एग्रीगेटर: यानी एक आँख से देखने वाला?

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पिछला हफ्ते ब्लॉग जगत में एग्रीगेटरों के शोक के नाम रहा, जिसमें हर सक्रिय और अक्रिय ब्लॉगर ने ...

पिछला हफ्ते ब्लॉग जगत में एग्रीगेटरों के शोक के नाम रहा, जिसमें हर सक्रिय और अक्रिय ब्लॉगर ने अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अश्रुओं का योगदान दिया। वाकई ये बात ही चिंता वाली थी। नए और कम चर्चित ब्लाग, जो अपनी आकर्षक हेड लाइन के कारण पाठक खींच लाते थे, वहाँ मौत सा सन्नाटा पसरा हुआ है। इस सन्नाटे के कारण क्या हैं, आइए उस पर खुलकर विचार करें। शायद इसी में से कोई रास्ता निकले?


एग्रीगेटर नं० 01 : ब्लॉगवाणी
इस बात में दो राय नहीं कि हिन्दी ब्लॉगों के लिए जितने भी एग्रीगेटर सामने आए, उसमें ब्लॉगवाणी सर्वाधिक लोकप्रिय रहा है। इसके पीछे उसका आकर्षक लुक और उसमें नित नए होने वाले बदलावों का महत्वूर्ण योगदान रहा है। लेकिन अब ब्लॉगवाणी को बन्द हुए अर्सा बीत चुका है। (सॉरी, बंद नहीं हुआ है, हाँ उसे अपडेट नहीं होने दिया जा रहा है। जबकि उसपर होने वाला खर्च बदस्तूर जारी है।)

जिस समय ब्लॉगवाणी बंद हुई थी, उस समय से लेकर आज तक बाकायदा उन लोगों को इन्डायरेक्ट वे में निशाना बनाया जाता है, जिन्होंने उसकी आलोचना की। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर आलोचना हुई ही क्यों। वह इसलिए कि वहाँ पर जान बूझकर एक खास प्रकार की नकारात्मक मानसिकता वाली पोस्टों को तो लगातार बढ़ावा दिया जा रहा था पर कम्यूनिष्ट तथा अन्‍य विचारधारा वाले लोगों के ब्लॉग तक नहीं रजिस्टर्ड किये जा रहे थे। जो लोग इसके शिकार बने, उनमें ‘नाइस’ मार्का सुमन जी का नाम सबसे ऊपर है। यहाँ तक तो जैसे-तैसे मामला चल रहा था, लेकिन जब ब्लॉगवाणी ने जानबूझकर पाबला जी को भी अपने लपेटे में ले लिया, तो पानी सिर के ऊपर निकलना ही था, और निकला भी। नतीजतन ब्लॉगवाणी वालों को लगा कि उनका अपमान किया जा रहा है और उन्होंने उसकी अपग्रेडेशन रोक दी।

ब्लॉगवाणी की आलोचना में एक पोस्ट लिखने की हिमाकत मैंने भी की है, जिसके लिए अक्सर मुझे ताने भी सुनने पड़ते हैं। लेकिन मजे की बात तो ये है कि ब्लॉग जगत के वे खुर्राट आलोचक जो कभी किसी व्‍यक्ति विशेष के बहाने, कभी सम्मान के बहाने और कभी ब्लॉग विश्लेषण के बहाने पूरे समूह के साथ अगले की बधिया उखाड़ने निकल पड़ते हैं और फोन पर प्रेशर बनवाकर मामला ठंडा होने के बाद भी पोस्ट पे पोस्ट लिखवाते हैं, वे ‘सजग’ और ‘प्रहरी’ ब्लॉगर ब्लॉगवाणी की ‘धूर्तता’ (कोई अन्य सटीक शब्द हो तो कृपया हमारा ज्ञान बढ़ाने का कष्ट अवश्य करें) के मामले में बेहया बनकर न सिर्फ अपनी आँखों पर पट्टी और कानों में रूई खोंस लेते हैं (उनके नाम बताने की जरूरत नहीं, दुनिया जानती है वे कौन लोग हैं), बल्कि उसकी आलोचना होने पर उल्टे आलोचक को लतियाने चले आते हैं।

