ब्‍लॉगवाणी 17 : जज़्बात और जिन्‍दगी का वैज्ञानिक नज़रिया।

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('जनसंदेश टाइम्स',  1 जून, 2011 के 'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग समीक...

('जनसंदेश टाइम्स',  1 जून, 2011 के
'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग समीक्षा)
आमतौर पर लोगों में यह धारणा पाई जाती है कि जो लोग विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करते हैं, उनका नज़रिया भी वैज्ञानिक होता है। लेकिन यह बात पूरी तरह से सही नहीं है। क्‍योंकि किसी व्‍यक्ति का नज़रिया उसकी सोच को उद्घाटित करता है और उसका पेशा उसकी रोजी-रोटी का साधन भर हुआ करता है। होने को तो यह भी हो सकता है कि आप जिस क्षेत्र में काम करते हों, वह आपकी रूचि का हो, पर दुर्भाग्‍य का विषय यह है कि आमतौर पर ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि विज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले बहुत से लोग ऐसे भी पाए जाते हैं, जो रोटी तो विज्ञान की खाते हैं, पर उनकी सोच पूरी तरह से अवैज्ञानिक होती है। पर प्रसन्‍नता की बात यह है कि ऐसे भी लोगों की कमी नहीं है, जो विज्ञान के क्षेत्र में काम करने के साथ ही साथ वैज्ञानिक सोच के मालिक भी होते हैं। ऐसी ही एक शख्सियत क नाम है इन्‍द्रनील भट्टाचारजी सैल और उनकी तार्किक एवं वैज्ञानिक सोच को उद्घाटित करता उनका ब्‍लॉग है ‘जज़्बात, जिंदगी और मैं’ (http://indranil-sail.blogspot.com/)

ओडिशा के जोडा नामक स्‍थान पर जन्‍में इन्‍द्रनील भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थान (I.I.T.), खडगपुर से एम0टेक0 करने के बाद विदेश में सेवारत हैं। वे पेशे से एक भू-वैभानिक हैं और प्रकृति के करीब रहकर काम करने के कारण अपने भीतर उसके लिए एक दिली लगाव महसूस करते हैं। अवैज्ञानिक बातों, कुसंस्‍कार, रूढि़वाद, कुप्रथा, कट्टरता, जात-पात, धार्मिक उन्‍माद और भ्रष्‍टाचार को सख्‍त नापसंद करने वाले इन्‍द्रनील एक ऐसे स्‍वस्‍थ समाज का सपना देखते हैं, जो तमाम विसंगतियों से दूर हो। और यही है उनके ब्‍लॉगिंग में आने का उद्देश्‍य, जिसकी पूर्ति के लिए वे कविता, ग़ज़ल और लेख विधाओं का प्रयोग करते हैं तथा अपनी स्‍पष्‍टवादी सोच के कारण ब्‍लॉग जगत में एक अलग स्‍थान रखते हैं।

एक गैरहिन्‍दी भाषी राज्‍य में जन्‍म लेने के बावजूद इन्‍द्रनील हिन्‍दी को सर्व-भारतीय भाषा मानते हैं और इसीलिए हिन्‍दी में ब्‍लॉगिंग करते हैं। उनका मानना है कि ब्‍लॉग एक शक्तिशाली माध्‍यम है। और यदि सभी लोग इसका सकारात्‍मक रूप से प्रयोग करें, तो समाज में ऐच्छिक बदलाव भी लाए जा सकते हैं।

स्‍वयं को गर्व के साथ नास्तिक घोषित करने वाले इन्‍द्रनील धार्मिक ढ़ोंग के सख्‍त आलोचक हैं। उनका मानना है कि धर्म कोई भी हो, उसके नियम, कायदे, कानून हम जैसे कुछ मनुष्‍यों ने ही बनाए हैं। वे कहते हैं कि जिस समय विभिन्‍न धर्मों के नियम बनाए गये थे, उस समय के हिसाब से वे अनुकूल रहे होंगे, पर अब जमाना बदल गया है। इसलिए लोगों को सच्‍चे मन से अपने धर्म की मान्‍यताओं और परम्‍पराओं के बारे में निष्‍पक्ष विचार कर उनमें संशोधन करने चाहिए। यदि हमारे भीतर इतना साहस हो, तो न तो हमारे देश में शार्मिक विद्वेष फैले और न ही साम्‍प्रदायिक दंगे ही हों।

ढ़ोग के सख्‍त आलोचक होने के कारण इन्‍द्रनील मौका मिलते ही इस इन्‍सानी प्रवृत्ति की आलोचना करने से पीछे नहीं हटते। वे अन्‍ना के बहाने समाज में जमा हुई गोलबंदी को निशाने पर साधते हुए कहते हैं कि भ्रष्‍ट लोग कोई मंगल ग्रह से नहीं आए हैं। वे सब हमारे ही समाज का हिस्‍सा हैं और जाने-अनजाने में उन्‍हें हम सबने ही आगे बढ़ाया है। अगर हमें अपने देश से भ्रष्‍टाचार को मिटाना है, तो हमें पहले अपने भीतर के सुविधापरक इंसान को मिटाना होगा और जाति, धर्म, प्रांत से ऊपर उठ कर देश के बारे में सोचना होगा।

इन्‍द्रनील अज्ञानता के अंधकार से उपजी सोच को एक प्रकार के अंधविश्‍वास का नाम देते हैं और इसे बहुत खतरनाक करार देते हैं। वे परमाणु ऊर्जा को आजके युग की आवश्‍यकता बताते हैं और उसे सबसे ज्‍यादा सुरक्षित करार देते हैं। क्‍योंकि उसके कारण न तो किसी प्रकार का प्रदूषण होता है और न ही कोई बीमारियाँ फैलती हैं। विकिरण के मुद्दे पर वे बताते हैं कि जितना विकिरण एक परमाणु ऊर्जा केन्‍द्र के 15 मील के दायरे में रहने से मिलता है, उतना विकिरण एक सामान्‍य व्‍यक्ति एक साल में अपने कम्‍प्‍यूटर पर काम करने से अथवा एक केला खाने से भी प्राप्‍त कर लेता है। इसलिए सम्‍पूर्ण सच को जाने बिना किसी बात का समर्थन और विरोध करना उचित नहीं है।

इन्‍द्रनील मानवता के कुशल चितेरे हैं। उनकी ये संवेदनाएँ उनकी काव्‍यात्‍मक रचनाओं में बिखरी पड़ी हैं। हालाँकि वे बहर के जानकर हैं, पर इसके बावजूद वे ग़ज़लों से बेहतर अतुकान्‍त कविताएँ रचते हैं। इन छोटी-छोटी कविताओं में वे प्राय: बड़ी-बड़ी बात कह जाते हैं: उसे बारिश में भीगना/पसंद है बहुत।/मुझे नहीं।/बस इसी बात पे/हमारे बीच/कड़कती हैं बिजलियाँ।

ऐसा नहीं है कि इन्‍द्रनील सिर्फ तथ्‍यों और विचारों के प्रस्‍तोता हैं, उनके ब्‍लॉग में रूमानी जज्‍बों का श्रृंगार भी है तथा हास्‍य और व्‍यंग्‍य की तीखी धार भी। उनके ब्‍लॉग को पढ़ना एक सुकूनबख्‍श अमराई से गुज़रने के समान है।
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ब्‍लॉगवाणी 17 : जज़्बात और जिन्‍दगी का वैज्ञानिक नज़रिया।
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