...जाकिर अली 'रजनीश' क्‍या तुमने मांस का स्‍वाद वास्‍तव में चखा है? ये स्‍वाद वैसे जल्‍दी से छूटता नहीं है।

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पिछली पोस्‍ट ' क्‍या आप शुद्ध शाकाहारी हैं' पर आई हुई टिप्‍पणियों के क्रम में।  किसी...

पिछली पोस्‍ट 'क्‍या आप शुद्ध शाकाहारी हैं' पर आई हुई टिप्‍पणियों के क्रम में। 

किसी पाश्‍चात्‍य विचारक ने कहा है कि हर व्‍यक्ति का अपना एक 'कम्‍फर्ट जोन' होता है। प्रत्‍येक व्‍यक्ति उस 'कम्‍फर्ट जोन' के भीतर रहकर ही सारे क्रिया कलाप करता है। न तो उससे ऊपर की चीजें और न ही उससे नीचे की चीजें उससे बर्दाश्‍त हो पाती हैं। इसीलिए या तो वह उनकी कटु आलोचना करने लगता है या फिर उन्‍हें (अपने कम्‍फर्ट जोन से इतर चीजों को) बकवास, गूढ़मगज, पागलपन (उसकी डिक्‍शनरी में जो भी शब्‍द उपलब्‍ध हो) करार देता है। 

इसे समझने के लिए मांसाहार से इतर का एक उदाहरण देखें। यदि आप सरकारी कार्यालयों में जाते हों, तो आपको अंदाजा होगा कि वहॉं के अधिकारी का पद जितना बढ़ता जाता है, उसकी मेज का आकार उतना बढ़ता जाता है। अर्थात वह व्‍यक्ति स्‍वयं से मिलने आने वाले व्‍यक्तियों से अपनी दूरी पोस्‍ट के अनुपात में बढ़ाता जाता है। उस दूरी से बात करना उसे बेहद सुरक्षित और सहज लगता है। लेकिन जैसे ही कोई व्‍यक्ति उस घेरे को तोड कर उसके नजदीक पहुंच जाता है, वह असामान्‍य हो जाता है और असहज व्‍यवहार करने लगता है।

अब आते हैं मांसाहार पर। 
मांसाहार क्‍या है, इसपर कोई एक राय नहीं है। जो व्‍यक्ति जिस वातावरण और परिवेश में रहता है, वह उसके अनुसार मांसाहार के सम्‍बंध में अपनी धारणा बना लेता है। जैसे मांसाहार के सम्‍बंध में सब्जियॉं और अण्‍डा मेरा कम्‍फर्ट जोन हैं। इसमें रहकर मैं अपने आप को सहज महसूस करता हूँ। अण्‍डा से मुझे दिक्‍कत नहीं होती। जबकि मुझसे ऊपर की श्रेणी के लोग अण्‍डे को मांसाहार की श्रेणी में मानते हैं। वे अण्‍डे का छिलका छू जाने पर भी पाप हो जाने जैसे प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करते हैं और केक आदि से भी परहेज करते हैं। इसके विपरीत मुझसे नीचे (सिर्फ कहने के लिए, नीचे से आशय निम्‍न कत्‍तई नहीं है) की श्रेणी के लोग भी हैं, जैसे जैन आदि, जो भोजन में आ गये जीवाणुओं को जीवित जानवर की तरह ही मानते हैं और जिस भोजन में जीवाणु पनप जाते हैं, उसे मांसाहार की श्रेणी में गिनते हैं। (जबकि रचना जी ने अपनी टिप्‍पणी में बताया है कि जापान में मछली को और बैंकॉक में गाय के मांस को भी शाकाहार माना जाता है)। मेरी पिछली पोस्‍ट को प्रकाशित भी उद्देश्‍य यही था, अर्थात भोजन के कम्‍फर्ट जोन को बताना।

