'बाल साहित्य में नवलेखन' पर केन्द्रित संगोष्ठी - उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, एवं तस्लीम लखनऊ का संयुक्त आयोजन।

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प्रथम सत्र-मुख्‍य धारा का बाल साहित्‍य नवलेखन वक्‍ता (बाएं से दाएं) डॉ0 एस0एस0 सिंह, डॉ0 प्रेम...

प्रथम सत्र-मुख्‍य धारा का बाल साहित्‍य नवलेखन
वक्‍ता (बाएं से दाएं) डॉ0 एस0एस0 सिंह, डॉ0 प्रेम शंकर, डॉ0 श्‍याम सिंह शशि, श्री विनोद चन्‍द्र पाण्‍डेय विनोद, डॉ0 उषा यादव
लखनऊ, दिनांक 27 अगस्त, 2011। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान एवं टीम फॉर साइंटिफिक अवेयरनेस ऑन लोकल इश्‍यूज इन इंडियन मॉसेस (तस्लीम), लखनऊ के संयुक्त तत्‍वावधान में ‘बाल साहित्य में नवलेखन‘ विषय पर केन्द्रित संगोष्ठी का आयोजन निराला साहित्य केन्द्र एवं सभागार, हिन्दी भवन में किया गया। डॉ0 प्रेम शंकर, कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की अध्यक्षता में आयोजित यह संगोष्ठी दो सत्रों में सम्पन्न हुई। दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण के अनन्तर प्रारम्भ हुए उद्घाटन एवं प्रथम सत्र में मुख्य अतिथि डॉ0 श्याम सिंह ‘शशि‘ थे।

अभ्यागतों का स्वागत करते हुए संस्थान के निदेशक, डॉ0 एस0एस0 सिंह ने कहा- ‘‘परिवर्तन प्रकृति का नियम है। मनुष्य की समझदारी इसी में है कि समय के अनुसार स्वयं को परिवर्तित करे। वर्तमान समय में बदलाव कम्प्यूटर क्रांति में निहित है। इस परिवर्तन की आंधी ने जिन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया है वे बच्चे हैं। जिस गति से बच्चों के मानस में बदलाव आया है उसके अनुरूप साहित्य में परिवर्तन नहीं हुए हैं। इसी की पड़ताल करने के लिए बाल साहित्य पर केन्द्रित संगोष्ठी का आयोजन किया गया है।‘‘  

विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ0 उषा यादव (आगरा) ने उल्लेख किया- ‘‘बाल साहित्य में पिछले पचास वर्षों में बहुत बदलाव आया है। वास्तव में यह परिवर्तन बालक में ही आया है। बालक की सहनशीलता, चंचलता, तर्कशीलता के अनुसार बाल साहित्य लिखा जा रहा है। पारम्परिक विषयों, पर्व, त्योहार, प्रकृति, पशु-पक्षी आदि को केन्द्र में रखकर लिखा गया बाल साहित्य आज परिवर्तन माँगता है। बचपन और बच्चों को लेकर ज्यादा संजीदा होने की जरूरत है। बचपन संकटग्रस्त है लेकिन पुस्तकों पर संकट नहीं है। संस्कृति और संस्कार का संकट उत्पन्न हो गया है। बच्चों का बचपन छिन गया है वे अल्पवय में व्यस्क होते जा रहे हैं। मुट्ठी में बंद रेत की तरह संस्कार और संस्कृति फिसल रही है। बच्चे के सामने चकाचौंध भरी दुनिया है। नवलेखन पर विचार करते हुए यह  ध्यान  देना  होगा  कि उन्हें कैसे नीति कथाओं से जोड़ा जाय। आज दूसरा पंचतंत्र लिखने की आवश्‍यकता है। सूचना प्रौद्योगिकी बाल साहित्य लेखन के समक्ष चुनौती है। सिर पर चढ़ कर बोलने वाले जादू की तरह इण्टरनेट का सामना करते हुए सृजन करना होगा। भौतिकता की लहर ने बच्चों को किंकर्Ÿाव्य विमूढ़ बना दिया है। वास्तव में  दिग्भ्रमित कर दिया है।   

