह से इसका मुरीद सा हो जाता है। 
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