ब्लॉगवाणी (09) : प्रेम-रस की तलाश में...

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('जनसंदेश टाइम्स',  6 अप्रैल, 2011 में  'ब्लॉ...

('जनसंदेश टाइम्स',  6 अप्रैल, 2011 में 
'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग समीक्षा)

हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को लोकप्रिय बनाने में जहां पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित होने वाले लेखों ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं इसमें सभी ब्‍लॉगों की अपडेट की जानकारी देने वाले एग्रीगेटरों (ब्‍लॉग की नवीनतम स्थितियां बताने वाली वेबसाइटें) का रोल भी महत्‍वपूर्ण रहा है। इनमें सबसे महत्‍वपूर्ण रहे हैं ब्‍लॉगों की टी0आर0पी0 बताने वाले कॉलम। ब्‍लॉगों की यह टी0आर0पी0 जहां नए पाठक को चमत्‍कृत करती है, वहीं नये ब्‍लॉगर्स को अपनी ओर खींचती भी है। ..और इसी आकर्षण का प्रतिफल है शाहनवाज़ सिद्दीकी का ब्‍लॉग प्रेम रस (http://www.premras.com/)।

शाहनवाज़ विज्ञापन के क्षेत्र से जुड़े हैं और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत हैं। उन्‍होंने ब्लॉगिंग की शुरुआत हालांकि 2007 में ही कर दी थी। तब वे इंग्लिश में लिखा करते थे। किन्‍तु उनके मन में बचपन से ही हिंदी के प्रति एक लगाव सा था, जो मार्च 2010 में प्रेम रस के रूप में फलीभूत हुआ। शाहनवाज़ जहां एक ओर व्‍यंग्‍यकार के रूप में हमारे सामने आते हैं, वहीं दूसरी ओर वे समसामयिक परिस्थितियों को विश्‍लेषित करने वाले चिंतक के रूप में भी दिखाई पड़ते हैं। उनका मानना है कि अगर व्‍यक्ति के जीवन में प्रेम नहीं है, तो कुछ भी नहीं है। वे अपनी पोस्‍ट मधुर वाणी का महत्त्व में कहते हैं कि ईश्वर ने हमें धरती पर प्रेम फ़ैलाने के लिए भेजा हैयही हर धर्म का सन्देश भी है। वे प्रेम के महत्‍व को रेखांकित करते हुए कहते हैं: प्रेम की तो अजीब ही लीला हैस्नेह बाँटने से प्रेम बढ़ता है और इससे स्वयं प्रभु खुश होते हैं। ..कुरआन के अनुसार जब प्रभु किसी से खुश होते हैं तो अपने फरिश्तों से कहते हैं कि मैं उक्त मनुष्य से प्रेम करता हूँ। तुम भी उससे प्रेम करो और पूरे ब्रह्माण्ड में यह खबर फैला दो।

शाहनवाज़ आम आदमी के पैरोकार हैं। उन्‍हें जहां भी मौका मिलता है, वे आम आदमी के दर्द को बयां करने से नहीं चूकते। अपनी एक व्‍यंग्‍य आधारित पोस्‍ट चूहे की महिमा और मुख्यमंत्री जी में उन्‍होंने एक चूहे के बहाने आम आदमी की स्थितियों को बखूबी बयां किया है, हमारे यहां तो उन्हें बची हुई सूखी रोटी ही मिलती होगी और वह भी कभी-कभीहाँ उनके यहां अवश्य ही देसी घी के लड्डू मिल जाते होंगे। फिर वहां हिसाब रखने वाला भी कौन होगा कि लड्डू गायब कैसे हो गएहमें तो पता रहता है कि हमने दो रोटी बनाई थी और उसमें से आधी बचा दी थी कि सुबह उठ कर खा लेंगे।

आम आदमी आज जिस चीज से सबसे ज्‍यादा त्रस्‍त है, वह है हमारे समाज में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार। शाहनवाज़ ने अपनी पोस्‍ट भ्रष्टचार की जड़ में उसके कारणों की पड़ताल करने की ईमानदार कोशिश की है। वे इसकी वजहों को विश्‍लेषित करते हुए कहते हैं कि भ्रष्टाचार हमारे बीच से ही शुरू होता हैहम अक्सर इसे अपने आस-पास फलते-फूलते हुए ही नहीं देखते हैं, बल्कि अक्सर खुद भी किसी ना किसी रूप में इसका हिस्सा होते हैं। लेकिन हमें यह बुरा तब लगता है जब हम इसके शिकार होते हैं। शाहनवाज़ सवाल उठाते हुए कहते हैं कि हम नेताओं, भ्रष्ट अधिकारियों इत्यादि को तो कोसते हैं, लेकिन हम स्वयं भी कितने ही झूठ और भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं? उनका मानना है कि अगर हम वास्‍तव में समाज से इस दानव का नामो-निशान मिटाना चाहते हैं, तो पहले हमें अपने अंदर के भ्रष्टाचार को समाप्त करना होगा। शुरुआत अपने से और अपनों से हो तभी भ्रष्टाचार का यह दानव समाप्त हो सकता है।