श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय ने बाल साहित्य में नवलेखन विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा- ‘समय की परिवर्तनशीलता से साहित्य भी अछूता नहीं है। बाल साहित्य निरन्तर परिवर्तन के साथ सृजित हो रहा है। बाल साहित्य की विविध विधाएँ हैं उनके अनुसार आज नवलेखन हो रहा है। बाल साहित्य लेखन में आज परम्परा और आधुनिकता के मध्य सामांजस्य के साथ-साथ बाल साहित्य लिखने की आवश्यकता है। नवलेखन के रूप में विज्ञान, तकनीकी, प्रौद्योगिकी, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, ऊर्जा प्रदूषण आदि विषयों पर बाल साहित्य लिखा जा रहा है। बच्चों के बौद्धिक स्तर और मानसिक क्षितिज उच्चकोटि का है अतः उसी के अनुसार बाल साहित्य सृजित किया जाना चाहिए। बाल साहित्य के कथ्य एवं षिल्प में अनेक प्रयोग हुए हैं। और हो रहें हैं। लेखन शैली में भी परिवर्तन हो रहे हैं। इन परिवर्तनों के बीच हमें अतीत के गौरव को नहीं भूलना चाहिए। बाल कल्याण के लिए बाल साहित्य लेखन में नवीन प्रयोग आवश्‍यक हैं।

मुख्य अतिथि डॉ0 श्याम सिंह शशि (दिल्ली) का कहना है कि- आज भी बाल साहित्य में बालक उपेक्षित है। उन बच्चों की ओर भी देखने की आवश्यकता है जो मध्यम वर्गीय परिवार से जुड़े हैं, जनजातीय, वनवासी यायावरी प्रवासी परिवार से आते हैं, के बारे में सोचकर बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। कुटिल हृदय बाल साहित्य नहीं लिख सकता। बाल साहित्य में केवल बच्चों के लिए नहीं उनके माता-पिता के लिए भी लिखा जाना चाहिए। बाल साहित्यकारों का दायित्व हो जाता है कि बच्चों पर शोध कर लिखा जाय। पाठ्य पुस्तकों में नये बाल साहित्यकार की रचनाओं समावेष होना चाहिए। बच्चे अलग-अलग भारत की जीते है। उनके परिवेष को ध्यान मंे रखकर साहित्य लिखा जायेगा तो अधिक उपयोगी होगा। बाल साहित्य को बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर लिखा जाना चाहिए। भाषा के संस्कार को भी ध्यान में रखना होगा।

सभा अध्यक्ष डॉ0 प्रेम शंकर, कार्यकारी अध्यक्ष, उत्तर प्रदेष हिन्दी संस्थान ने उल्लेख किया- बच्चों की मनोभावना को ध्यान में रखकर उनके मनोरंजन के लिए कुछ लिखना बहुत बडा काम है। मजदूर वर्ग से जुड़ी महिलाओं के बच्चों के लिए हमारे पास क्या बाल साहित्य है? मोहनजोदड़ों और हडप्पा की खुदाई में मिली सामग्री में खिलौने के रूप में बच्चों को दिशा देती है।

