धर्म की असली व्‍याख्‍या।

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('जनसंदेश टाइम्स', 23 मार्च, 2011 में 
'ब्लॉगवाणी' कॉलम में प्रकाशित ब्लॉग समीक्षा)

यह हमारा सौभाग्‍य ही रहा है कि आदिकाल से ही हमारे देश में एक से बढ़कर एक ज्ञानीजन पैदा होते रहे हैं, जिन्‍होंने अपने विचारों से समाज को एक सार्थक दिशा देने का काम किया। लेकिन इसी के साथ ही हमारे दुर्भाग्‍य के रूप में प्रारम्‍भ से ही यहां ऐसे निकृष्‍ट सोच के लोग भी पाए जाते रहे, जिन्‍होंने दीमक का काम किया और अपने कुप्रयासों से अच्‍छी से अच्‍छी विचारधारा और पद्धति को भी रसातल में पहुंचा दिया। आर्य समाज इसका ज्‍वलंत उदाहरण है।

1857 की क्रान्ति के विफलता के बाद स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती द्वारा स्‍थापित आर्य समाज के बारे में ज्‍यादातर लोगों का यही मानना है कि यह एक प्रकार का धर्म है, जबकि सत्‍य यह है कि यह एक जीवन पद्धति थी, जिसका उद्देश्‍य था समाज में व्‍याप्‍त ढ़ोंग और पाखण्‍ड का नाश करना तथा सामाजिक चेतना जगा कर अंग्रेजों से हिन्‍दुस्‍तान को आजाद करना। अपनी इस क्रान्तिकारी सोच के कारणही दयानंद सरस्‍वती अंग्रेजों के बीच बाग़ी फ़कीर के रूप में जाने गये और अंग्रेज सरकार द्वारा न सिर्फ उन्‍हें गिरफ्तार किया गया वरन उनके ऊपर इलाहाबाद हाईकोर्ट में राष्‍ट्रद्रोह का मुकदमा भी चलाया गया।

दयानंद सरस्‍वती के इन्‍हीं क्रान्तिकारी विचारों को अगर आप पढ़ना चाहते हैं और पाखंड तथा ढ़ोंग से रहित हिन्‍दू धर्म की व्‍याख्‍या जानना चाहते हैं, तो विजय माथुर का ब्‍लॉग क्रान्ति स्‍वर (http://krantiswar.blogspot.com/) आपके लिए ही बना है।

विजय माथुर उन लोगों में से नहीं हैं, जो किसी विचारधारा के गुलाम होते हैं। जहां एक ओर वे गर्व के साथ पाठकों को बताते हैं कि स्‍वराज्‍य शब्‍द के आविष्‍कारक स्‍वामी दयानन्‍द सरस्‍वती ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्‍थापना की, वे छावनियों वाले शहर थे और स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय जेल जाने वालों में 85 प्रतिशत व्‍यक्ति आर्य समाजी होते थे, वहीं वे अपनी पोस्‍ट ॐ नमः शिवाय च में साहसपूर्वक यह भी स्‍वीकार करते हैं कि आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी को दण्ड देने में लगे हुए हैं।

विजय माथुर स्‍वयं को ढ़ोंग और पाखण्‍ड के विरोधी के रूप में प्रस्‍तुत करते हैं और आमजन को सच्‍चाई से अवगत करने की अभिलाषा रखते हैं। उन्‍होंने सत्‍यार्थ प्रकाश की रौशनी में अपनी सोच विकसित की है और अपनी इसी दृढ़ इच्‍छाशक्ति के कारण सच को सच कहने की हिम्‍मत जुटाई है। वे अपनी एक पोस्‍ट कुल क्रूर कुरीति तोड़ेंगे, सब दुष्कर्मों को छोड़ेंगे में समाज में व्‍याप्‍त ढ़ोंग और आडम्‍बरों का चित्रण करते हुए लिखते हैं: जियत पिता से दंगम दंगा/मरे पिता पहुँचायें गंगा/जियत पिता को  पूँछी बात/ मरे पिता को खीर और भात/जियत पिता को घूंसे लात/मरे पिता को श्राद्ध करात/जियत पिता को डंडा, लठिया/मरे पिता को तोसक तकिया/जियत पिता को कछू न मान/मरत पिता को पिंडा दान। 

विजय माथुर का यह दृढ़ मत है कि जो सोच, जो विचारधारा हमारे वर्तमान का विरोध करती है, उसे बदल देने की आवश्‍यकता है। वे अपनी इसी सोच के विस्‍तार देते हुए कहते हैं कि आज जनसंख्‍या विस्‍फोट और वनों के क्षरण के कारण पृथ्‍वी का अस्तित्‍व संकट में पड़ता नजर आ रहा है। ऐसे में हमें दाह संस्‍कार हेतु विद्युत शव-दाह ग्रहों का प्रयोग करना चाहिए। इससे एक तो प्रदूषण नहीं होगा और साथ ही वृक्षों का जीवन भी बचेगा। लेकिन अपनी इस सोच को व्‍यक्‍त करते हुए वे करोड़ों लोगों के दिलों में रची-बसी धार्मिक मान्‍यताओं को भी पूरी तरह नहीं बिसराते। इसीलिए वे साथ ही यह सुझाव भी देते हैं कि इसके बाद मृतक की आत्‍मा की शान्ति के लिए छोटा सा हवन किया जा सकता है।