शाहनवाज़ जीवन की उन छोटी-छोटी बातों पर बारीक नजर रखते हैं, जो हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं, फिर चाहे वे फुटपाथ पर होती दुर्घटनाएँ हों अथवा विभिन्‍न कम्‍पनियों द्वारा की जाने वाली निवेश के नाम पर ठगी। एक ओर जहां वे फुटपाथ पर होने वाली दुर्घटनाओं के लिए सरकार की गलत नीतियों की वजह से रोजगार में आए हुए असंतुलन के कारण शहरों में बढ़ती भीड़ को मानते हैं, वहीं समाज में होने वाली ठगी की घटनाओं के लिए मनुष्‍य के मन में समाई लालच की भावना को जिम्‍मेदार ठहराते हैं। वे ठगी के लिए बनाई जाने वाली नित नई स्‍कीमों के बारे में बताते हुए कहते हैं: दरअसल ऐसी कंपनियां मनोविज्ञान में माहिर होती हैं और जानती है कि मध्यवर्गीय लोगों की नस कहां है। ..ऐसी कंपनियां चलाने वाले जानते हैं कि मध्यमवर्गीय लोगों को लाभ के लोभ में फंसा कर अक्ल से अंधा किया जा सकता है और इसके लिए उनका विश्वास जीतना सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। एक बार विश्वास जमा, तो रात-दिन पैसा कमाने की धुन में परेशान लोगों के पास समय ही नहीं बचता है यह देखने के लिए कि कंपनी उनके पैसे का प्रयोग कैसे कर रही है।

अपने एक लेख खानदानी पेशा जिसे सुन कर रूह भी कांप उठे में शाहनवाज़ ने देह व्‍यापार की काली पर्तों को उधेड़ने का प्रयास किया है। वे शोषण के इस गंदे खेल के बारे में बताते हुए कहते हैं कि आज के युग में भी सबसे अधिक शोषण का शिकार नारी ही हो रही है। कहीं उन्हें सरेआम फैशन की दौड़ के बहाने लूटा जाता है, तो कहीं देह व्यापार की अंधी गली में धकेल दिया जाता है। वे भारत के देह व्यापार के 20 से 25 प्रतिशत के हिस्से पारिवारिक देह व्यापार के सच को उकेरते हुए बताते हैं कि हद तो तब होती है जब लड़कियों के माता-पिता, मामा, भाई, चाचा जैसे सगे रिश्तेदार ही महिलाओं को इस दलदल में फंसने पर मजबूर कर देते हैं। वे देह व्‍यापार के एक घातक पक्ष को वर्णित करते हुए कहते हैं कि लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में जल्द से जल्द झोंकने के चक्कर में उन्‍हें आक्सीटॉसिन के इंजेक्शन लगाए जाते हैं, जिससे उनके शरीर के हार्मोन बिगड़ जाते हैं, जिससे उन्‍हें 11-12 साल की उम्र में ही देह व्यापार की भट्टी में झोंक दिया जाता है। वे आक्‍सीटॉसिन के कुप्रभावों को रेखांकित करते हुए कहते हैं, आक्सीटॉसिन वह इंजेक्शन है जो भैंसो को अधिक तथा जल्दी दूध देने के लिए तथा मुर्गियों को जल्दी बड़ा बनाने के चक्कर में लगाए जाते हैं। ऐसे इंजेक्शन से अक्सर शरीर के हार्मोन बिगड़ जाते हैं, जो कि बाद में कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बनते हैं।  

भारत में रहने वाले प्राय: प्रत्‍येक व्‍यक्ति ने अपने जीवन में कभी न कभी साम्‍प्रदायिकता के डंक का सामना किया है। यह वह बीमारी है, जो आजादी के पहले से हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है। दु:ख का विषय यह है कि आज भी तमाम राजनैतिक पार्टियां अपनी वोट की रोटियां सेकने के चक्‍कर में सैकड़ों लोगों को इसका जहर पिलाती रहती हैं। जाहिर सी बात है कि ऐसे में शाहनवाज़ फिर इससे कैसे अछूते रह सकते हैं। वे अपनी पोस्‍ट क्या मंदिर-मस्जिद इंसान की जान से बढ़कर है? में कैंसर और एड्स से भी खतरनाक इस व्‍याधि की तह में जाते हुए सवाल उठाते हैं कि दुनिया में कोई भी मस्जिद या मंदिर किसी इंसान की जान से बढ़कर कैसे हो सकता है? वे इसके लिए सिर्फ राजनीतिक दलों को कटघरे में खड़ा किये जाने और उनके उद्धार में इसका हल नहीं देखते। उनका स्‍पष्‍ट मानना है कि बुराई इन लोगो में नहीं बल्कि कहीं न कहीं हमारे अन्दर है। ..क्या कभी हमने इसके विरोध की कोशिश की? आज समय दूसरों को बुरा कहने की जगह अपने अन्दर झाँक कर देखने का हैमेरे विचार से शुरुआत मेरे अन्दर से होनी चाहिए।