हमें बच्चों के वर्ग को विभाजित करते हुए साहित्य लिखना चाहिए। प्राचीन परम्परा में हमारे पास प्रचुर बाल साहित्य है। लेकिन अनाम बच्चों के लिए क्या है इस साहित्य में। बाल साहित्य मंे भाषा, वैज्ञानिक शब्दावली तथा सांस्कृतिक बोध का होना आवश्‍यक है। पुराने साहित्य को संजोने की आवश्यकता है। नवलेखन में बच्चों के उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखना चाहिए जिससे बच्चों में बाल गौरव और गरिमा का विकास हो। कार्टून में यदि कुछ अच्छा होता वह भी ग्राह्य है लेकिन अधिक देर तक नहीं। हमें हमारे बच्चों को संस्कारों से जोड़ना होगा।
द्वितीय सत्र- हाशिए का बाल साहित्‍य नवलेखन
वक्‍ता (बाएं से दाएं) डॉ0 देवेन्‍द्र कुमार देवेश, डॉ0 एस0एस0 सिंह, डॉ0 प्रेम शंकर, डॉ0 राष्‍ट्रबंधु, डॉ0 चक्रधर नलिन, श्री साबिर हुसैन
हाशिए का बाल साहित्य नवलेखन‘ विषय पर केन्द्रित द्वितीय सत्र में व्याख्यान देते हुए डॉ0 राष्ट्रबन्धु (कानपुर) ने कहा - बाल साहित्य को ऊँचाइयाँ मिले इसके लिए नये विषयों को बाल साहित्य में सम्मिलित किया जाना चाहिए। पुराने प्रतिमानों को हटाया नहीं जा सकता उनके वर्णन में नवीनता लाना आवष्यक है। इन्हें आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में रूपक को बदलकर प्रस्तुत करना चाहिए। बाल साहित्य के नये लेखक संगठन के अभाव में हाषिये पर ही रह जाते हैं और समीक्षकों द्वारा यह मान लिया जाता है कि अच्छा साहित्य लिखा ही नहीं जा रहा है। सचल पुस्तकालय बाल साहित्य और बालकों दोनों के विकास के लिए आवष्यक है। शिक्षा क्षेत्र में बी0एड0, एम0एड0 आदि के पाठ्क्रम में बाल साहित्यकारों का समावेश नहीं होगा तब तक उसे वह स्थान नहीं मिलेगा जिसका वह अधिकारी है। बाल साहित्य को रोजगारपरक बनाना होगा। आज बाल साहित्य शिक्षण की भी आवश्‍यकता है।

डॉ0 चक्रधर नलिन (लखनऊ) ने अद्गार व्‍यक्‍त करते हुए कहा- ‘बचपन में जो ग्रंथियाँ बन जाती हैं वे जीवन भर साथ नहीं छोड़तीं। इसलिए बचपन में जो साहित्य हमें मिलता है वह हमारे निर्माण में सहायक होता है। विज्ञान का क्षेत्र बहुत विस्तृत है उसपर बाल साहित्यकारों को विषेष रूप से ध्यान देना चाहिए।

श्री साबिर हुसैन (पलियाकलां, खीरी) ने इस अवसर अपने विचार व्‍यक्‍त करते हुए कहा-  सामान्यतः बच्चे कहानियों से ज्यादा आकर्षित होते हैं। बाल साहित्य का रचनाकार्म बहुत हल्के ढंग से लिया जाता है। बाल साहित्य की समालोचना का पक्ष भी बहुत कमजोर है। कुछ फ्रेम बने हैं उन में जो रचना फिट हो गयी वह अच्छी। बच्चों को उनकी रुचियों के अनुरूप साहित्य दिया जाना चाहिए।

डॉ0 देवेन्द्र कुमार 'देवेश' (नई दिल्ली) ने कहा- बाल साहित्य के अन्तर्गत संस्मरण और यात्रा साहित्य का नितान्त अभाव है। बाल साहित्य की समीक्षा की स्थिति वर्तमान में दयनीय है। किशोरावस्था में बच्चा दूसरों पर निर्भरता त्यागकर आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ता है। बाल-किशोर साहित्य के नाम पर सूचनाओं का प्रेषण मात्र हो रहा है। वैश्विक प्रभाव में हम ज्ञान के प्रति आकृष्ट हुए हैं लेकिन संवेदना विहीन हैं। सांस्कृतिक शून्य उत्पन्न हो रहा है। सिद्धान्त और व्यवहार के द्वन्द्व में पिसना किशोरों की नियति है। इस नियति से मुक्ति में किशोर साहित्य सहायक हो सकता है। 
और ये रहे संचालक महोदय : इल्‍हें तो पहचान ही लेंगे?
समारोह का संचालन तस्लीम के महामंत्री डॉ0 जाकिर अली 'रजनीश' ने किया। उन्होंने उद्धरण देते हुए कहा कि बाल साहित्य में हाशिए के लोगों को लेकर भी अच्छा साहित्य रचा गया है। ये अलग बात है कि समीक्षाकों की दृष्टि उसपर नहीं गयी है। ऐसे में आवश्‍यकता इस बात की है कि उसे सामने लाया जाए, जिससे अन्य रचनाकार उससे प्रेरणा ग्रहण कर सकें।