एग्रीगेटर नं० 02 चिट्ठाजगत
वैसे तो चिट्ठाजगत सबसे पुराना एग्रीगेटर है, लेकिन अपने ले आउट के कारण यह ब्लॉगवाणी से हमेशा पीछे ही रहा। लेकिन जबसे ब्लॉगवाणी कोमा में गया, तबसे इसकी पूछ बढ़ गयी है। किन्‍तु दु:ख का विषय यह है कि चिट्ठाजगत में भी सब कुछ सही नहीं है। इसकी सक्रियता लिस्ट में बहुत बड़ा लोचा है। इसमें दीपक भारतदीप के दो-दो तीन-तीन अत्यल्प पढ़े जाने वाले ब्लॉग तो लिस्ट में बने रहते हैं, लेकिन ‘तस्लीम’ (प्रतिदिन लगभग 300 यूनीक विजिटर्स, 325 फॉलोवर्स और 125+140(डॉट कॉम पर आने से पहले, जो अब शो नहीं होते) फीडबर्नर पाठक) और ‘साइंस ब्लागर्स असोसिएशन’ जैसे बहुपठित ब्लॉग कभी नजर नहीं आते हैं, जबकि इनपर सप्‍ताह में कम से कम दो पोस्‍टें नियमित रूप से प्रकाशित होती हैं।

मैं पिछले दो महीने से चिट्ठाजगत को लगातार रीड कर रहा हूँ, इसलिए ही यह बात कहने का दुस्साहस कर पाया हूँ। चिटठागजत में पोस्टों की लोकप्रियता नापने वाले तीन टैब हैं- सर्वाधिक कमेंट वाली पोस्ट, सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पोस्ट, तीसरी शायद सर्वाधिक पसंद की जाने वाली पोस्ट(अनुमान के आधार पर)। लेकिन इनमें भी एक लोचा यह है कि सिर्फ टिप्पणी वाली पोस्ट ही केवल दिखती हैं, अन्य दो टैब कभी खुलती ही नहीं हैं। मुझे पूरा अंदेशा है कि यह सब जानबूझकर किया जाने वाला कृत्य है, जिसकी बहुत दिनों तक अनदेखी नहीं की जा सकती।

वैसे चिट्ठाजगत पिछले काफी समय से डाउन है। न जाने क्यों मुझे लग रहा है कि जबसे समीर लाल जी इंडिया आए हैं, वह उनके तेज को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है।:) ऐसे में चिटठागजत को फिर से एक्टिव करने के लिए क्या किया जाना चाहिए, यह मेरी समझ से बाहर है। अगर आप लोगों के दिमाग में कोई विचार आ रहा हो, तो अवश्य बताएँ।

एग्रीगेटर नं० 03 इंडली
इंडली को आए हुए हालाँकि अभी जुमा-जुमा आठ महीने ही हुए हैं, पर अनेक भाषाओं में होने के कारण इसकी एलेक्सा रैंक तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या है ब्लॉग की फीड को ऑटोमैटिक न लेना। इसलिए बहुत से ब्लॉगर (फ्री में सेवाएँ देने के बावजूद) इसकी सेवाएँ नहीं ले रहे हैं। उन्हें हर बार वहाँ जाकर अपनी पोस्ट अपडेट करना अखर रहा है। इसलिए यदि इंडली के संचालक यह चाहते हों किउनका एग्रीगेटर लोकपिंय हो,तो उन्हें इस कमीको दूर करने के बारे में सोचना चाहिए।

एग्रीगेटर नं० 04 हमारीवाणी
यह एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी के कोमा में जाने के बाद ही अस्तित्व में आया है। इसकी बनावट देखकर यही लगता है कि इसे ब्लॉगवाणी जैसा बनाने का प्रयत्न किया गया है। लेकिन इसके बारे में कुछ दिनों पहले एक ‘अफवाह’ फैली थी कि यह वायरस का प्रसार कर रहा है इसलिए काफी लोगों ने इसका कोड अपने अपने ब्लॉग से हटा दिया था। चूँकि मैं तकनीकी एक्सपर्ट नहीं हूँ इसलिए मैं इस बारे में दावे से नहीं कह सकता कि कोई एग्रीगेटर अपने विजेट कोड के द्वारा वायरस फैला सकता है है कया? आपमें से कोई इसका जानकार हो तो अवश्य बताए। वैसे मुझे अंदेशा है कि इसका लुक चूंकि एक खास धर्म से जुड़ाव को दर्शाता है, इसलिए जानबूझकर ‘वायरस’ वाली अफवाह उड़ायी गयी?

