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क्या 'ब्लॉगवाणी' सचमुच ब्लॉग जगत का माहौल खराब कर रहा है? (संदर्भ: पसंद/नापंसद चटका)

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किसी सन्त ने कहा है   ' अक्सर हम उन्हीं लोगों की आलोचना करते हैं,  जो हमारे सबसे घनिष्ठ सम...

किसी सन्त ने कहा है 
'अक्सर हम उन्हीं लोगों की आलोचना करते हैं, 
जो हमारे सबसे घनिष्ठ सम्बंधी होते हैं।'

शायद इस आलोचना के पीछे मानसिकता यही होती है कि जो हमारे घनिष्ठ सम्बंधी हैं, जिनकी कोई बात, जो हमें पसंद नहीं आ रही है, उनमें अगर वह कमी नहीं होती, तो कितना अच्छा होता? लेकिन ऐसा कल्पना/अपेक्षा करते हुए हम शायद यह भूल जाते हैं कि आदमी गल्तियों का पुतला है। अगर उसमें त्रुटियाँ नहीं होंगी, तो फिर वह इंसान नहीं रहेगा, फरिश्ता बन जाएगा।

लेकिन इंसान और ब्लॉगवाणी में फर्क है। इंसान प्रकृति की रचना है और ब्लॉगवाणी इंसान का बनाया हुआ साफ्टवेयर। इसलिए उसमें परिवर्तन किया जा सकता है, उसे त्रुटि रहित बनाया जा सकता है।

लेकिन इससे पहले एक और गम्भीर सवाल। कुछ लोगों का कहना है कि आप ब्लॉगवाणी की परवाह ही क्यों करते हैं? इसका एक बहुत साधारण सा जवाब यह हो सकता है कि ब्लॉगवाणी हिन्दी चिट्ठों पर सबसे ज्यादा पाठक भेजने वाला एग्रीगेटर है। लेकिन यह मेरा जवाब नहीं है। मेरा जवाब यह है कि हम 'ब्लॉगवाणी' को प्यार करते हैं। इसलिए नहीं कि वह हमारे पास पाठक भेजता है, बल्कि इसलिए कि हमें उसका स्वरूप पसंद है। ब्लॉगवाणी हिन्दी का पहला एग्रीगेटर है, जिसने अपने कलेवर के द्वारा पोस्टों में भी रोमांच पैदा किया है। यही कारण है कि चाहे 'धान के देश में' हो, चाहे 'कडुवा सच' की बात हो, चाहे 'ज़िन्दगी के मेले' हो और फिर चाहे 'देशनामा', सर्वत्र उसकी चर्चा हो रही है, भले ही वह नकारात्मक सुर में ही क्यों न हो। हमें इस नकारात्मकता से इरीटेट होने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि यदि हम इससे इरीटेट हो जाएंगे तो उपरोक्त सूक्ति को भूल रहे हैं, हम मानव साइकालॉजी को भूल रहे हैं।

अब आते हैं मुद्दे की बात पर, आखिर थोड़ी-थोड़ी देर में उठने वाली इन चिंगारियों की वजह क्या है?
मेरे विचार में इसकी वजह है ब्लॉगवाणी द्वारा पसंद और नापसंद के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला कैलकुलेशन। मेरी समझ से ब्लॉगवाणी में एक पसंद का औसत मान लगभग 15 पढ़ी गयी पोस्टों के बराबर होता है। जबकि उसके नकारात्मक मान की वैल्यू लगभग 20-25 पोस्टों के बराबर लगती है। आईए इसे एक उदाहरण से समझा जाए।