शाहनवाज़ दुनिया में तेजी से बढ़ती हिंसक गतिविधियों और आतंकवादी घटनाओं से भी समान रूप से चिंतित हैं। उनका मानना है कि अलग-अलग देशों में हिंसक गतिविधियों के अनेकों कारण हो सकते हैं, परन्तु आमतौर पर ये प्रतिशोध की भावना से शुरू होती हैं और सरकार द्वारा सही ढ़ंग से उपचारित न किये जाने के कारण बढ़ती जाती हैं। वे विश्व में आतंकवाद का बढ़ता दायरा पोस्‍ट में इसकी सम्‍यक पड़ताल करते हुए कहते हैं कि आंदोलन चाहे छोटे स्तर पर हों अथवा आतंकवाद का रूप ले चुके हों, इनको सिर्फ शक्ति बल से नहीं दबाया जा सकता। क्‍योंकि ऐसे मामलों में अक्‍सर शक्ति बल का प्रयोग उल्‍टे परिणाम लाता है। आमतौर से आतंकवादी संगठन अपने ऊपर किये गये शक्ति बल को अपने वर्ग में सरकारी ज़ुल्म के रूप में प्रचारित करते हैं और आसानी से लोगों को बेवकूफ बना लेते हैं। वे इस सम्‍बंध में अपना सुझाव देते हुए कहते हैं, आतंकवादी तथा हिंसक आंदोलनों के मुकाबले के लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा बल प्रयोग जैसे सभी विकल्पों को एक साथ लेकर चलना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

अपनी पारखी दृष्टि एवं सशक्‍त लेखनी के द्वारा शाहनवाज़ हिन्‍दी के सभी चर्चित समाचार पत्रों में जगह पाते रहे हैं। यही कारण है कि चाहे समाचार पत्रों में लिखे उनके लेख हों अथवा ब्‍लॉग पर किया गया सामयिक चिंतन, वे सभी जगह सराहे जाते रहे हैं। एक ओर शाहनवाज़ जहां अपने आसपास के माहौल पर पूरी निगाह रखते हैं, वहीं वे वैश्विक स्‍तर पर होने वाले बदलावों और घटनाओं को भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देते। वे दूर तक जाएगी मिस्र की यह आग पोस्‍ट में अरब देशों में फैले जन विद्रोह की वजह तलाश करते हुए लिखते हैं कि अरब देशों के तानाशाहों से पहले ही त्रस्त जनता के गुस्से में शासकों के भ्रष्टाचार और अमेरिकी वरदहस्त ने आग में घी जैसा काम किया है। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि इस विद्रोह को हल्‍के में नहीं लिया जा सकता क्‍योंकि 1979 में ईरान में हुए विद्रोह में वहां के शाह रजा पहलवी को भी सत्ता से बेदखल होना पड़ा था।

शाहनवाज़ ने भले ही ब्‍लॉगिंग की शुरूआत अंग्रेजी से की हो, पर उनकी जड़ें आज भी अपनी मातृभूमि और मातृभाषा में गहराई तक समाई हुई हैं। यही कारण है कि वे राष्‍ट्रभाषा के मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखते हैं और अंग्रेजीदां लोगों की मानसिकता पर चोट करने में भी पीछे नहीं रहते। उनका स्‍पष्‍ट मानना है कि अपनी मातृभाषा को छोड़कर विदेशी भाषा के प्रति दीवानगी दिखाना गलत ही नहीं देश के साथ गद्दारी है। वे कहते हैं कि अपनी भाषा को छोड़कर प्रगति करने के सपने देखना बिलकुल ऐसा ही है जैसे अपनी माँ का हाथ छोड़ किसी दूसरी औरत का हाथ पकड़ कर चलने की कोशिश करना। वे दावे के साथ कहते हैं कि ऐसे लोग कभी कामयाब नहीं हो सकते, क्‍योंकि विश्‍व में कोई भी देश ऐसा नहीं है, जिसने अपनी मातृभाषा को त्‍याग कर तरक्‍की की सीढि़यां चढ़ने में कामयाबी पाई हो।

बेहद कम समय में वैश्विक स्‍तर पर मान्‍य एलेक्‍सा रैंकिंग में ऊँची उछाल दर्ज करने वाला शाहनवाज़ का ब्‍लॉग प्रेम रस अपनी जनपक्षधरता और स्‍पष्‍टबयानी के कारण आम आदमी के ब्‍लॉग के रूप में सामने आया है। यह ब्‍लॉग कंट्रोवर्सी से दूर रहता है, आम आदमी के हितों की बात करता है और उसके जीवन में प्रेम के रस को घोलने के प्रयत्‍न करता प्रतीत होता है। यह छोटे-छोटे सूत्र ही इसकी पहचान हैं और यही इसके कामयाबी के राज़ भी हैं।  
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