प्रेरक बाल कहानी: अपना-अपना फर्ज

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(दीपावली की पृष्ठभूमि पर रचित ज़ाकिर अली रजनीश की एक रोचक बाल कहानी) दीपावली यानी प्रकाश का उत्सव। अ...

(दीपावली की पृष्ठभूमि पर रचित ज़ाकिर अली रजनीश की एक रोचक बाल कहानी)

दीपावली यानी प्रकाश का उत्सव। अमावस की काली रात को प्रकाश से नहलाने का पर्व। चारों ओर दीपों और बिजली की रंग-बिरंगी झालरों के बीच तारों से टिमटिमाते छोटे-बड़े मकान और इन सबके बीच अपनी खुशी प्रकट करते छोटे-छोटे बच्चे। उनके हाथों में रंग-बिरंगी रोशनी छोड़ती फुलझिड़यां और महताब।

सिर्फ धरती ही नहीं, आकाश को भी रोशन से नहला देने का संकल्प लिये आकाश में ऊपर उठते राकेट, जब फूटते, तो लगता जैसे किसी ने फूलों की बरसात कर दी हो।

छोटे से लेकर बड़ों तक सभी के चेहरों पर चकरगिन्नी की तरह नाचती हुई खुशी। अनार की तरह छिटकती हुई खुशी और पटाखे की तरह प्रसन्न्ता के रूप में फूटती हुई खुशी। जैसे खुशी पूरे बैंड-बाजे के साथ धरती पर अवतरित हो गयी हो।

पर इस खुशनुमा माहौल के बावजूद आकाश लॉन में अकेला बैठा था। एकदम उदास और गुमसुम। उसकी नन्हीं आँखों से बहने वाले मोती गालों पर आकर जम गये थे। नर्गिस के फूल सी उसकी आँखों में माँ और बापू की सूरत तैर रही थी। एक सड़क दुर्घटना के कारण एक साल पहले इस दुनिया को छोड़कर जा चुके उसके मॉं-पिता उसे आज बहुत याद आए थे। उन्हें याद करके वह खूब रोया था।

आकाश से थोड़ी दूरी पर सेठ धनीलाल का लड़का अरूण पटाखे छुटा रहा था। आकाश उन्हीं के घर में रहता है। सेठ धनीलाल उसके चाचा हैं और वे उसे अपने सगे लड़के की तरह ही मानते हैं। आकाश की उदासी की वजह यह है कि उसके चाचाजी ने अरूण के लिए लाये हुए पटाखों में से कुछ पटाखे आकाश को दे दिये थे। अरूण ने जब अपने पटाखे आकाश के पास देखे, तो वह बहुत नाराज हुआ। उसने पहले तो उसे खूब उल्टा सीधा कहा और फिर उसके गाल पर दो-तीन चपत लगा दीं।

अरूण की इस हरकत पर उसके पिता ने उसे खूब डांटा और आकाश के लिए अलग से पटाखे मंगाने के लिए नौकर को बाजार भेज दिया।

चाचाजी का स्नेह पाकर आकाश का दु:ख कुछ कम हुआ। वह काफी देर तक कमरे में अकेला बैठा रहा। पर कुछ समय के बाद उसे वहॉं पर उलझन होने लगी। वह कमरे से निकला और लॉन में चला गया। वह लॉन के एक कोने में बैठा गया और आसमार की ओर देखते हुए अपने माता-पिता को याद करने लगा।

उसे याद आ रहे थे वे दिन, जब वह अपने माता-पिता के साथ दिवाली मनाया करता था। मॉं के साथ दीपक सजाने और बापू के साथ पटाखे छुड़ाने में उसे कितना आनन्द आता था। उसके पिता को तेज आवाज वाले पटाखे पसंद थे। पर आकाश को तेज आवाज वाले पटाखे बिलकुल अच्छे नहीं लगते थे। वह हमेशा जिद करके रौशनी वाले पटाखे ही खरीदता। इस कारण पिता-पुत्र के बीच अक्सर नोंक-झोंक भी होती। पर अन्तत: बात आकाश की ही मानी जाती। आखिर पटाखे भी तो आकाश को ही छुड़ाने होते थे। पिताजी तो सिर्फ एक कुर्सी पर बैठकर आकाश को दूर से देखते रहते।

पर अब? अब तो सिर्फ यादें ही बचीं हैं। वे यादें जितनी बार उसके पास आतीं, हर बार उसकी पलकों को भिगो जातीं।

अचानक आकाश की नजर अरूण के पीछे पड़े हुए एक पटाखे पर पड़ी। वह एक रस्सी बम था और धीरे-धीरे सुलग रहा था। वह बम किसी भी क्षण फट सकता था।

अरूण को तेज धमाके वाले और दो बार बजने वाले पटाखे छुड़ाने का शौक है। इसीलिए वह हर बार ऐसे ही बम लाता है। उसी के द्वारा जलाया गया कोई पटाखा शायद एक बार बज कर रह गया था। अगर अब वह फटता, तो अरूण को निश्चित रूप से गम्भीर चोट आती। पर अरूण इससे बेखबर पटाखे छुडाने में व्यस्त था।