8 जून 2010 को दोपहर सवा एक के करीब मेरे इसी ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित हुई 'एक सवाल सिर्फ इंटेलीजेन्ट ब्लॉगर से'शाम पाँच बजे तक ब्लॉगवाणी के आँकड़े के अनुसार इस पर एक पसंद का चटका था, यह पोस्ट करीब सत्तर बार खोली गयी थी और इसपर 14 कमेंट दर्ज थे, लेकिन इसके बावजूद पोस्ट ब्लॉगवाणी की हॉटलिस्ट में नहीं थी। लेकिन उस लिस्ट में जो पोस्ट सबसे नीचे थी, वह लगभग 35 बार पढ़ी गयी थी, उसपर तीन पसंद के चटके थे और कमेंट शायद 12-13 ही थे। अगले दिन सुबह 11 बजे मैंने जब पुन: ब्लॉगवाणी के आँकड़े देखे, तो मैं आश्चर्यचकित रह गया। उस समय तक यह पोस्ट सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली (133 बार) पोस्ट थी, उसपर 28 कमेंट दर्ज थे (ऊपर से पाँचवा नम्बर) लेकिन इसके बावजूद यह पोस्ट हॉट लिस्ट से सिरे से गायब थी। इसका कारण सिर्फ इतना था कि इसपर दो पसंद के चटके थे और नापसंद के 6 चटके लगे हुए थे। यानी कि नकारात्मक श्रेणी के 4 चटकों ने 133 पाठकों की समझ और 28 कमेंटों की धज्जियाँ उड़ी दी थीं। इससे यह स्पष्ट है कि नापसंद/पसंद के चटकों का सदुपयोग न करके लोग  या तो अपने निहित स्वार्थ पूरे कर रहे हैं अथवा अपनी खुन्नस निकाल रहे हैं। और जाहिर है कि ब्लॉगवाणी का पसंद/नापसंद के चटके बढ़ाने के पीछे यह मंशा तो कत्तई नहीं रही होगी।

तो अब आप हो सकता है कि वही रटा-रटाया सवाल करें कि आप इससे परेशान क्यों होते हो? अच्छा लिखो, जिसे पढ़ना होगा पढ़ेगा ही। ब्लॉगवाणी के पसंद-नापसंद के चटके से क्या फर्क पड़ता है?

तो यहाँ पर मेरा जवाब यह है कि इससे फर्क पड़ता है जी, (एक नापसंद का चटका अच्छी से अच्छी पोस्ट की कमर तोड़ देता है। और सामान्य ब्लॉगों पे पसंद के चटके ही कितने होते हैं?) हम सभी ब्लॉगर्स पर फर्क पड़ता है। अगर फर्क न पड़ता तो इतने लोग इस पार अलग-अलग तरीके से अपनी नाराजगी न व्यक्त कर रहे होते। अगर किसी एक मुद्दे पर अलग-अलग से जगह से धुँआ उठ रहा है, तो इसका मतलब यह है कि कहीं न कहीं आग तो है ही। और अगर आग है, तो उसे सही दिशा में उपयोग में क्यों नहीं लाया जा सकता?
तो फिर इस पसंद/नापसंद का इलाज क्या है?
मेरे विचार में इस विवाद को दूर करने के लिए दो हल हैं।
1- पहला हल यह है कि ब्लॉगवाणी अगर यह व्यवस्था कर दे कि सभी पोस्टों के पसंद/नापंसद करने वालों का डिटेल भी दिखाने लगे, तो इस सुविधा का दुरूपयोग काफी हद तक रूक जाएगा। यहाँ पर डिटेल से मेरा आशय है पसंद/नापसंद करने वाले की स्पष्ट पहचान को प्रदर्शित करना। हालाँकि यह मेहनत वाला काम है, पर मेरी समझ से असम्भव कदापि नहीं।

2- दूसरा हल यह है कि पसंद/नापसंद की जो वैल्यू ब्लॉगवाणी द्वारा निर्धारित की गयी है, उसे रिड्यूस किया जाए। एक पसंद/नपसंद को उतनी ही वेटेज दी जाए, जितनी कि एक टिप्पणी अथवा पोस्ट के टाइटिल पर होने वाली क्लिक को दी जाती है। अगर ब्लॉगवाणी इतनी मेहरबानी कर दे, तो फिर यह कत्तई नहीं होगा कि सिर्फ 5-6 दोस्तों को फोन करके (आप यकीन करें या न करें, यह खूब हो रहा है) कोई अपनी पोस्ट को हॉट लिस्ट की टॉप में पहुँचा दे।

मेरी समझ से ये फौरी उपाय हैं, जो मैथिली जी और सिरिल जी की टीम आसानी से कर सकती है। इससे न सिर्फ तमाम विरोधी स्वर थम जाएँगे और ब्लॉगवाणी भी उस कमी रहित दोस्त की तरह हो जाएगा, जिसमें सिर्फ और सिर्फ गुण ही होते हैं। आशा है मैथिली जी और सिरिल जी तमाम ब्लॉगर्स की भावनाओं का सम्मान करते हुए इन सुझावों पर गौर फरमाएँगे और ब्लॉग जगत में अनावश्यक रूप से जन्म ले रहे कलह के माहौल को दूर करने के लिए ब्‍लॉगवाणी साफ्टवेयर में यथावश्‍यक संशोधन करने की कृपा करेंगे।

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