अब सवाल यह है कि इनमें सही कौन है। देखने में यह सवाल भले ही सामान्‍य सा हो, पर इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता। क्‍योंकि हर व्‍यक्ति अपने कम्‍फर्ट जोन के हिसाब से ही इस प्रश्‍न का उत्‍तर देगा, और यह उचित भी है। इस हिसाब से हर व्‍यक्ति का जवाब सही होना चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है। क्‍योंकि प्रत्‍येक व्‍यक्ति अपने कम्‍फर्ट जोन में आने वाली चीजों को न सिर्फ सही मानता है, बल्कि उससे इतर की सभी चीजों को गलत मानता है उन्‍हें हिकारत की दृष्टि से देखने लगता है। यहॉं तक कि उस सम्‍बंध में बात चलने पर वह स्‍वयं को सही (और दूसरों को गलत) सिद्ध करने के लिए बहस-मुबाहसे से लेकर गाली-गलौज तक पर उतर आता है। यही सब कुछ ब्‍लॉग जगत में चल रही इन दिनों मांसाहार से सम्‍बंधित तमाम पोस्‍टों में भी देखा जा सकता है। अब आप पूछोगे कि इसका सल्‍यूशन क्‍या है। तो इसका सीधा सा जवाब तो स्‍वयं आप सबमें से कई लोगों ने दिया है कि आपका जो मन करता है खाओ, बस दूसरों को न गरियाओ। (यहॉं पर चिपलूनकर जी और रचना जी को आपत्ति होगी। लेकिन आप लोग थोड़ा धीरज धरे, मैं आपकी बात पर भी आता हूँ, पहले उससे पहले की कई जरूरी चीजें क्लियर कर दूँ।)

लेकिन अपने स्‍वाद के लिए जीवों की हत्‍या तो पाप है?
अगर गहराई से देखा जाए तो पाप और पुण्‍य की अवधारणा पर भी कम्‍फर्ट जोन वाला सिद्धांत हुबहू लागू होता है। क्‍योंकि एक धर्म में जो चीजें पाप हैं, दूसरे में वे चीजें पाप नहीं हैं। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि जो धर्म जिस क्षेत्र में अवतरित/प्रचलित हुआ, उसमें वहॉं की भौ‍गोलिक स्थितियों के अनुसार पाप और पुण्‍य की अवधारणाऍं तय कर दी गयीं। यही कारण है कि जहां इस्‍लाम में मांसाहार को बुरा नहीं माना गया, वहीं अन्‍य तमाम धर्मों में मांसाहार को पाप की श्रेणी में रखा गया है। जैन धर्म इसका एक्‍स्‍ट्रीम उदाहरण है, जहॉं पर पाप की अवधारणा विकसित करते समय जीवाणुओं का भी ख्‍याल रखा गया है। अब अगर हमारे कम्‍फर्ट जोन में कोई सिद्धांत फिट नहीं बैठता है, तो इसका मतलब ये कत्‍तई नहीं हो जाता कि हम दूसरे की कम्‍फर्ट जोन की परवाह किये बिना उसे गरियाना शुरू कर दें। (चिपलूनकर जी, रचना जी अभी आप थोड़ा धीरज और धरें।)

(हो सकता है कुछ लोगों को मेरी इन बातों से मांसाहार के समर्थन की गंध आ रही हो। ऐसे लोंगों से मैं निवेदन करना चाहूँगा कि वे पूरी बात समाप्‍त होने से पहले किसी नतीजे पर न पहुँचें।)

अब आते हैं पाप पुण्‍य से इतर मांसाहार के औचित्‍य पर। 
जैसा कि नीरज गोस्‍वामी जी ने लिखा कि दुनिया में मनुष्‍यों की 80 प्रतिशत आबादी मांसाहार के भरोसे ही जीवित है। सिर्फ 20 प्रतिशत ही ऐसे हैं, जो शाकाहारी हैं। अब यदि 80 फीसदी लोगों से यह कहा जाए कि वे मांसाहार छोड्कर शाकाहार करने लगें, तो यह कैसे सम्‍भव होगा। अगर यहॉं पर उनकी रूचि और स्‍वाद को भी दरकिनार कर दिया जाए, तो भी उन 80 फीसदी लोगों के लिए अन्‍न उगाने के लिए हमें फिलहाल चार और पृथ्वियों की आवश्‍यकता होगी। ऐसे में जब दुनिया की 80 फीसदी आबादी के लिए खाने के लिए सब्जियां हैं ही नहीं, तो फिर वे खाऍंगे क्‍या। और अगर हम किसी कानून अथवा नैतिकता का दण्‍ड दिखाकर उन्‍हें शाकाहारी बनने के लिए मजबूर भी कर दें, तो आप सोचिए कि बाजारों में सब्जियों की क्‍या पोजीशन होगी। अभी 20 रूपये प्रति किलो वाली लौकी उस समय किस रेट में बिकेगी, आप अंदाजा लगा सकते हैं। (लेकिन शायद तब भी हमारे चिपलूनकर भाई उस मंहगाई के लिए कांग्रेस को ही जिम्‍मेदार ठहराऍं :) )