विजय अपने जीवन में व्‍यवहारिक एवं सामाजिक पक्षों को वरीयदता देते हैं। यही कारण है कि वे मेडिकल साइंस की जरूरतों को समझते हुए मृत्‍यु के उपरांत देहदान की वकालत करते हुए भी नजर आते हैं। वे अपने लेख में सुझाव देते हुए कहते हैं कि यदि हम इस व्यवस्था को अपना लें तो मानव अंगों की तस्करी रोकी जा सकती है तथा गरीब लोगों का शोषण भी समाप्त किया जा सकता है। साथ ही वे धार्मिक मान्‍यताओं के मद्देनजर यह भी बताना नहीं भूलते कि इस व्यवस्था में भी बाद में घर पर मृतक की आत्मा की शांति हेतु हवन वैदिक पद्धति से किया जा सकता है।

ऐसा नहीं है कि विजय कोई नास्तिक व्‍यक्ति हैं। वे ईश्‍वर में पूरी आस्‍था रखते हैं और परमात्‍वा को प्राप्‍त करने के लिए भक्ति को साधन मानते हैं। लेकिन उनकी भक्ति दिखावा नहीं है। वे अपनी भक्ति को स्‍पष्‍ट करते हुए कहते हैं: भक्ति का अक्षर भजन हेतु है, अक्षर कर्म (निष्‍काम कर्म) का प्रतीक है और ति में त्‍याग की भावना निहित है। इसीलिए निष्काम कर्म करते हुए त्याग की भावना से जो भजन किया जाता है उसे ही भक्ति कहते हैं।

विजय का मानना है कि भारतीय समाज में जो पर्व प्रचलित हैं, उनके पीछे शुद्ध वैज्ञानिक कारण रहे हैं, लेकिन धीरे-धीरे समाज में ढ़ोंगियों का बोलबाला होता गया और वे पर्वों के मूल में स्‍थापित वैज्ञानिक कारणों को भूलकर लकीर के फकीर बनते गये। वे अपनी पोस्‍ट मकर-संक्रांति का महत्त्व में इस अवसर पर छिलकों वाली उर्द की डाल तथा चावल की खिचडी पका कर खाने के कारणों को उद्घाटित करते हुए कहते हैं मकर संक्रान्ति के बाद सूर्य की रश्मियाँ तीव्र होने लगतीं हैं; अतः शरीर में पाचक अग्नि उदीप्त करती है तथा उर्द की डाल क़े रूप में प्रोटीन व चावल क़े रूप में कार्बोहाईड्रेट जैसे पोषक तत्वों को शीघ्र घुलनशील कर देती है। इसीलिये इस पर्व पर खिचडी खाने व दान करने का महत्त्व निर्धारित किया गया है। ..गुड़ रक्तशोधन का कार्य करता है तथा तिल शरीर में वसा की आपूर्ति करता है, इस कारण गुड़ व तिल क़े बने पदार्थों को भी खाने तथा दान (जिससे गरीबों तक भी स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ पहुंच सकें) देने का महत्त्व रखा गया है।

इसी प्रकार विजय ने अपनी पोस्‍ट श्रीमद देवी भागवत-वैज्ञानिक व्याख्या में नवरात्रि के पर्व को भी ऋतुओं पर आधारित शरीर को पुष्‍ट करने वाला अवसर बताया है, जिसमें विभिन्‍न आयुर्वेद महत्‍व के तत्‍वों को लेने का प्राविधान किया गया था। वे किशोर चन्द्र चौबे के हवाले से लिखते हैं कि मार्कंडेय चिकित्सा-पद्धति में नव-रात्र की नौ देवियों क़े औषधीय रूप (क्रमश: हरड़, ब्राह्मी, चंद्रसूर, पेठा, अलसी, मोइया, नागदौन, तुलसी एवं शतावरी) का विषद विवेचन किया गया है। उनका मानना है कि बदलते मौसम में इन औषधियों का सेवन करके और निराहार रह कर मानव स्‍वास्‍थ्‍य की रक्षा नवरात्रि का प्रमुख उद्देश्‍य था, लेकिन आज पौराणिक कर क्या रहें हैं- केवल ढोंग  पाखण्ड, जिससे ढोंगियों की रोजी तो चल जाती है लेकिन मानव-कल्याण कदापि सम्भव न होने क़े कारण जनता ठगी जाती है।