इस अवसर पर आमंत्रित विद्वानों को श्री सुनील कुमार सक्सेना, सहायक निदेशक, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा स्मृति चिह्न भेंट किये गये।

इस अवसर पर शहर के प्रमुख बालसाहित्‍यकारों की उल्‍लेखनीय उपस्थिति रही, जिनमें श्री संजीव जायसवाल संजय, श्री अखिलेश श्रीवास्‍तव चमन, डॉ0 मो0 फहीद, श्री रवीन्‍द्र राजेश, श्रीमती विद्याबिन्‍दु सिंह, श्री प्रेमचंद गुप्‍त विशाल, डॉ0 किशोरी शरण शर्मा, श्री कौशलेन्‍द्र पाण्‍डेय के नाम मुख्‍य हैं। इसके साथ ही शाहजहांपर के युवा बाल साहित्‍यकार डॉ0 मो0 साजिद खान एवं डॉ0 अरशद खान ने सुल्‍तानपुर से पधारे चर्चित कहानीकारी श्री चित्रेश ने भी कार्यक्रम में शिरकत करके इसकी गरिमा बढ़ाई।

लगभग 15 वर्षों के बाद लखनऊ शहर में आयोजित बाल साहित्‍य की इस संगोष्‍ठी में शहर के अनेक महत्‍वपूर्ण साहित्‍यकारों ने भी अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई, जिनमें डॉ0 दिनेश चन्‍द्र अवस्‍थी, श्री एम0सी0 द्विवेदी, श्री अखिलेश निगम अखिल, श्री सुरेश उजाला आदि के नाम मुख्‍य हैं।
कानपुर के ब्‍लॉगर डॉ0 पवन मिश्र का भेजा चित्र। उनके साथ मैं और श्री विजय माथुर

कार्यक्रम में लखनऊ के जाने-माने ब्‍लॉगरों ने भी अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराई, जिनमें श्री रवीन्‍द्र प्रभात, श्री कुंवर कुसुमेश, श्रीमती अल्‍का मिश्रा, श्री सर्वत जमाज, श्रीमती सुशीला पुरी, श्रीमती एवं श्री विजय माथुर के नाम प्रमुख हैं। इसके अलावा कानपुर से पधारे ब्‍लॉगर डॉ0 पवन कुमार मिश्र ने भी कार्यक्रम में सहभागिता कर उसे सराहा।

(कार्यक्रम की रिपोर्ट डॉ0 अमिता दुबे, सहायक संपादक, हिन्‍दी संस्‍थान ने तैयार की है, मैंने उसमें स्‍मृति के आधार पर वहां मौजूद विद्वतजनों के नाम बढाएं हैं। यदि किसी का नाम छूट रहा हो, तो कृपया बताने की कृपा करेंगे। कार्यक्रम के सभी चित्र शाहजहांपुर से पधारे युवा बाल साहित्‍यकार डॉ0 साजिद खान जी ने लिये हैं। इन सभी का हार्दिक आभार।)
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'बाल साहित्य में नवलेखन' पर केन्द्रित संगोष्ठी - उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, एवं तस्लीम लखनऊ का संयुक्त आयोजन।
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