तो जब यह बात स्‍पष्‍ट है कि दुनिया में 80 फीसदी लोगों के लिए शाक सब्जियॉं उपलब्‍ध ही नहीं हैं, तो फिर अगर वे मांसाहार न करें तो क्‍या करें। शाकाहार के प्रति रूढि़वादी दृष्टिकोण रखने वाले लोगों के लिए इस प्रश्‍न पर विचार करना अनिवार्य है। 

बलि वध से पहले उससे भी एक जरूरी सवाल: क्‍या आपको लगता है कि जो 20 प्रतिशत लोग शाकाहारी दिखते/दिखाते हैं, वे वास्‍तव में शाकाहारी हैं?
अगर आप इस भ्रम में हैं, अपने दैनिक जीवन में शाक सब्‍जी खाकर जीने वाले ये लोग पूरी तरह से शाकाहारी हैं, तो शायद आप अभी तक भ्रम में है। यदि आप गहराई से देखें, तो आपको पता चलेगा कि इन 20 प्रतिशत लोगों में बहुत से ऐसे हैं, मंहगाई के कारण स्‍वयं तो मांस खरीद कर नहीं खाते हैं, किन्‍तु किसी दावत में मौका मिलने पर बोटी नोचने से पीछे नहीं रहते हैं। इनमें से बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो खुले तौर पर तो मांसाहार की आलोचना करते हैं, लेकिन किसी मांसाहारी दावत में पहुंचने पर छिपकर हड्डियॉं नोचते पाए जाते हैं। इनमें से बहुत से लोग ऐसे भी हैं, जो खुद तो प्‍याज और लहसुन तक नहीं खाते हैं, लेकिन उनके लड़के मीट और मछली शौक से खाते हैं। तो सवाल यह है कि क्‍या ऐसे लोगों को शाकाहारी माना जाए। और अगर इन लोगों को शाकाहारी नहीं माना जाएगा, तो फिर मेरी समझ में विश्‍व में मांसाहारियों की संख्‍या 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।

अब आते हैं बलि प्रथा पर। यानी कि क्‍या बकरीद और काली पूजा में बलि देना पाप है?
मेरे विचार में जिस चीज को विश्‍व के 80 प्रतिशत लोग (यह प्रतिशत थोडा कम ज्‍यादा भी हो सकता है, पर इससे कोई फर्क नहीं पडता) नियमित रूप से चाव से खाते हैं। इनमें से 80 प्रतिशत के लिए वह अपरिहार्य चीज है। तब 80 फीसदी लोगों की जरूरत को सिर्फ इसलिए पाप कहना कि वह 20 फीसदी लोगों को पसंद नहीं है, एक तार्किक बात नहीं होगी। यह ठीक उसी तरह अव्‍यवहारिक और पक्षपातपूर्ण है, जैसे जैनियों की शाकाहार सम्‍बंधी बातों को अव्‍यवहारिक कहकर उसकी हंसी उड़ाना। और अगर धरती की आबादी की 80 प्रतिशत जनता की पेट से जुडी चीज किसी धार्मिक परम्‍परा से जुड़ी हुई है, तो सिर्फ इसलिए कि वह अमुक धर्म से जुडी है, उसकी आलोचना सही नहीं है। यह एक पक्षपातपूर्ण और गैर ईमानदार व्‍यवहार है।

पिछली पोस्‍ट पर आए कमेंट में से अगर सबसे ईमानदार जवाब की बात की जाए, तो वह नीरज गोस्‍वामी और निशांत का रहानीरज जी ने अपने कमेंट में लिखा कि ''दरअसल मनुष्य की भोजन शैली जहाँ वो रहता है वहां आसानी से उपलब्ध वस्तुओं पर निर्भर करती है...अगर कोई नदी या समुद्र किनारे रहता है तो जल में रहने वाले जीव खायेगा ही...ये सदियों से होता आ रहा है और इसमें कुछ गलत नहीं है क्यूँ की इंसान भी एक प्रकार का जानवर ही है और प्रकृति जानवरों को एक दूसरे को मार कर खाना ही सिखाती है...'' जबकि निशांत भाई ने इस बिन्‍दु पर एक विद्वतापूर्ण सुझाव देते हुए लिखा था कि ''फ़ूड चेन के शिखर पर बैठे अतिविकसित मनुष्य से यह उम्मीद की जाती है कि वह इसका विकल्प ढूंढें।''