आकाश तो पहले से ही अरूण से खार खाए बैठा था। उसने सोचा कि अच्छा है, पटाखा छूटे तो मजा आए। जब बच्चू को चोट लगेगी, तभी इन्हें पता चलेगा कि दर्द क्या होता है। तब शायद इन्हें
उस दर्द का एहसास हो, जो मुझे मिला है।

आकाश एक मिलनसार और सब को स्नेह की दृष्टि से देखने वाला लड़का है। उसने कभी दूसरे का बुरा करना तो दूर शायद ऐसा सोचा भी न हो। यही कारण था कि अगले ही पल उसकी विचार शक्ति ने उसे झकझोर दिया- ये क्या कर रहे हो आकाश? अरूण तुम्हारा भाई है। तुम्हारा फर्ज है उसकी रक्षा करना। अगर उसने तुम्हें दो चाटे लगा दिये, तो क्या हुआ? क्या तुम भी उसके जैसा बुरा व्यवहार करने लगोगे? फिर तुममें और अरूण में क्या फर्क रह जाएगा? ये तुम्हारे कर्तव्य की परीक्षा की घड़ी है आकाश। तुम उठो और अपने कर्तव्य का पालन करो।

`हॉं, आकाश ने मेरे साथ बुरा किया तो क्या हुआ, मैं उसकी तरह बुरा नहीं बन सकता। मैं अपने फर्ज को निभाऊंगा। इससे पहले कि वह पटाखा फटे, मुझे आकाश को आगाह करना होगा।´ मन ही मन निश्चय करते हुए आकाश एक झटके के साथ उठ खड़ा हुआ।

पटाखे को सुलगते हुए काफी समय व्यतीत हो गया था। अब वह किसी भी क्षण फट सकता था। ऐसे समय में अरूण को आवाज देकर चेताने का कोई मतलब नहीं था। जब तक उसे आवाज दी जाती, वह सुनता और इधर-उधर देखता, पटाखा निश्चित रूप से फट जाता। ऐसे में सिर्फ एक ही रास्ता रह जाता था। आकाश ने उसे उसे ही अपनाया।

चीते की गति से दौड़ता हुआ आकाश पटाखे के पास पहुंचा ओर उसे हाथ से उठा कर दूर उछालने लगा। लेकिन जब तक वह उसके हाथ से दूर जाता, पटाखा फट चुका था। एक तेज धमाका हुआ और आकाश का हाथ जख्मी हो गया।

अपने पीछे बजने वाले बम की आवाज सुनकर अरूण पीछे पलटा। आकाश के झुलसे हुए हाथ को देखकर वह सारी बात समझ गया। उसे यह समझते देर न लगी कि अगर आकाश इस पटाखे को न उठाता, तो यही काम उसके साथ हो जाता। और अगर ऐसा होता, तो...?

अरूण का सिर शर्म से नीचा हो गया। वह सोचने लगा- एक मैं हूं, जिसने जरा सी बात के लिए आकाश को मारा। और एक यह है जिसने मुझे बचाने के लिए अपने हाथों को जख्मी कर लिया।
अगले ही पल अरूण के हाथ आकाश के आगे जुड़ते चले गये, ``मुझे माफ कर दो आकाश। मैंने बिना वजह तुम्हें...।´´

गला रूंध जाने के कारण वह आगे कुछ बोल ही न सका। जवाब में आकाश सिर्फ मुस्कराया। अरूण आकाश के सीने से लिपट गया। उसकी आंखों से आँसुओं की लडियाँ लगातार झर रही थीं, ``मैं कितना स्वार्थी और नीच हूं आकाश। मैंने हमेशा तुम्हारा अनादर किया और बुरा-भला कहा। पर तुमने अपने बड़प्पन को कभी नहीं छोड़ा। तुमने मुझे जीत लिया आकाश। मुझे आज एहसास हो रहा है कि मैं तुम्हारे आगे बहुत छोटा हूं।´´

अरूण की बातें सुनकर आकाश का चेहरा खिल गया। वह अरूण को गले से लगाते हुए बोला, ``ये आप क्या कह रहे हैं अरूण भैया, मैंने तो सिर्फ इंसानियत का फर्ज निभाया है।´´

तभी अरूण को आकाश के हाथ में लगी चोट का ध्यान आया। वह बोला, ``आकाश, चलो पहले तुम्हारी चोट पर मलहम लगा दूं, फिर हम लोग मिलकर पटाखे छुड़ाएंगे।´´

कहते हुए अरूण ने आकाश का हाथ पकड़ा और कमरे की ओर चल पड़ा।

अरूण का प्यार देखकर आकाश के मन में जमा कड़वी यादें एक क्षण में धुल गयीं। उसका चेहरा दिये की तरह खिल गया और मन में ढ़ेर सारी फुलझिड़यॉं जल उठीं।

-ज़ाकिर अली `रजनीश´
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