मेरी सोच के पीछे दो कारण भी हैं। पहला कारण यह कि एक बार मेरी  तकनीक दृष्‍टा फेम विनय प्रजापति से बात हुई थी। तब उन्होंने बताया था कि जो भी ब्लॉग ब्लॉगर पर होस्ट हैं, उनके कंटेंट को गूगल स्वयं वायरस के लिए चेक करता रहता है। ऐसे में यह कैसे संभव हो सकता है कि गूगल अपने सर्वर पर किसी ब्लॉग द्वारा वायरस को आने दे। दूसरा कारण यह है कि परिकल्पना पर इसका विजेट शुरू से लगा हुआ है और उसे आज तक वायरस से कोई नुकसान नहीं पहुँचा है। इसलिए मैंने भी इसमें अपने सारे ब्लॉग रजिस्टर्ड कर दिये हैं। आप अगर फ्री के एग्रीगेटर की तलाश में हो, तो इसमें मुझे कोई बुराई नजर नहीं आती। हॉं, यदि आपमें से किसी को भी इसमें 'ब्‍लॉगवाणी' अथवा 'चिटठाजगत' टाइप कोई विशेष गुण नजर आया हो, तो हमें अवश्‍य बताऍं। क्‍योंकि जानकारी बॉंटने से ही बढ़ती है।
एग्रीगेटर नं० 04 ब्लॉगसेतु
अंत में एक महत्वपूर्ण सवाल यह कि क्या एग्रीगेटर्स से ईमानदारी की अपेक्षा करना मूर्खता है?
एग्रीगेटरों द्वारा जानबूझकर की जाने वाली धांधली का अंध समर्थन करने वाले लोगों से एक बात मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगा कि अपने देश में प्रजातन्त्र है। आप अगर कहीं पर भी किसी व्यक्ति के साथ चीटिंग करते हैं, तो आपको बख्शा नहीं जाएगा, फिर चाहे आप ब्लॉगर हों अथवा एग्रीगेटर। यदि एग्रीगेटर चालक इस भ्रम में हैं कि वे एग्रीगेटर होने के बहाने किसी को अनुचित लाभ और किसी को अनुचित नुकसान पहुँचा सकते हैं, तो वे इस गलतफहमी को जितनी जल्दी दूर कर लें, उतना ही अच्छा। क्योंकि कोई भी चालाकी अथवा खेल बहुत दिनों तक छिपाए रखना अब किसी के लिए भी संभव नहीं रहा है। ऐसे में अपनी छीछालेदर को रोकना स्‍वयं अपने ही वश में रह गया है।

दूसरी बात- अक्सर भाई लोग कहते पाए जाते हैं कि एग्रीगेटर हमारा मुफ्त में प्रचार कर रहे हैं, इसलिए उनकी आलोचना न करें। मैं ऐसे लोगों को साफ-साफ बताना चाहता हूँ कि आप इस वहम को अपने दिल से निकला दें। एग्रीगेटर तभी तक हैं, जब तक ब्लॉगर हैं। एग्रीगेटर अगर ब्लॉगर की पोस्टों को मुफ्त में प्रचारित करता है, तो ब्लॉगर भी मुफ्त में ही उसका विज्ञापन अपने ब्लॉग पर लगाये रहता है। इसके साथ ही साथ वह मुफ्त में ही नई पोस्टों की खोज में दिन में दसियों बार एग्रीगेटर पर जाता है और उसकी एलेक्सा रैंक को बढ़ाने में सहयोग करता है। एग्रीगेटर चाहें तो उस रैंक का फायदा उठाकर विज्ञापन जुटा सकते हैं, ब्लॉगर्स को उससे कोई आपत्ति नहीं होने वाली। और अगर एग्रीगेटरों को लगता है कि वे मुफ्त में ही लोगों का प्रचार कर रहे हैं, तो क्यों नहीं अपनी सेवाएँ पेड कर देते हैं? जिसे पैसा देकर अपनी पोस्टों को प्रचारित करने का शौक होगा, वह उनकी सेवाएँ ले लेगा। और जो पैसा नहीं खर्च करना चाहेगा, वह मजे से अपने घर में बैठेगा।  

लेकिन इन सबकी आड़ में अब यह संभव नहीं रह गया है कि एग्रीगेटर मुफ्त की सेवाओं का हवाला देकर किसी को अनुचित लाभ पहुँचाएं और किसी को जबरदस्‍ती नीचा दिखाऍं। यदि एग्रेगेटर इस भ्रम में हैं कि यह उनका विशेषाधिकार है, तो फिर उन्‍हें यह भी पता होना चाहिए कि ब्‍लॉगर भी अन्‍याय का विरोध करने का अपना मौलिक अधिकार रखता है। और उसे किसी भी कीमत पर दबाया नहीं जा सकता।

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फीड क्‍लस्‍टर का उपयोग करके कुछ लोगों ने अपने-अपने एग्रीगेटर भी बनाए हैं। जैसे: आज के हस्‍ताक्षर,परिकल्‍पना समूह, लक्ष्‍य, महिलावाणी इसके अतिरिक्‍त कुछ लोगों ने ब्‍लॉग स्‍पॉट पर ही अपनी पसंद के एग्रीगेटर बना लिए हैं। उनके नाम हैं: हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत, हिन्‍दी-चिट्ठे एवं पॉडकास्‍ट, ब्‍लॉग परिवार, चिट्ठा संकलक। इसके अलावा दो अन्‍य संकल्‍क हैं- लालित्‍य एवं हिन्‍दी ब्‍लॉग लिंक

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एग्रीगेटर: यानी एक आँख से देखने वाला?
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