मैं निशांत की बात को आगे बढ़ाते हुए कहना चाहूँगा कि जब तक यह विकल्‍प ढुँढ़ नहीं लिया जाता, मांसाहार करना मानव की मजबूरी है। और जब तक यह सुविधा उपलब्‍ध नहीं हो जाती, तब तक मानव अन्‍य जानवरों का मांस खाने के लिए अभिशप्‍त ही रहेगा। और जब तक जानवरों का मांस मनुष्‍यता की मजबूरी है, तो उसको महिमामंडित करने वाली परम्‍पराऍं भी चलती ही रहेंगी। इन्‍हें व्‍यवहारिक नजरिए से देखें और पाप पुण्‍य से ऊपर उठकर सामाजिक यथार्थ को समझने का प्रयत्‍न करें।

अब आता हूँ मेरे बारे में पूछे गये सवाल कि क्‍या मैं वास्‍तव में शाकाहारी हूँ और क्‍या मुझे मांस का स्‍वाद नहीं भाता?
इस बारे में मैं इतना तो पहले भी लिख चुका हूँ कि मैंने जबसे लिखना शुरू किया था, मांस खाना छोड़ दिया था। इस फैसले के पीछे दो मुख्‍य कारण थे। पहला यह कि मांस बचपन से ही मेरी कभी पसंद नहीं था। जिन दिनों मैं मांस खाता भा था, उन दिनों भी मैं सिर्फ रेशे वाले पीस ही खा पाता था। एक बार मैंने गल्‍ती से गैर रेशे वाला पीस खाया, तो मुझे उल्‍टी हो गयी थी। दूसरा कारण यह था कि चूँकि मुझे मांस बहुत ज्‍यादा पसंद नहीं था, इसलिए मुझे बार बार यह लगता था कि इसके लिए किसी को मरना पड़ता है अपनी जान देनी पड़ती है, इसलिए मैं ऐसे काम को क्‍यों बढ़ावा दूँ। बस यही दो कारण ऐसे थे, जिनपर मैंने जब ज्‍यादा सोचा-विचारा, तो मांस छोड़ना ही मुझे बेहतर लगा। अब हालत यह है कि जिस दिन घर में मांस बनता है (अलग होने के बाद से लाकर मुझे ही देना पड़ता है), तो मेरे लिए अलग से दाल सब्‍जी बनाई जाती है। यानी कि मैं घर पर मांस का रसा भी लेना पसंद नहीं करता। लेकिन मुझे मांस से कोई घृणा नहीं है। यदि किसी शादी वगैरह में जहॉं, शाकाहारी खाना उपलबध नहीं होता है, मजबूरी में मांस से रसे से काम चला लेता हूँ। ऐसे में यदि आप मुझे शाकाहारी समझते हैं, तो भी, नहीं समझते हैं तो भी मुझे कोई दिक्‍कत नहीं। मैं मांस नहीं खाता हूँ, पर इसका मतलब यह नहीं कि मुझे मांसाहार से घृणा है। मुझे पता है कि मांसाहार विश्‍व के अधिकांश मनुष्‍यों की पहली पसंद/आवश्‍यकता है। और किसी की खाद्य सम्‍बंधी पसंद की आलोचना करने वाला मैं कौन होता हूँ।

अब आता हूँ दो धुरंधर :) लोगों यानी चिपलूनकर जी और रचना के सवाल पर कि मैं कितनी बार कट्टर मुल्‍लाओं के खिलाफ अपनी कलम चलाई है?
इस सम्‍बंध में हालॉंकि मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि मेरा रूचि वैज्ञानिक विषयों में रहती है और मैं उन्‍हीं विषयों पर लिखना पसंद करता हूँ, जो अवैज्ञानिक होती हैं और अंधविश्‍वास (समाज को नुकसान पहुंचाने वाले) को बढ़ावा देती हैं। इन बातों का धर्म से कोई सम्‍बंध नहीं है। जहॉं तक मुस्लिम धर्म से जुड़े अंधविश्‍वासों का सवाल है, मैं उनपर भी यथाशक्ति लिखने का प्रयत्‍न करता हूँ। फिलहाल इस सम्‍बंध में आप तस्‍लीम पर हाल ही में प्रकाशित यह पोस्‍ट भी देख सकते हैं।

आशा करता हूँ कि आप लोग मांसाहार से सम्‍बंधित मेरी पिछली पोस्‍ट का मन्‍तव्‍य समझ गये होंगे। हॉं, यदि उसके द्वारा किसी व्‍यक्ति की भावनाऍं आहत हुई हों, तो मैं उसके लिए क्षमा मांगता हूँ।

शीर्षक: दर्शनलाल बवेजा जी की टिप्‍पणी से प्रेरित।
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