विजय अपने ब्‍लॉग में बार-बार धर्म, ईश्‍वर, भक्ति एवं पूजा पद्धतियों से जूझते हुए नजर आते हैं। इन मुठभेड़ों का कारण है सत्‍य को उद्घाटित करना, समाज में व्‍याप्‍त भ्रम के जाल को काटना। वे जहां एक ओर भक्ति की विवेचना करते मिलते हैं, दूसरी ओर (पोस्‍ट प्रलय की भविष्यवाणी झूठी है-यह दुनिया अनूठी है में) भगवान को भी व्‍याख्‍यायित करने से नहीं चूकते- भगवान क्या है उसे समझना बहुत ही सरल है। भ-अर्थात भूमि,-अर्थात गगन, व्-अर्थात वायु, I-अर्थात अनल (अग्नि) और -अर्थात नीर यानि जल, प्रकृति के इन पांच तत्वों का समन्वय ही भगवान है, जो सर्वत्र पाए जाते हैं। इन्हीं के द्वारा जीवों की उत्पत्ति, पालन और संहार होता है तभी तो GOD अर्थात Generator,Operator ,Destroyer. इन प्राकृतिक तत्वों को किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसलिए ये खुदा हैं।

विजय अपने ब्‍लॉग में सिर्फ धार्मिक सिद्धांतों के व्‍याख्‍याकार के रूप में ही नहीं नजर आते हैं, उन्‍होंने कुछ ऐसे लेख भी लिखे हैं, जिनमें वे एक क्रान्तिकारी चिन्‍तक के रूप में सामने आए हैं। ऐसी ही दो पोस्‍टें हैं रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना तथा सीता का विद्रोह

रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना एक वृहद पोस्‍ट है,‍ जिसमें एक ओर धरती पर जीवन के विकास क्रम को विजय ने अपने अंदाज में समझाया है, दूसरी ओर उन्‍होंने आर्यों एवं अनार्यों के द्वन्‍द्व के बहाने रामायण की कथा को एक नया जामा पहनाया है। वे बताते हैं कि कुबेर के नाना भारद्वाज ऋषि ने आर्यावर्त के समस्‍त ऋषियों की एक सभा में सर्वसम्‍मति से यह पहले से ही तय कर दिया था कि दशरथ का जो प्रथम पुत्र उत्‍पन्‍न हो, उसका नामकरण राम हो तथा उसे राष्‍ट्र रक्षा के लिए 14 वर्ष का वनवास प्रदान करके रावण के साम्राज्‍यवादी इरादों को नेस्‍तानाबूद किया जाए। विजय इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए विभिन्‍न ऋषियों के आश्रमों को डिफेंस सेंटरों के रूप में परिभाषित करते हैं और राम रावण युद्ध से जुड़े विभिन्‍न प्रसंगों को आश्‍चर्यजनक रूप से अपने सिद्धांत में फिट कर देते हैं। पोस्‍ट के अंत में वे राम के अवतार रूप में प्रचलित छवि को व्‍यवहारिक रूप देते हुए कहते हैं: राम के असीम त्याग,राष्ट्र-भक्ति और उच्चादर्शों के कारण ही आज हम उनका गुण-गान करते हैं-मानो ईश्वर इस देश की रक्षा के लिए स्वयं ही अवतरित हुए थे।

इसी प्रकार सीता का विद्रोह में विजय सीता-निष्‍काषन की घटना के लिए धोबी द्वारा लगाए गये लांछन को कारक नहीं मानते। वे उसकी विवेचना करते हुए कहते हैं कि साम्राज्यवादी रावण क़े अवसान क़े बाद राम अयोध्‍या क़े शासक क़े रूप में नहीं विश्वपति क़े रूप में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे। यही कारण है कि उन्‍होंने सत्ता सम्हालते ही उस समय प्रचलित वेदोक्त-परिपाटी का त्याग कर ऋषियों को मंत्री मण्डल से अपदस्थ कर दिया था। वे बताते हैं कि महारानी सीता जो ज्ञान-विज्ञान व पराक्रम तथा बुद्धि में किसी भी प्रकार राम से कम न थीं। वे उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकती थीं। जब उन्होंने देखा कि राम उनके विरोध की परवाह नहीं करते हैं तो उन्होंने ऋषीवृन्द की पूर्ण सहमति एवं सहयोग से राम-राज्य को ठुकराना ही उचित समझा। अपनी इस स्‍थापना के समर्थन में वे तर्क देते हुए कहते हैं कि यही कारण था कि जब लव-कुश द्वारा राम की सेना को परास्‍त करने के बाद राम ने उन्‍हें वापस बुलवाया, तो सीता ने महल में जाने से इनकार कर दिया और अपनी इहलीला समाप्‍त कर ली।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि क्रान्ति स्‍वर भारतीय संस्‍कृति को व्‍यवहारिक नजरिए से देखने का एक शानदार माध्‍यम है। भले ही विजय कहीं-कहीं सांस्‍कृतिक आयामों को व्‍यवहारिकता प्रदान करने के प्रयास में सरलीकरण के फेर में फंसते से नजर आते हैं, लेकिन कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि उनकी दृष्टि ज्‍यादा व्‍यवहारिक और विश्‍वसनीय प्रतीत होती है। उन्‍होंने समाज को पाखण्‍ड और ढ़ोंग से मुक्‍त कराने का जो बीड़ा उठाया है, क्रान्ति स्‍वर उसकी दिशा में एक सराहनीय प्रयास है।
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